Friday, 2 November 2012

ये दढ़ियल मुल्ले... तूफ़ान क्यों मचाने लगते हैं.?


क्या आप जानते हैं कि....... मुहम्मद, अल्लाह या कुरान की बात आने पर ..... ये दढ़ियल मुल्ले... तूफ़ान क्यों मचाने लगते हैं....और, जगह जगह तोड़-फोड़ शुरू क्यों कर देते हैं ......?????

जाहिर तौर पर.... ये काफी सामान्य सी बात है कि.... वे ऐसा करके अगले पर दबाब बनाने का प्रयास करते हैं.... ताकि, अगला घबड़ाकर कर चुप हो जाये .....!

हालाँकि... वे सुबह से शाम तक..... ये मुल्ले... हम हिन्दुओं पे उंगली उठात
े रहते हैं..... और, हमारे ग्रंथों में लिखी बातों कि वैज्ञानिकता सिद्ध करने पर जोर डालते रहते हैं....साथ ही सबूत खोजते रहते हैं........
लेकिन जब बात उनके... अल्लाह, कुरान या उस लुटेरे मुहम्मद की होती है तो .... उनकी चरर्र से फट जाती है..... और, वे तुरत चिल्ल-पों मचाने लगते हैं...!

ध्यान से देखें तो....... इसमें कोई आश्चर्य वाली बात नहीं है...... और, कोई भी गहराई में जा कर इन बातों का सार समझ सकता है...!

दरअसल.... इसका कारण है कि..... मुल्लों और उलेमाओं को... ये बात भली भांति पता है कि...... ""दुनिया में अल्लाह का कोई अस्तिव नहीं है.... और, ना ही मुहम्मद ... किसी का दूत था"...!

ये सब महज लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए .... फैलाया गया जाल है..... क्योंकि, कुरान फारसी में लिखा हुआ है..... और, ज्यादातर गैर-मुसलमान को फारसी भाषा नहीं आती है.... इसीलिए , मुल्ले जो कहते हैं.... उसे वे आँख बंद कर के मान लेते हैं..!

आप में से ज्यादातर लोगों को ये मालूम ही होगा कि.... मुस्लिमों के रसूल और अल्लाह के तथाकथित दूत ..... मुहम्मद की मौत..... उसकी पत्नी आयशा के जहर देने से हुई थी...! ( आयशा ने मुहम्मद को जहर इसीलिए दिया था... क्योंकि , मुहम्मद ने लूट के दौरान अपनी 62 साल की उम्र में... 6 साल की मासूम आयशा के साथ सार्वजानिक रूप से बलात्कार किया था..!

जब आयशा ने मुहम्मद को जहर दे दिया ..... और , जहर के प्रभाव से मुहम्मद ... दर्द के मारे तड़पने लगा.... तो, उसे अपने सारे कुकर्म याद आने लगे....!

जरा आप भी कुरान में.... मुहम्मद की मौत का वर्णन देखें.... और. इस्लाम के बारे में अपना सामान्य ज्ञान बढ़ाएं......

@@@ ओ आयशा, मैं अभी खाना खाया और उसकी वजह से दर्द महसूस होता है, और इस समय मुझे लगता है कि जहर के रूप में मेरी महाधमनी काटी जा रही है..... इशाक :119 ,छठी तबरी:93 ,95 -९६

@@@ मुझे देवताओं का शाप है क्योंकि मैंने उनका धर्म चुराने की कोशिश की, उन्हें अपमानित किया, मैंने जीवन में बहुत पाप किया है और अपने चाचा को धोखा दिया है.. इस तरह मैं अपने पूर्वजों का अभियुक्त हूँ... (गौरतलब है कि उसने अपने चाचा {जिन्होंने उसे पाला था और जो कि एक बहुत बड़े शिवभक्त थे} की हत्या कर दी थी )..........इशाक :119 अबू तबीब

इसके बाद मुहम्मद की दर्द से तड़पते हुए मौत हो गई....!

#### अब बहुत ही सामान्य सा प्रश्न है ... जो कि किसी छोटी बच्चे को भी समझ आ सकती है.....

*** अगर वास्तव में "अल्लाह सर्वशक्तिमान है" .... और , मुहम्मद उसका सचमुच में दूत था.....तो, उसने मुहम्मद को क्यों नहीं बचाया....????

*** क्या .... अल्लाह मुहम्मद के कुकर्मों से अजीज हो चुका था....?????

*** या फिर.... मुहम्मद किसी का दूत नहीं था..... क्योंकि, अल्लाह कोई था ही नहीं... और, अल्लाह एक काल्पनिक चित्रण था....!

+++++ और.. सबसे बड़ी बात कि..... जो अल्लाह ... इतना शक्तिहीन है कि...अपने सबसे प्यारे रसूल (दूत) को जहर के प्रभाव से नहीं बचा सका...... वो इस मुस्लिमों के दुःख दर्द को कैसे ख़त्म कर देगा....????

हर किसी से प्रमाण और.... वैज्ञानिकता सिद्ध करने को बोलने वाले मुस्लिम.... किसी भी हालत में इन ज्वलंत प्रश्नों का उत्तर देना नहीं चाहते हैं...!

क्योंकि.... कुरान के अध्ययन से ये साफ पता चलता है कि.... अल्लाह का कहीं कोई अस्तित्व नहीं है.... इसीलिए मुहम्मद के अल्लाह का दूत होने का तो कोई प्रश्न ही नहीं है....!

और.. जब मुहम्मद कोई दूत-फूत नहीं था.. तो, भला मुहम्मद.. और कुरान के नाम पर.... तूफ़ान क्यों मचाते रहते हैं ये दढ़ियल मुल्ले...????

है किसी मुस्लिम या उनके सरपरस्त मनहूस सेकुलर के पास इसका जबाब....???????

जय महाकाल...!!!

Wednesday, 17 October 2012

समाज में युवक – युवतियां क्यों भटक रहे है ?

प्रत्येक माँ बाप अपने लड़के – लड़कियों को पढाई के लिए किसी अच्छे संसथान में भेजना चाहते हैं जो सामर्थ्य होते हैं वह भेजते हैं ! जहां लड़के और लडकियां किसी पिजी अथवा होस्टल में रहते हैं ! अनजान शहर नये चहरे और नई उम्र ! बुलंद होसले , जोश से भरे ऐसे युवक – युवतियां घर से काफी दूर रहते हैं ! ऐसे में नया माहोल , आधुनिकता , और अकेलेपन से घीरे युवक – युवतियां शहरी माहोल में ढलने लगते हैं ! जिसके परिणाम सवरूप छोटे शहरो से आये युवक – युवतियां अपने दायरे से निकल कर लड़के और लड़की की सीमाओं को पाटने ( तोड़ने ) लगते हैं ! जिसके फलस्वरूप ऐसे संस्थानों में लड़के और लड़की का साथ रहना बोलना घूमना आदि को फ्रंद्शिप नाम दिया जाता है यानी दोस्ती ! जहां युवक – युवतियों को अपने घर की किसी ख़ुशी में शामिल करते हैं वाही युवतियां भी ! लेकिन एक कडवी सच्चाई यह भी है की इस तरह की दोस्ती देसी भाषा में कहू तो सेटिंग होती है अथवा प्यार ! यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य बात है की 90 % ऐसी दोस्ती टाईमपास भी कहलाती है ! जिसमे लड़के और लडकियां शारीरिक सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं ! प्यार – शादी तो बहुत कम लोग ५ , १० लोग ही करते हैं ! एसा नही हो सकता की इन हालत से कोई भी माँ – बाप वाकिफ न हो ! एक वह भी जमाना था जब लड़की का घर से दूर जाना भारतीय समाज में अच्छा नही माना जाता था लेकिन आज जमाना कुछ और है जिसमे हर किसी को आगे निकलना है ! किसी को पडोसी से तो किसी को रिश्तेदार से ! इसी वजह से माँ – बाप मोन हैं………… लेकिन इन सबके बीच इस भाग्दोड़ी प्रतियोगिता में कुछ तो है जो हम खो रहे हैं ! अपने सिधांत , संस्कार , सभ्यता , बड़े छोटे का आदर – सम्मान ! लेकिन यह एक मकडजाल है वह मकडजाल जिसे अंग्रेजो ने बुना और हमें उलझाया ! वयवस्था का एसा मैकालेम्यी जाल जिसमे हम और आप सभी बस फसे हुए हैं ! ऐसी प्रतियोगिता जिसमे हार भी हमारी है और केवल हार ही हमारी है ! चुकी इस वयवस्था में जहा एक और भारतीयता खो रही है वही दूसरी और भारत का भविष्य सिगरेट , बियर और सेक्स के नशे में चूर है !

इस्लाम का अपमान क्यों ?

समय समय पर इस्लाम के अपमान से जुडी घटनाये सामने आती रहती हैं कभी अमरीकी पादरी टेरी जोन्स वर्ष 2010 में वर्ल्ड ट्रेड टावर पर हुए हमले की बरसी के मौके पर क़ुरान की प्रतियाँ जलाने की घोषणा करते हैं तो कभी अफगानिस्तान में अमरीकी सैनिक कुरान को जलाते हैं ! ताजा विवाद एक कथित ‘इस्लाम-विरोधी’ अमरीकी फिल्म के इंटरनेट पर आने के बाद है ! जिसके बाद लीबिया और अन्य इस्लामिक देशो में हिंसा का तांडव हो रहा है ! कई देशो में आगजनी दंगे हो रहे हैं ! यह सही है की किसी भी धर्म का अपमान गलत है और मुसलमानों को उसका विरोध करने का पूर्ण हक़ है जिसका वह इस्तेमाल कर रहे हैं ! जैसे बाकि धर्मो को सम्मान मिलना चाहिए वैसे ही इस्लाम को भी ! परन्तु बड़ा सवाल यह है की इस्लाम का अपमान बार बार क्यों होता है ? क्यों बार बार सभी गैर मुस्लिम ( काफिर ) मुसलमानों को अपने दुश्मन नजर आते हैं और खुद को अलग पाते हैं और बाकी सारी दुनिया एक तरफ ! आज की स्थिति बहुत हद्द तक यही है की इस्लाम को गाली देना मानो आतंक को गाली देना बन गया है जो इस्लाम का अपमान करता है वह पूरी दुनिया में हीरो बन जाता है ! चाहे वह टेरी जोन्स हो या अमेरिकी सैनिक या फिर सलमान रुश्दी ! लेकिन सवाल बार – बार रह – रह कर उभरता है इस्लाम का अपमान या इस्लाम के खिलाफ एक आवाज भी उस आम आदमी जिसे कल तक कोई जानता नही था हीरो बना देती है अथवा मसीहा तो क्या इसके पीछे छुपी इस्लाम की कट्टरपंथी सोच है या वे आतंकी जिन्होंने इस्लाम के नाम पर आतंक का खुनी खेल खेलकर भारत समेत सभी देशो की धरती पर मासूम लोगो का रक्त पिया है ! अन्यथा मुसलमानों की वह कट्टरपंथी सोच जिसके तहत गैर मुस्लिम उन्हें दुश्मन (काफिर ) नजर आता है ! विचार आम मुसलमान को करना है की आखिर आज इस्लाम अपमानित क्यों है ? विचार यह भी यह भी करना होगा की आज मयामार ,फ़्रांस , अमेरिका , चीन , जापान भारत में मुसलमानों को शक की नजर से क्यों देखा जाता है क्या इसके लिए आम मुसलमानों की वह भीड़ दोषी है जो बंगलादेशी घुस्पेठियो के लिए देश में जगह जगह दंगे पर उतारू हो जाती है अथवा वह भीड़ जो एक देश में रहते हुए वहा के क़ानून से उपर अपने धर्म मजहब को समझती है ? आम मुसलमान का विचार करना और समझना बेहद जरुरी है की आज वह कहा खड़ा है क्या एसे चोराहे पर जिसमे गैर मुस्लिम एक तरफ और मुस्लिम बीच चोराहे पर जिसके चारो और से गैर मुस्लिम उसे घेरे हुए है पर सबसे बड़ी बात क्यों ?

दहेज़ और भारतीय महिलाए

आजकल देश के हर राज्य में दहेज़ के मामले तेज़ी से बढ़ रहे है कुछ दहेज़ लोभियों ने सभी लड़के के पक्ष वालो को संदेह के घेरे में ला दिया है लड़की वाले बहुत ही डर -डर कर अपनी लड़की का रिश्ता करते है .कई बार सुनने और देखने में आता है की ससुराल पक्ष वालो ने बाइक या गैह्नो की खातिर बहु को जला दिया या जहर दे दिया .कई बार बात मार -पिटाई ,गाली – गलोच तक सिमित रहती है …..ताकि लड़की के माँ बाप लड़के वालो को धन या फिर जो उनकी डिमांड होती है देने के लिए मजबूर हो जाए .दहेज़ लेना और देना अपराध है एसा हमें सकूलो में पढाया गया है फिर भी कई लोग दहेज़ लेते है और महिलाओं को दहेज़ के लिए प्रताड़ित करते है .ऐसे में दहेज़ मांगने वाले ,या कहे तंग करने वाले अपने ससुराल पक्ष के लोगो के खिलाफ कुछ महिलाए केस दर्ज कराती है .जिसके तहत महिला जिन लोगो का नाम दर्ज कराती है उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है . किन्तु समाज में ऐसी महिलाओं की भी कमी नहीं है जो इस दहेज़ विरोधी क़ानून का दुरूपयोग पैसे ऐठने या ससुराल पक्ष में अपना दबदबा बनाने के लिए करती है कभी कभी इस तरह के केस में देखने में आता है की कुछ महिलाए बेकसूर ससुराल पक्ष के लोगो को भी जेल में ठुस्वा देती है जिन्होंने कभी दहेज़ की डिमांड की ही नहीं होती इस कानून का प्रयोग कर कई निर्दोष लोग भी चपेट में आ जाते है .कुछ महिलाए पैसे ऐठने के लिए और कुछ महिलाए ससुराल पक्ष के लोगो को बेवजह दबाने के लिए भी एसा कदम उठती है .जिसकी वजह से निर्दोष लोगो पर भी चार -चार साल केस चलता रहता है और लड़के वालो को आर्थिक और सामाजिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है .चार -पांच सालो तक कोर्ट में केस चलने की वजह से लड़के का और कही रिश्ता भी नही किया जा सकता .इस कारण लड़के की उम्र भी काफी हो जाती है और उसे लगातार समाज में परेशानियों का सामना करना पड़ता है .सवाल उठता है हमारे भारत में आजकल महिला उत्पीडन के नाम पर महिलाओं के लिए जिस तरह के कानून बनाये जा रहे है क्या इस तरह के क़ानून भारत में नारी की छवि को बिगाड नहीं रहे है ?क्या इस तरह के क़ानून का दुरूपयोग करने से पुरूष और ओरत में खाई चोडी हो रही है ?क्या इस तरह के क़ानून बनाने से भारतीय समाज का परिवारक ढांचा बर्बाद नही हो रहा है ?
क्या इस तरह के कानून की आड़ में किसी निर्दोष परिवार को फ़साना जायज है ?सवाल उठता है की क्या – हर- बार लड़के वाले ही दोषी होते है और जो शब्द , जो ब्यान कोई महिला — पुलिस -थाने में दर्ज करवा दे वही “पत्थर की ‘लकीर की तरह सच है ?बेशक से वह महिला या फिर उसके घरवाले इस तरह के क़ानून का उपयोग लड़के वालो को परेशान करना पैसो के लिए कई सालो से करते आ रहे हो . क्या सिर्फ इसलिए नारी की हर बात को सच मान लिया जाए की वह एक महिला है और उसे भारत में कई तरह के अधिकार मिले है . जो निर्दोष परिवार सालो तक जेल में रहते है उनमे महिलाए भी होती है क्या उनके कुछ अधिकार नहीं है ?क्या पुरूष समाज में भावनाए नहीं होती जो उन्हें ही आँख मीचकर गलत मान लिया जाता है ?
क्या ऐसी महिलाओं या उनके खिलाफ कोई सख्त दंड का प्रावधान हमारे समाज या फिर क़ानून में नहीं होना चाहिए जो निर्दोष लोगो को बेवजह तंग करती है ?

Thursday, 4 October 2012

बहुपत्नी प्रथा और इस्लामिक समाज


बहुपत्नी प्रथा इस्लामिक समाज में पाई जाने वाली एक ऐसी कुप्रथा है जिसे मुसलमान अपना जनमसिद्ध अधिकार समझते है. भारत समेत दुनिया कि बहुत सी सरकारे जो सेक्युलर होने का दम भरती है, इस मुद्दे पर इस्लामिक कट्टरपंथियो के आगे हथियार डाल चुकी है. भारत में तो हालात इस हद तक खराब है कि समान आचार सहिता कि बात करने वालो को ही संप्रदयवादी कह कर दुत्कार दिया जाता है. गैर मुस्लिम के लिए ये जानना बड़ा दिलचस्प है कि मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवी इस जाहिल और महिला विरोधी रिवाज़ के पक्ष में क्या दलीले देते है? ज़ाकिर नाईक जैसे अनेक मुस्लिम विचारक तर्क देते है कि दुनिया के सभी धर्मो में बहुपत्नी प्रथा पाई जाती है. राजा दशरथ कि 3, ओर श्री कृष्णा की 16108 पत्निया थी. यहूदी, पारसी ओर ईसाई धरम में भी एक शादी जैसी कोई पाबंदी नही है.केवल क़ुरान में ही शादियो की अधिकतम सीमा तय की गयी है. यानी ये साफ है कि बाकी धर्मो के लोगो ने अपने प्राचीन रिवाज़ो को नये समय के साथ बदला है. सिर्फ़ मुसलमान ही ऐसा नही कर पाए वे आज भी सड़ी गली प्रथा से चिपके हुए हैं.
...
इनका दूसरा तर्क है कि दुनिया में औरतो की तादात मर्दो से ज़्यादा है. इससे बदतर कोई तर्क नही हो सकता. युरोप के कुछ देशो में महिलाओ की तादात भले ही अधिक है लेकिन वह चार गुना जीतने स्तर पर नही है. दुनिया में सेक्स रेशियो 100:101 है. सबसे अजीब बात तो ये है कि जिन देशो में महिलाओ कि तादात कुछ अधिक है वहाँ तो बहुपत्नी प्रथा गैर क़ानूनी है, जबकि ज़्यादातर इस्लामिक देशो में, महिलाओं की तादात पुरुषो से कम है. साओदी अरब में तो 100 पुरुषो के अनुपात में सिर्फ़ 85 महिलाए ही है.


यही हाल ज़्यादातर मुस्लिम देशो का है. इस्लामिक विद्वान अमेरिका रशिया आदि का तो सेक्स रेशियो बताते है पर बड़ी मक्कारी से मुस्लिम देशो का सेक्स रेशियो छिपा लेते है. भारत में पुरुषो की तादाद कम होने का कारण कन्या भ्रूण हत्या हो सकता है, पर मुस्लिम देशों में महिलाओ कि संख्या इतनी कम क्यो है? कुल मिला कर ये तर्क बिल्कुल बकवास है कि दुनिया में महिलाओ कि संख्या इतनी अधिक है कि पुरुष 4 शादी की छूट ज़रूरी है.

कारण केवल एक है कि जहां बाकी समाज पुरानी ज़ंज़ीरो को तोड़ कर नयी जीवनशैली को अपना चुके हैं , वहीं मुसलमान अब भी रूढ़िवादी सोच के गुलाम है.

मैडम भीकाजी कामा

मैडम भीकाजी कामा पहली भारतीय थीं, जिन्होंने 22 अगस्त 1907 को जर्मनी में इंटरनेशनल सोशलिस्ट कॉन्फ्रेंस के दौरान हजारों विदेशी प्रतिनिधियों के सामने भारतीय राष्ट्र ध्वज फहराया था। तब उस भारतीय युवती का ओजस्वी व्यक्तित्व देखकर वहां उपस्थित विभिन्न देशों के प्रतिनिधि चकित रह गए। कुछ लोग उन्हें भारत की महारानी या राजकुमारी समझ रहे थे। राष्ट्रध्वज फहराने के बाद उन्होंने वहां उपस्थित जनसमुदाय को संबोधित ...
करते हुए कहा था, भारत की आजादी का यह झंडा उन अनगिनत भारतीय युवाओं के पवित्र खून से रंगा है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने जीवन का बलिदान दे दिया। मैं यहां उपस्थित सभी लोगों से आग्रह करती हूं कि आप भारतीय स्वतंत्रता के इस ध्वज को सलाम करें। मैं विश्व के सभी स्वतंत्रताप्रेमियों से आग्रह करती हूं कि वे स्वाधीनता की इस लडाई में हमें सहयोग दें। यह सोचने वाली बात है कि देश की आजादी के 40 वर्ष पहले अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक मंच पर भारत की उपस्थिति दर्ज कराने वाली, उस अकेली भारतीय स्त्री की शख्सीयत कितनी दमदार रही होगी।

1914 में प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जब फ्रांस और ब्रिटेन के बीच संधि हुई तो पेरिस इंडियन सोसायटी के लगभग सभी सदस्यों ने पेरिस छोड दिया, लेकिन भीकाजी ने विपरीत स्थितियों में भी वहीं रह कर देश की आजादी के लिए संघर्ष करना मंजूर किया। जब पंजाब रेजिमेंट की टुकडी ब्रिटेन और उसके मित्र देशों की तरफ से लडाई करने के लिए फ्रांस की धरती पर पहुंची तो भीकाजी ने उसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और उसी दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 1935 तक वह यूरोप में नजरबंद रहीं। इसी बीच वहीं उन्हें पक्षाघात का दौरा पडा और उनके वकील सर कावासाजी जहांगीर के काफी प्रयासों के बाद उन्हें घर वापस जाने की अनुमति मिल गई और वह मुंबई लौट आई। अपने देश की आजादी के लिए अंतिम सांस तक लडने वाली इस महान शख्सीयत का 13 अगस्त 1936 को, 74 वर्ष की आयु में मुंबई के पारसी जनरल हॉस्पिटल में स्वर्गवास हो गया।

दोस्तों ये हैं हमारे "हिंदुस्तान" की "जांबाज नारियां"
इन्हें दिल से सलाम ....

जय हिंद ... वन्देमातरम .....

महिला सशक्तीकरण के लिए जरूरी है-वित्तीय साक्षरता

तमाम विरोधभास के बावजूद हमारे देश में एक ओर तो यह सच है कि महिलायें परिवार की धुरी होती हैं तथा भले ही कमाई पुरूष वर्ग करता है। लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि अगर महिलायें नौकरी पेशा और कमाऊ हैं तब भी उनकी आय का सारा हिसाब पुरूष ही रखते है। महिलायें अपनी सारी कमाई अपने पति के हाथों में सौंप देती है, एटीएम के युग में पत्नियों के एटीएम कार्ड का पासवर्ड भी सिर्फ पति महोदय को ज्ञात रहता है। कुल मिलाकर यह भी सच है कि हमारे देश में महिलायें अपनी कमाई का भी मनमाफिक उपयोग नहीं कर सकती है। उनकी भुमिका पारिवारिक व्यय के लिए सिर्फ सूचना प्रदाता तक ही सीमित है और आर्थिक मामलों पर निर्णय की बात सिर्फ उनकी सलाह तक ही सीमित है। इस संदर्भ में पुरूष वर्ग यह  तर्क देता है कि महिलाओं में न तो वित्तीय मामलों की समझ होती हैं और न ही वो इसकी अधिकारी है। इस तरह महिला सशक्तीकरण के तमाम दावों के बीच अब भी आर्थिक मुद्दों पर पूर्ण रूप से पुरूष वर्ग का ही वर्चस्व है। ऐसें में अगर महिलायें परिवार के खर्चों का हिसाब रखने की भूमिका से संतुष्ट हैं तो यह उनके सशक्तीकरण के मुद्दे को भी कमजोर करता है तथा परिवार और समाज के लिए भी नुकसानदायक है। क्योंकि आज परिवारिक मामलों में महिलाओं की भूमिका बढ़ने से यह जरूरी है कि वो पारिवारिक आर्थिक मामलों की भी समझ विकसित करें। मसलन वो आय व्यय में संतुलन के लिए पारिवारिक बजट बनाने के साथ साथ बचत और निवेश की जरूरतों को भी समझें। एक अच्छा बजट परिवार को आने वाले आर्थिक संकट से सुरक्षित रखता है।
महिलायें पारिवारिक जरूरतों पर मुद्रास्फीति और मंहगाई के प्रभाव को भी समझे, महिलायें पारिवारिक खर्च पर काफी हद तक नियंत्रण कर सकती हैं जैसे बिजली, फोन अनाज और उपयोगिता से जुड़े तथ्यों का अध्ययन कर इन पर होने वाले अपव्यय को रोक सकती है। महिलाओं के लिए जरूरी है कि उन्हें पारिवारिक और पति की संपति संबंधी अधिकार के संबंध में कानूनी प्रावधानों की जानकारी हो। नामिनी और संरक्षक सम्पति संबंधी अधिकार का ज्ञान होना चाहिए। महिलाओं को बैंकिंग और बचत के तमाम साधनों की जानकारी भी होना चाहिए जो कि उन्हें नहीं रहती है। यह जरूरी है कि महिलाओं को पति की आय और व्यय का पूरा पूरा ज्ञान हो साथ साथ यह भी जरूरी हैं कि पति के द्वारा किए गए निवेश, बैंक खातों, जमा और उधारी का भी ज्ञान होना चाहिए। क्योंकि किसी अनहोनी वश पति के साथ कोई हादसा हो जाए तो महिला को आर्थिक मामलों संबंधी किसी प्रकार की कानूनी समस्या से परेशानी न हो। पति द्वारा परित्याग और तलाक के मामलों में भी महिलाओं को आर्थिक मामलों में काफी परेशानी और अपमान झेलना पड़ता है अगर महिलाओं को इनसे संबंधित कानूनी प्रावधानों का ज्ञान हो तो इस प्रकार की समस्याओं से बचा सकता है। वृद्वावस्था महिलाओं को काफी कष्टप्रद होती है क्योंकि उनके उपर होने वाले व्यय से उनके बच्चे भी कन्नी काटते हैं इसके लिए जरूरी है कि उन्हे बीमा और पेंशंन योजनाओं का ज्ञान कराया जाए।
आज जिस तरह महिलाओं की भूमिका समाज और व्यवसाय के क्षेत्रों में बढ़ी है उस हिसाब से वो बच्चों के जन्म तथा उनकी शिक्षा दीक्षा के लिए आर्थिक सुदृढ़ता पर विचार करने लगी हैं यह महिला सशक्तीकरण की राह में शुभ संदेश है। लेकिन महिला सशक्ती करण की  यह बात महिलाओं को वित्तीय साक्षर करने से ही पूरी होगी। तथा पारिवार की आर्थिक सुरक्षा के लिए भी महिलाओं को वित्तीय साक्षर करने की जरूरत है क्योंकि वो होम मेकर यानि घर चलाने वाली है। क्योंकि यह बात सच है कि चाहे ग्रामीण निरक्षर महिला हो या फिर आधुनिक सीईओ महिला। सबको कही न कहीं वित्तीय साक्षरता की जरूरत हैं क्योंकि कामकाजी महिलाओं को बजट और बचत का उर्पयुक्त ज्ञान ही नहीं हैं। तथा ग्रामीण महिलायें वित्त के मामलों में लगभग पराधीन होती हैं और उनकी न तो कोई राय होती है लेकिन वो पारिवारिक बचत तथा आयवृद्वि में अहम रोल अदा कर सकती है इसके लिए उन्हें स्व सहायता समूहों से जोड़कर स्वावलम्बन के कार्यक्रम से जोड़कर और बैंकिग  की जानकारी, पोस्ट आफिस बचत तथा पारिवारिक सम्पति संबंधी अधिकारो से सशक्त किया जा सकता हैं। इसके लिए ग्रामीण महिलाओं के लिए पंचायत या स्वसहायता समूह की बैठकों के दौरान वित्तीय साक्षरता का ज्ञान दिया जा सकता है।
हमारे देश में इस संदर्भ में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड(सेबी) ने अपने वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम के जरिए ग्रामीण महिलाओं में वित्तीय साक्षरता का संदेश पहुंचाया है इसके लिए सेबी ने स्वसहायता समूह से जुड़ें महिला समूहों को साथ लिया हैं,तथा समाज के विभिन्न समूहों से जूड़ी महिलाओं के लिए फायनेंसियल लिटरेसी फार होम मेकर्स के नाम से कार्यक्रम प्रारम्भ किया है। उड़ीसा में मिशन शक्ति के नाम से महिलाओं को वित्तीय रूप साक्षर करने का कार्यक्रम प्रारंभ किया गया है। वैश्विक स्तर पर भी वित्तीय साक्षरता के जरिये महिला सशक्तीकरण के कार्यक्रम चलाए जा रहें है। अमेरिका और कनाडा के साथ साथ केन्या और घाना जैसे देशों में महिलाओं को पारिवारिक बजट के साथ बचत के तरीकों, बैंकिग सुविधाओं के उपयोग की जानकारी तथा पेंशन संबंधी योजनाओं से अवगत कराया जाता हैं। विकसित देशों के साथ घाना जैसे देश ने नेटवर्क आफ यंग वूमेन के नाम से युवा लड़कियों के बीच वित्तीय साक्षरता के कार्यक्रम चलाए है।
वास्तव में महिलाओं को सशक्त करने के लिए जरूरी हैं कि उन्हें स्कूल और कालेज स्तर पर वित्तीय साक्षरता के कार्यक्रम से जोड़ा जाए। ग्रामीण क्षेत्र में महिलाओं के बीच कार्य करने वाले संगठनों और स्वयं सेवी संगठनों को इस कार्य से जोड़ा जाए। शहरी क्षेत्र में भी कामकाजी महिलाओं के बीच वित्तीय जागरूकता से जूड़े कार्यक्रमों को अनिवार्य किया जाए। (हम समवेत)

बेटी नहीं तो बहु कहा से लाओगे ?

यह ब्लॉग सभी आयु के लोगो के लिए हैं. जो दूसरी शादी के बारे में सोच रहे होंगे की वे इसे जरुर से जरुर पढ़े. भारत में अब साल दर साल लड़कियों की संख्या कमती जा रही हैं.इसका कारण भ्रूण हत्या बताया जा रहा हैं. भ्रूण हत्या मतलब बच्चे के जन्म के पहले हत्या. वह भ्रूण जो अपनी माँ के गर्भ में पलकर नई दुनिया में आने का इंतज़ार कर रहा होता हैं. उसे हमारे यहाँ के अशिक्षित और अर्धशिक्षित लोग मार देते हैं. क्या हमारे यहाँ लड़की का जन्म लेना पाप हैं.? क्या जो काम लड़के किया करते हैं .उसे लड़की नहीं कर सकती हैं? आज लडकिया हर काम कर रही हैं. वह आज पुरषों को कड़ी टक्कर दे रही हैं. आज लडकिया हर क्षेत्र में टॉप कर रही हैं. .उनमे लड़कियों ने लडको को पीछे छोड़ दिया हैं.मानव समाज की रचना तभी संभव हैं ,जब महिला और पुरुष हो .सिर्फ पुरुषो से ही इस विशव की कल्पना नहीं की जा सकती हैं. और इसे कन्या भ्रूण हत्या करने वाले भी भली भांति जानते हैं .हमारे धार्मिक ग्रंथो में महिला को देवी की संज्ञा दी गयी हैं .दरअसल हमारे समाज में पित्रसत्ता रही हैं जिसमे लडको को ही सारे अधिकार दिए गए हैं. लडकियों के लिए शर्त ही शर्त हैं. मसलन वह दाह संस्कार स्थल पर नहीं जा सकती हैं ,वह मृत व्यक्ति को आग नहीं दे सकती हैं .वगैरह -वगैरह.
कन्या भ्रूण हत्या के कारण जनसँख्या असंतुलन की स्थिति पैदा हो गई हैं. नई जनगणना के आंकड़े पर यदि गौर करे तो सबसे ख़राब स्थिति पंजाब ,चड़ीगढ़ (केंद्र-शासित ),राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली ,हरियाणा की हैं .जहा लडकियों की संख्या तेजी से घटती जा रही हैं .जबकि ये सभी राज्य आर्थिक दृष्टि से संपन्न हैं. कुछ समय पहले हरियाणा विधानसभा के चुनाव में युवाओ की टोली ने यह शर्त रखा था की जो दल हमारी शादी करवाएगा उसी को हम वोट देंगे . (समाचार चैनल पर देखा ) .वही केरल एकलौता राज्य हैं जहा लडकियों की संख्या लडको से कही अधिक हैं .लडकियों की घटती संख्या चिंता का विषय बनी हुई हैं. कन्या भ्रूण हत्या करने वाले भी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं की लड़की ही बच्चो को जन्म देती हैं.वह जानबूझकर यह अक्षम्य अपराध करते हैं अगर धर्मो पर नजर डाला जाये तो सिखो में यह स्थिति काफी ख़राब हैं .जबकि सिख समृद्ध होते हैं.
भारत में एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजर -बसर करती हैं. हमारे समाज में दहेज़ दानव प्रथा भी इसके लिए उत्तरदायी हैं .गरीब यह सोचता हैं की अगर लड़की हुई तो उसकी शादी -विवाह में दहेज़ देने पड़ेंगे .यदि लड़का हुआ तो पढ़ -लिखकर अपने और अपने परिवार का नाम रौशन करेगा . वह सोचता हैं की लड़की को तो पढ़ा -लिखाकर पराया घर ही तो भेजना हैं तब हम उसे क्यूँ पढाये . आपने बहुत जगहों पर देखा होगा की माता -पिता लडको को अच्छे विधालयो में पढ़ाते हैं जबकि लड़की को घर का काम-काज सिखाते हैं .यदि पढ़ाते भी हैं तो सामान्य विधालयो में .वे यह नहीं समझ पाते की लडकियों को शिक्षा देने के क्या दूरगामी परिणाम होंगे . वैसे यह कहा जा सकता हैं की महिला ही महिला की दुश्मन होती हैं .महिला की सहमती से ही कन्या भ्रूण हत्या जैसा घृणित अपराध को अंजाम दिया जाता हैं. महिला भी बेटो को ही पसंद करती हैं .बेटियों को नहीं .यहाँ मैं एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की सभी महिलाये ऐसा नहीं करती हैं .कन्या भ्रूण हत्या महिलाये मजबूरी में भी करती हैं क्यूँ की उन्हें अपने ससुराल वालो के द्वारा प्रताड़ित किया जाता हैं .उनपर तरह -तरह के लांछन लगाये जाते हैं .लेकिन भ्रूण को मारने में उनकी मौन सहमती तो रहती ही हैं .
अगर इसी तरह लडकियों की संख्या घटती रही तो गंभीर संकट उत्पन्न हो जायेगा . मानव समाज के अस्तित्व पर ही संकट मंडराने लगेगा . भाइयो की कलाई पर रक्षा कवच कौन बाधेंगा ?बेटो के लिए बहुए कहा से आएगी ?अगली पीढ़ी के लिए माँ का कोख कौन उपलब्ध कराएगा ?यदि अगली पीढ़ी को इस दुनिया में जन्म लेने हैं और उनके जीवन को आगे बढ़ाना हैं तो आज की बेटी को जीने का अधिकार देना होगा और कन्या भ्रूण हत्या को रोकना होगा. मेरे विचार से कन्या भ्रूण हत्या करने वाले राजद्रोही हैं .क्यूँ की वे इस तरह के जघन्य अपराध कर राष्ट्र के विकास को अवरूद्ध कर रहे हैं.डाक्टर को हमारे समाज में भगवन कहा जाता हैं लेकिन वे भी इसमे सहयोगी बन रहे हैं .(सभी डाक्टर नहीं जो यह अपराध करते हैं वे ) सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह हैं की हम शिक्षा के क्षेत्र में नित्य नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं और लडकियों की संख्या और उन्हें सुरक्षा देने में पीछे जा रहे हैं .आप यदि नई जनगणना के रिपोर्ट को देखे तो गावो के तुलना में शहरों में कन्या भ्रूण हत्या की दर अधिक हैं .
सरकार ने इस समस्या को रोकने के लिए भ्रूण का लिंग परीक्षण करना अपराध घोषित किया हैं.प्रसव पूर्व भूर्ण परीक्षण के दुरूपयोग को रोकने के लिए सन 1994 में “प्रसव पूर्व नैदानिक तकनीक नियमन” और दुरूपयोग निवारण अधिनियम 1994 को 1 जनवरी 1996 को लागू किया .इस कानून के अनुसार इस प्रकार का अपराध करने वाले लोगो को 5 वर्ष की सजा और 50 ,000 रूपये की सजा का प्रावधान किया गया हैं .यह राशि आरसीएच -2 कार्यक्रम के अंतर्गत सम्बंधित जिले के मुख्या चिकित्सा एवम स्वास्थ्य अधिकारी के माध्यम से दी जाएगी .भारतीय दंड संहिता की धारा -312 से लेकर 315 तक में भ्रूण हत्या रोकने सम्बन्धी विभिन्न प्रावधान किये गए हैं. धारा 315 शिशु को जीवित पैदा होने से रोकने या जन्म के पश्चात् उसकी हत्या करने के आशय से किये गए गए कार्य के सम्बन्ध में सम्बंधित व्यक्ति को 10 वर्ष तक का कारावास या जुर्माना या दोनों से दण्डित करने का प्रावधान हैं.कन्या भ्रूण हत्या तो मानव के अधिकार कानून का उल्लंघन हैं साथ -साथ संविधान का अपमान भी हैं .ऐसे लोगो लो छोड़ा नहीं जाना चाहिए .
इसे रोकने के लिए महिलाओ को आगे आना होगा और सरकार को कानून को कठोरता के साथ लागू करना होगा. पर्याप्त प्रचार -प्रसार करना होगा .लडकियों की शिक्षा पर व्यापक ध्यान देने होंगे ताकि वे आत्मनिर्भर बन सके और यदि उनके ससुराल वाले कन्या भ्रूण हत्या करने को कहे तो वे उसका विरोध कर सके .अंत में एक लड़की के शिक्षित होने से पूरा समाज शिक्षित होता हैं .

महिला सशक्तिकरण का एक सशक्त माध्यम.?

महिलाये भारत की कुल आबादी का आधा हिस्सा हैं .संभवतः राष्ट्र के विकास के कार्य में महिलाओ की भूमिका और योगदान को पूरी तरह और सही परिप्रेक्ष्य में रखकर राष्ट्र निर्माण के कार्य को समझा जा सकता हैं. समूची सभ्यता में व्यापक बदलाव के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में महिला सशक्तिकरण आन्दोलन 20 वी शताब्दी के आखिरी दशक का एक महत्वपूर्ण राजनितिक और सामाजिक विकास कहा जाना चाहिए. भारत जैसे देश में जहाँ लोकतान्त्रिक तरीके से काम करने की आजादी हैं या यु कहे की एक सशक्त परम्परा हैं .जनमत जीवंत हैं और आधी आबादी के कल्याण में रूचि लेने वाला एक बड़ा वर्ग विधमान हैं . महिला सशक्तिकरण की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 8 मार्च ,1975 को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस से मानी जाती हैं .फिर महिला सशक्तिकरण की पहल 1985 में महिला अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन नैरोबी में की गई. भारत सरकार ने समाज में लिंग आधारित भिन्नताओ को दूर करने के लिए एक महान निति ‘महिला कल्याण नीति’1953 में अपनाई . महिला सशक्तिकरण का राष्ट्रीय उद्देश्य महिलाओ की प्रगति और उनमे आत्मविश्वास का संचार करना हैं.
महिला आरक्षण का इतिहास
सर्वप्रथम 1926 में विधानसभा में एक महिला का मनोनयन कर सदस्य बनाया गया परन्तु उसे मत देने के अधिकार से वंचित रखा गया. इसके पश्चात् 1937 में महिलाओ के लिए सीट आरक्षित कर दी गई जिसके फलस्वरूप 41 महिला उम्मीदवार चुनाव में उतरी .1938 में श्रीमती आर. बी.सुब्बाराव राज्य परिषद् में चुनी गई उसके बाद 1953 में श्री मति रेणुका राय केंद्रीय व्यवस्थापिका में प्रथम महिला सदस्य के रूप में चुनी गई . आजादी के बाद महिला आरक्षण के माध्यम से महिला सशक्तिकरण की शुरुआत सबसे पहले 1996 में संयुक्त मोर्चे की सरकार के दौरान तब हुआ जब सरकार ने इस आशय का बिल पारित करने के संकेत दिए .यह संकेत इस मुद्दे पर आम विचार -विमर्श के उद्देश्य से दिया गया . लेकिन उस समय से आज तक इस मुद्दे पर आम राय नहीं बन पा रही हैं . इसमे काफी विरोधावाश हैं. इसमे पहला सुझाव यह दिया गया की कानून में संशोधन कर पार्टियों को ही यह काम करने के लिए बाध्य कर दिया जाये की वह ही महिलाओ को 33 % आरक्षण दे . लेकिन इसमे कोई दो राय नहीं पार्टिया प्रत्यक्ष रूप से तो महिला आरक्षण की बात करती हैं मगर उनमे अंतर्विरोध बहुत हैं. यह एक मानी हुई बात हैं की महिला आरक्षण को कुछ देर तक टाला तो जा सकता हैं परन्तु इससे मुह नहीं मोड़ा जा सकता हैं.
संवैधानिक प्रावधान
संविधान का अनुच्छेद 14 से 18 में स्त्री और पुरुष को समानता का अधिकार दिया गया हैं. अनुच्छेद 15 (1 ) तथा 15 ( 2 ) में धर्म ,मूल ,वंश ,जाति,लिंग ,जन्म ,स्थान के आधार पर विभेद अमान्य हैं .इसमें महिला और पुरुष दोनों को सामान रूप से जीविका का निर्वहन हेतु पर्याप्त साधन उपलब्ध करने की चर्चा की गई हैं. लेकिन अनुच्छे 15 (3 ) कहता हैं की स्त्रियों की दयनीय स्थिति ,कुरीतियों के कारण होने वाले उत्पीडन ,बाल विवाह तथा बहु विवाह आदि के कारण शोषण की स्थिति में राज्यों में राज्यों को उनके लिए विशेष प्रबंध तथा विशेषाधिकार दिया जाना चाहिए. स्पष्टतः जहाँ भी आधी आबादी को सामाजिक ,पारिवारिक तथा स्वस्थ सम्बन्धी सुरक्षा के प्रश्न थे संविधान ने उन्हें पुर्णतः सुरक्षित किया हैं. वैसे महिला आरक्षण के मुद्दे पर सर्वसम्मति हो जाने के बावजूद भी के खास स्तर पर विरोध जारी हैं .महिलाओ के लिए आरक्षण की व्यवस्था के साथ पिछड़ी और दलित जातियों के महिलाओ के लिए उपव्यवस्था की जाये या नहीं .भारतीय जनता पार्टी ,कौंग्रेस और विभिन्न वामपंथी पार्टिया महिलाओ के लिए आरक्षण की व्यवस्था में जातीय व्यवस्था बनाने की विरोध में रही हैं परन्तु दलित और पिछड़ी जातीय के आधार पर राजनीति करने वाली पार्टिया यह भाजपा ,.कौंग्रेस पर यह आरोप लगाती हैं कि ये सभी दल एक साजिश के तहत सवर्णों को सत्ता के केंद्र में रखना चाहती हैं.
संसद और विधानसभाओ में महिलाओ को आरक्षण दिया जाने के पक्ष में तर्क
1 .जब संविधान का 73 वा और 74 वा संशोधन कर के महिलाओ को पंचायतो और नगर पालिकाओ में एक तिहाई आरक्षण दे दिया जा चूका हैं तो उसका विस्तार संसद और विधानसभा स्तर पर क्यूँ नहीं हो सकता हैं
2 .प्रतिनिधित्व से लडकियों की समक्ष एक नया रोल मोडल पेश हो सकेगा और इसका सकारात्मक असर महिला सशक्तिकरण के रूप में पड़ेगा.
3 .महिलाओ की आधी आबादी के नाते निति निर्धारण में उनकी समुचित भूमिका अति आवश्यक हैं. ,मतलब महिलाओ के लिए आधी सिट आरक्षित हो.
4 .महिलाओ की संख्या संसद या विधानसभाओ में नगण्य हैं क्यूँ की कोई भी दल महिलाओ को टिकट देना नहीं चाहता हैं.
5 .पुरुष के प्रभाव के चलते राजनितिक दल चुनाव में अधिक महिला उम्मीदवार को खड़ा करना नहीं चाहते हैं .अतः आरक्षण से सभी दलो द्वारा महिला उम्मीदवारों के चुनाव के समर्थन करना सुनिश्चित हो सकेगा. .
6 .महिलाओ को निरक्षरता दर पुरुषो की तुलना में काफी अधिक हैं .अतः संसद और विधानसभाओ में आरक्षण देकर उनकी चेतना का शीघ्र विकास किया जा सकता हैं.
73 वे और 74 वे संविधान संशोधन अधिनियम 1993 में पारित कर सरकार ने पंचायतो में आरक्षण देकर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया हैं. इस आरक्षण के फलस्वरूप पंचायतो और नगत निकायों में भी महिलाये पंचायत प्रमुख और नगर परिषद् अध्यक्षा जैसी महत्वपूर्ण पद पर पहुँच सकी हैं. संविधान के अनुच्छेद 243 (घ ) तथा 243 (न ) द्वारा आरक्षित एवम अनारक्षित वर्ग की महिलाओ हेतु 33 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई हैं. इस व्यवस्था से फलस्वरूप सभी प्रान्तों में ग्रामीण एवम शहरी पंचायत के सभी स्तर पर कई महिलाओ जनप्रतिनिधि के रूप में अपनी सफलता का निर्वाह सफलता पूर्वक कर रही हैं. संपूर्ण निर्वाचित पंचायत सदस्यों में 10 लाख महिलाए हैं जो महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में मिल का पत्थर साबित हो रही हैं. पंचायतो में निर्वाचित महिलाओ की संख्या विश्व में निर्वाचित महिलाओ की संख्या से भी अधिक हैं. बिहार,मध्य -प्रदेश ,हिमाचल प्रदेश सरकार ने महिलाओ को 50 प्रतिशत आरक्षण पंचायतो में दिया हैं. इन राज्यों में महिलाये ने अपने कार्यो के बदौलत नए -नए कीर्तिमान स्थापित किया हैं. बिहार में तो पंचायतो में निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों का संख्या 54 प्रतिशत तक जा पहुंची हैं. पंचायतो में महिलाओ को आरक्षण देने के फलस्वरूप जो महिलाये जनप्रतिनिधि के रूप में चुनकर आये हैं, वे अपने काम को ईमानदारी पूर्वक अंजाम दे रही हैं इससे यह साबित होता हैं, की महिलाये असहाय और निष्क्रिय नहीं हैं.
भारत में पंचायतो में महिलाओ को 33 प्रतिशत से बढाकर 50 प्रतिशत सीट आरक्षित कर दी गई हैं .लेकिन सत्ता का मुख्या केंद्र बिंदु विधानसभा और लोकसभा में महिलाओ के भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए हमारे राष्ट्रीय राजनितिक दल दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं. राज्यसभा से भरी विरोध के बाद पास महिला आरक्षण बिल को अभी लोकसभा और कम से कम 50 फीसदी विधानसभा को पर करना जरुरी हैं. यह काम कब तक होगा कहा नहीं जा सकता हैं. ?भारतीय संसद म महिला जनप्रतिनिधियों का प्रतिशत हमारे पडोसी देश पाकिस्तान ,नेपाल और इराक से भी कम हैं. इन देशो को देखा जाए तो रवांडा में महिलाओ की संख्या “लोअर हॉउस” में 56 .30 प्रतिशत हैं .आजादी के 62 साल बाद भी लोकसभा में महिलाओ की संख्या काफी कम (50 )हैं. ये आंकड़े शर्मनाक हैं. महिला सशक्तिकरण का वास्तविक उपलब्धि यह हैं की वह अपने संपूर्ण नारीत्व पर गर्व करे और अपने अन्दर आत्मविश्वास का संचार करे .उसमे अपनी शर्तों पर जीने का साहस हो . इसमे “महिला आरक्षण बिल” महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता हैं.
लोहिया के शब्दों में “शक्ति मौका आने पर प्रकट होती हैं और प्रकट होते- होते आगे बढाती हैं .शक्ति दबाने पर दबती चली जाती हैं ,की मानो हो ही और कभी नहीं हो रही” .भारतीय समाज में नारी को इतना दबा कर रखा गया कि उसे अपने क्षमताओ व सामर्थ्य पर विश्वास ही नहीं रहा. लोहिया ने महिलाओ कि स्थिति में सुधार एवम पुरुषवादी प्रभुत्व कि समाप्ती हेतु महिलाओ के लिए “विशेष अवसर की सिद्धांत” की मांग की.जिसमे पिछडो ,हरिजनों ,मुस्लिमो को शामिल किया गया था. और उन सबो के लिए साठ फीसदी आरक्षण की मांग की गई थी . यह अत्यंत विषाद एवम दुर्भाग्य का विषय हैं कि यदि सैद्धांतिक स्तर पर आरक्षण अनुचित हैं तो सभी वर्गों के लिए होनी चाहिए .सिर्फ महिलाओ के सन्दर्भ में क्यूँ ? अन्य पिछडो के विकास में आरक्षण जरुरी हैं तो महिलाओ के क्यूँ नहीं .क्या महिलाये वंचित नहीं रही हैं.?सामाजिक न्याय के कथित पक्षधर इस बात का विरोध कर रहे हैं की इसमे “कोटे में कोटे” की पद्धति नहीं अपनी गई हैं. वे महिलाओ को अगड़े -पिछड़े में बाटने की घृणित अपराध व खतरनाक कोशिश कर रहे हैं. ताकि महिला आरक्षण पर आम राय नहीं बन पाए और वह विधेयक लोक सभा और विधानसभा में पास होने का बाट जोहता रहे.ऐसी विषम स्थिति में महिला और पुरुष को मिलकर समता और समृद्धि पर आधारित अभियान चलाना होगा .अन्यथा सशक्तिकरण का सपना बस सपना ही रह जायेगा. इस बात स्वीकार किया जाना चाहिए की कोई भी आरक्षण विभेदकारी होता हैं और इससे समानता के सिद्धांत का उल्लघंन होता हैं. और योग्यता को निम्न प्राथमिकता मिलती हैं. इस प्रकार बहुत से योग्य उम्मीदवारों में हताशा होगी . अतः किसी भी आरक्षण की विधिमान्यता की परखा इस आधार पर की जा सकती हैं की क्या यह किसी तर्कसंगत तथा प्रांसगिक मानदंड पर आधारित हैं.
लेकिन सवाल उठता हैं की क्या आरक्षण देने से आम महिलाओ की जिन्दगी में फर्क आ पायेगा? महिलाओ के लिए राजनितिक पदों पर बैठना और ऐसे पदों का उपयोग आम महिलाओ के कल्याण के लिए करना अलग बात हैं. यह मानना गलत होगा की महिलाओ के संसद में पहुचने मात्र से आम महिलाओ का भला हो जायेगा. क्यूँ की ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जिसमे महिला जनप्रतिनिधि के द्वारा ही कई ऐसे योजनाओ को बंद किया गया जो महिलाओ के कल्याण से सम्बंधित थी. यह कतई नहीं समझा जाना चाहिए की महिलाए संसद में पहुंचकर महिला से सम्बंधित कार्य में रूचि लेंगी.यहाँ यह संभावना बलवती हैं की चुनिन्दा महिलाओ को दिखावटी रूप से संसद में स्थान देकर उन्ही नीतियों का समर्थन के लिए बाध्य किया जायेगा जिसे पुरुष चाहते हैं. वे खुद से निर्णय नहीं ले सकेंगे .महिला आरक्षण के मामले में दलितों के आरक्षण के मॉडल का पालन करना गलत होगा. इस प्रयास से आम दलितों का भला नहीं होगा उलटे दलितों पर अत्याचार होगा ऐसा पहले भी हुआ हैं. दलितों को आरक्षण देने से 120 दलित संसद में पहुचे परन्तु आज भी दलितों की समस्या ज्यो की त्यों बनी हुई हैं. कारण यह हैं की किसी दलित का जनप्रतिनिधि का चुना जाना अलग बात हैं और दलित सशक्तिकरण अलग बात हैं.
निष्कर्ष —— आरक्षण से ज्यादा जरुरी हैं महिला की स्थिति को सशक्त बनाना और उन्हें आर्थिक और सामाजिक रूप से सबल बनाया जाये जिससे उनमे आत्मविशवास आये और वे अपने हक़ की लड़ाई बिना किसी के सहयोग के खुद लड़ सके .महिलाओ की शिक्षा ,सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए . आरक्षण सच्ची लोकतान्त्रिक प्रक्रिया और महिलाओ की भागीदारी का विकल्प नहीं हो सकता हैं ,परन्तु इस दिशा में यह एक सही कदम हैं.

Friday, 29 June 2012

कब तक अपमान सहन करू ?

तमाम विरोधभास के बावजूद हमारे देश में एक ओर तो यह सच है कि महिलायें परिवार की धुरी होती हैं तथा भले ही कमाई पुरूष वर्ग करता है। लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि अगर महिलायें नौकरी पेशा और कमाऊ हैं तब भी उनकी आय का सारा हिसाब पुरूष ही रखते है। महिलायें अपनी सारी कमाई अपने पति के हाथों में सौंप देती है, एटीएम के युग में पत्नियों के एटीएम कार्ड का पासवर्ड भी सिर्फ पति महोदय को ज्ञात रहता है। कुल मिलाकर यह भी सच है कि हमारे देश में महिलायें अपनी कमाई का भी मनमाफिक उपयोग नहीं कर सकती है। उनकी भुमिका पारिवारिक व्यय के लिए सिर्फ सूचना प्रदाता तक ही सीमित है और आर्थिक मामलों पर निर्णय की बात सिर्फ उनकी सलाह तक ही सीमित है। इस संदर्भ में पुरूष वर्ग यह  तर्क देता है कि महिलाओं में न तो वित्तीय मामलों की समझ होती हैं और न ही वो इसकी अधिकारी है। इस तरह महिला सशक्तीकरण के तमाम दावों के बीच अब भी आर्थिक मुद्दों पर पूर्ण रूप से पुरूष वर्ग का ही वर्चस्व है। ऐसें में अगर महिलायें परिवार के खर्चों का हिसाब रखने की भूमिका से संतुष्ट हैं तो यह उनके सशक्तीकरण के मुद्दे को भी कमजोर करता है तथा परिवार और समाज के लिए भी नुकसानदायक है। क्योंकि आज परिवारिक मामलों में महिलाओं की भूमिका बढ़ने से यह जरूरी है कि वो पारिवारिक आर्थिक मामलों की भी समझ विकसित करें। मसलन वो आय व्यय में संतुलन के लिए पारिवारिक बजट बनाने के साथ साथ बचत और निवेश की जरूरतों को भी समझें। एक अच्छा बजट परिवार को आने वाले आर्थिक संकट से सुरक्षित रखता है।
महिलायें पारिवारिक जरूरतों पर मुद्रास्फीति और मंहगाई के प्रभाव को भी समझे, महिलायें पारिवारिक खर्च पर काफी हद तक नियंत्रण कर सकती हैं जैसे बिजली, फोन अनाज और उपयोगिता से जुड़े तथ्यों का अध्ययन कर इन पर होने वाले अपव्यय को रोक सकती है। महिलाओं के लिए जरूरी है कि उन्हें पारिवारिक और पति की संपति संबंधी अधिकार के संबंध में कानूनी प्रावधानों की जानकारी हो। नामिनी और संरक्षक सम्पति संबंधी अधिकार का ज्ञान होना चाहिए। महिलाओं को बैंकिंग और बचत के तमाम साधनों की जानकारी भी होना चाहिए जो कि उन्हें नहीं रहती है। यह जरूरी है कि महिलाओं को पति की आय और व्यय का पूरा पूरा ज्ञान हो साथ साथ यह भी जरूरी हैं कि पति के द्वारा किए गए निवेश, बैंक खातों, जमा और उधारी का भी ज्ञान होना चाहिए। क्योंकि किसी अनहोनी वश पति के साथ कोई हादसा हो जाए तो महिला को आर्थिक मामलों संबंधी किसी प्रकार की कानूनी समस्या से परेशानी न हो। पति द्वारा परित्याग और तलाक के मामलों में भी महिलाओं को आर्थिक मामलों में काफी परेशानी और अपमान झेलना पड़ता है अगर महिलाओं को इनसे संबंधित कानूनी प्रावधानों का ज्ञान हो तो इस प्रकार की समस्याओं से बचा सकता है। वृद्वावस्था महिलाओं को काफी कष्टप्रद होती है क्योंकि उनके उपर होने वाले व्यय से उनके बच्चे भी कन्नी काटते हैं इसके लिए जरूरी है कि उन्हे बीमा और पेंशंन योजनाओं का ज्ञान कराया जाए।
आज जिस तरह महिलाओं की भूमिका समाज और व्यवसाय के क्षेत्रों में बढ़ी है उस हिसाब से वो बच्चों के जन्म तथा उनकी शिक्षा दीक्षा के लिए आर्थिक सुदृढ़ता पर विचार करने लगी हैं यह महिला सशक्तीकरण की राह में शुभ संदेश है। लेकिन महिला सशक्ती करण की  यह बात महिलाओं को वित्तीय साक्षर करने से ही पूरी होगी। तथा पारिवार की आर्थिक सुरक्षा के लिए भी महिलाओं को वित्तीय साक्षर करने की जरूरत है क्योंकि वो होम मेकर यानि घर चलाने वाली है। क्योंकि यह बात सच है कि चाहे ग्रामीण निरक्षर महिला हो या फिर आधुनिक सीईओ महिला। सबको कही न कहीं वित्तीय साक्षरता की जरूरत हैं क्योंकि कामकाजी महिलाओं को बजट और बचत का उर्पयुक्त ज्ञान ही नहीं हैं। तथा ग्रामीण महिलायें वित्त के मामलों में लगभग पराधीन होती हैं और उनकी न तो कोई राय होती है लेकिन वो पारिवारिक बचत तथा आयवृद्वि में अहम रोल अदा कर सकती है इसके लिए उन्हें स्व सहायता समूहों से जोड़कर स्वावलम्बन के कार्यक्रम से जोड़कर और बैंकिग  की जानकारी, पोस्ट आफिस बचत तथा पारिवारिक सम्पति संबंधी अधिकारो से सशक्त किया जा सकता हैं। इसके लिए ग्रामीण महिलाओं के लिए पंचायत या स्वसहायता समूह की बैठकों के दौरान वित्तीय साक्षरता का ज्ञान दिया जा सकता है।
हमारे देश में इस संदर्भ में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड(सेबी) ने अपने वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम के जरिए ग्रामीण महिलाओं में वित्तीय साक्षरता का संदेश पहुंचाया है इसके लिए सेबी ने स्वसहायता समूह से जुड़ें महिला समूहों को साथ लिया हैं,तथा समाज के विभिन्न समूहों से जूड़ी महिलाओं के लिए फायनेंसियल लिटरेसी फार होम मेकर्स के नाम से कार्यक्रम प्रारम्भ किया है। उड़ीसा में मिशन शक्ति के नाम से महिलाओं को वित्तीय रूप साक्षर करने का कार्यक्रम प्रारंभ किया गया है। वैश्विक स्तर पर भी वित्तीय साक्षरता के जरिये महिला सशक्तीकरण के कार्यक्रम चलाए जा रहें है। अमेरिका और कनाडा के साथ साथ केन्या और घाना जैसे देशों में महिलाओं को पारिवारिक बजट के साथ बचत के तरीकों, बैंकिग सुविधाओं के उपयोग की जानकारी तथा पेंशन संबंधी योजनाओं से अवगत कराया जाता हैं। विकसित देशों के साथ घाना जैसे देश ने नेटवर्क आफ यंग वूमेन के नाम से युवा लड़कियों के बीच वित्तीय साक्षरता के कार्यक्रम चलाए है।
वास्तव में महिलाओं को सशक्त करने के लिए जरूरी हैं कि उन्हें स्कूल और कालेज स्तर पर वित्तीय साक्षरता के कार्यक्रम से जोड़ा जाए। ग्रामीण क्षेत्र में महिलाओं के बीच कार्य करने वाले संगठनों और स्वयं सेवी संगठनों को इस कार्य से जोड़ा जाए। शहरी क्षेत्र में भी कामकाजी महिलाओं के बीच वित्तीय जागरूकता से जूड़े कार्यक्रमों को अनिवार्य किया जाए।

मुस्लिम शराब नहीं पीते है.?

मुस्लिम अक्सर बहुत ही गर्व से छाती फुला कर बोलते रहते हैं कि..... इस्लाम में शराब पूरी तरह प्रतिबंधित है... और, कोई भी मुस्लिम शराब नहीं पीता है...!

लेकिन... आप यह जानकर हैरान रह जायेंगे कि.... ये एक बहुत ही चालाकी से फैलाया गया झूठ है... और, हकीकत इसके बिलकुल ही विपरीत है...!

मुस्लिम तो मुस्लिम..... इस्लाम के प्रतिपादक और तथाकथित रूप से अल्लाह के भूत.... सॉरी... दूत.... मुहम्मद साहब ना सिर्फ शराब पीते थे.... बल्कि वे तो शौचालय से आने के बाद शराब से ही वजू तक करते थे.....!

ये बातें मैं कोई मनगढ़ंत तौर पर नहीं कह रहा हूँ.... बल्कि अपनी कमअक्ली के कारण मुहम्मद साहब ने खुद अपने कुरान में लिख छोड़ी है.... ताकि हम जैसे लोग उसे पढ़ कर मुस्लिमों के झूठ का भांडा फोड़ सकें...!

लीजिये.... आप भी.... कुरान की वो सम्बंधित आयतें पढ़े....... और, मुहम्मद साहब से सम्बंधित अपने सामान्य ज्ञान में वृद्धि करें....

१. जाबिर बिन अब्दुल्ला ने कहा कि..... रसूल ने मुझ से कुछ चीज पीने के लिए लाने को कहा... मैंने पूछा कि ..."क्या मैं आपके लिए "नबीज़ (शराब) दूँ....?

रसूल ने कहा .....हाँ वही लाओ.

थोड़ी देर बाद जब मैं नबीज़ (शराब) एक बर्तन में लेकर आया तो रसूल ने पूछा कि जबीर क्या तुमने बर्तन को पत्तों और टहनियों से ठीक से ढक कर लाये हो (ताकि किसी को पता न चले)

मैंने कहा......... हाँ मैं छुपा कर लाया हूँ......... यह सुन कर रसूल ने बर्तन लेकर नबीज (शराब) पी ली. ..............मुस्लिम -किताब 1 हदीस 3753.

2 -मुहम्मद ने शराब से वजू किया ----

अब्दुल्लाह बिन मसूद ने कहा कि........वह रसूल के पास था ......रसूल ने वजू के लिए पानी का बर्तन लाने को कहा मैंने कहा कि बर्तन में तो शराब रखी है.

रसूल ने कहा कि तुम वही बर्तन लाओ ....मुझे वजू करना है .

फिर रसूल बोले ........ ऐ अब्दुल्ला बिन मसूद , शराब तो एक पेय है जो सिर्फ शुद्ध करती है .....फिर रसूल ने उसी से वजू किया .... -Musnad Ahmad - Hadith #3594.

3 -रसूल के लिए शराब बनती थी ---

इब्ने अब्बास ने कहा कि रसूल के लिए "नबीज़ "बनाई जाती थी ..... जिसे ऊंट के छाडे की कुप्पी में भरकर रात को रसूल के घर भेज दिया जाता था .

रसूल सोमवार की रात से मंगल की दोपहर तक शराब पीते थे .अगर बच जाती थी .तो गुलामों को दे देते थे .या लुढ़का देते थे ..... सही मुस्लिम -किताब 23 हदीस ४९७२ और 4974.

4 -मुहम्मद ने शराब से रोजा खोला ---

अबू हुरैरा ने कहा कि, जब रसूल रोजे में होते थे तो मैं उनका इंतजार करता था कि.... वे रोजा कब खोलें...

और, जब वह रोजे में नही होते थे... तो, मैं उनको नबीज पेश कर देता था.

मैं नबीज तभी देता था जब वह अच्छी तरह से तैयार हो जाती थी.

रसूल कहा करते थे कि यह नबीज उन्हीं लोगों के लिए है जो अल्लाह और आखिरत पर ईमान रखते हैं...... सुन्ननअबू दौउद -किताब 26 हदीस 3707.

### अब लगे हाथ ये भी जान लें कि ... नबिज क्या होता है...

नबीज खजूरों को सडा कर उसमे खमीर उठाकर बनाई गयी तेज शराब होती है अंगरेजी में इसे Wine कहते हैं .

All of the following dictionaries confirm that نبيذ (nabidh) means Wine:

अरबी शब्दकोश لسان العرب लिसानुल अरब में نبيذ नबीज़ का अर्थ الخمر अल खमर यानी शराब है मुहम्मद वही पीता था.

@@@@ उपरोक्त हदीसों को पढने के बाद यह स्पष्ट है कि ...... इस्लाम के प्रतिपादक और कथित रूप से अल्लाह के दूत मुहम्मद साहब ... न सिर्फ शराब पीते थे..... बल्कि शराब में ही डूबे रहते थे....... शायद इसीलिए मुहम्मद साहब ने मुस्लिमों को जन्नत में ""शराब और हूरों ( लड़कियों) का लालच दे रखा है...!

अब...... साथ ही इस्लाम का दोगलापन देखें कि... कुरान के ही सूरा-अल मायदा 5 :90 में शराब पीने को शैतान का काम बताया गया है ..!

तो क्या मुस्लिम...... अपने पियक्कड़ रसूल अर्थात मुहम्मद को ""शैतान "" मानने को तैयार हैं....?????

इसीलिए..... इन हदीसों के बाद .... अब, या तो मुस्लिम ये कबूल करें कि....... या तो उनका रसूल एक शैतान है क्योंकि वो शराब पीता था..... या फिर कबूल करें कि.... इस्लाम में शराब प्रतिबंधित नहीं है...!


नोट: ये लेख किसी प्रकार की दुर्भावना से नहीं लिखा गया है .... बल्कि सभी को सभी धर्मों की जानकारी देने के पवित्र उद्देश्य से लिखी गयी है...!

यदि किसी सज्जन अथवा दुर्जन को इस लेख से कोई आपत्ति हो तो ..... वो मुझसे और सबूत मांग सकता/ सकती है..

Tuesday, 5 June 2012

शांती चाहिए तो परतंत्रता से मुक्त हो

किसी की अनुकूलता में बाधक न बनने और हमको जो प्रतिकूल हो, ऐसे व्यवहार का दूसरों के प्रति आचरण न करने के लिए सबसे पहली बात है कि हम पर-पदार्थों को अपना मानना छोड दें। समझ लीजिए कि जो कुछ आप देख रहे हैं, वह सब ‘पर’ हैं और आप इनसे ‘पर’ हैं। जब तक इन दृष्टव्य भौतिक पदार्थों से मेरी आत्मा दूर नहीं होगी, तब तक मेरी आत्मा आधि, व्याधि और उपाधि से बच नहीं पाएगी। भौतिक पदार्थ भी इच्छा करने या प्रयत्न मात्र से नहीं मिल जाते, क्योंकि मैं चाहे कितनी भी चाहना करूं या उन्हें पाने के लिए कितने ही प्रयत्न करूं, वे मिल ही जाएं यह जरूरी नहीं, क्योंकि वे भाग्याधीन हैं। ऐसे पदार्थों के पीछे जीवन बर्बाद करना और जो मेरा है, उसे भूल जाना, यह निरी मूर्खता है। जो मेरा है, उसका प्रादुर्भाव तब होगा जब मैं पर से मुक्त बन जाऊं।
इस प्रकार स्व-पर का विवेक करने के बाद स्व को उन्नत बनाने की कोशिश कीजिए। अनंतज्ञानियों द्वारा बताए गए मार्ग का इस प्रकार अनुसरण कीजिए कि किसी भी संयोग में जो अपने को प्रतिकूल व्यवहार है, उसका आचरण किसी के प्रति न हो। इस प्रकार यथासंभव सबके अनुकूल बतार्व का प्रयत्न शुरू होगा तो जीवन में हिंसा की जगह अहिंसा का आगमन होगा, असत्य की जगह सत्य आएगा, अनीति का स्थान नीति ले लेगी, विषय-विलास की जगह विषय-वैराग्य का प्रादुर्भाव होगा, पर-पदार्थ की मूर्च्छा जाएगी और दुनिया की वस्तुओं के प्रति जो ममत्व बुद्धि है, वह खत्म हो जाएगी।
इससे क्रोध की जगह क्षमा, मान की जगह मृदुता, माया के स्थान पर सरलता और लोभ के स्थान पर संतोष आएगा। इसके साथ वैराग्य, समभाव आएगा और कलह-क्लेश का नाम भी नहीं रहेगा। किसी पर आरोप लगाना, चुगली करना, सांसारिक सुख के पदार्थों के वियोग के कारण हर्ष-शोक करना, पर-निंदा की बुरी आदत इत्यादि पाप खत्म हो जाएंगे। जीवन में धर्म आने लगेगा और अठारह प्रकार के पाप अपने आप जाने लगेंगे। ऐसी आत्मा कभी किसी के लिए दुःखरूप नहीं बनेगी या किसी को दुःखी नहीं बनाएगी।
जिसके जीवन में धर्म नहीं है, उसको शान्ति तो नहीं ही मिलेगी, वह दूसरों के लिए भी शापरूप बन जाएगा। इस बात का विचार करके, धर्म को अपना साथी बनाने का आपको प्रयत्न करना होगा। जो पुण्यात्माएं धर्म को साथी बनाकर अपना जीवन जीने का निर्णय करेंगी, वे इस भव में भी सुख और शान्ति का अनुभव करेंगी और पर-भव को भी सुधारकर अन्ततः परम् शान्ति को प्राप्त कर सकेंगी। सभी इस प्रकार का वर्तन करें और परम् शान्ति को प्राप्त करें, यही शुभेच्छा है

Friday, 13 April 2012

ऊंट मूत्र और इस्लाम

 मेरे कई हिंदू मित्र (विशेषकर श्रीलंका ई तमिल)बहुत परेशान रहते थे, हमारे कई पाकिस्तानी मित्र अक्सर बातों बातों मे हिंदुओं की कई प्रथा ( जो काफ़ी वैज्ञानिक है, जिसपर में कुछ शोध कर रहा हूँ,और आगे लिखूंगा भी) का मज़ाक उड़ाते थे, जिनमे सबसे ज़्यादा गोमूत्र का सेवन है.
 सबसे पहले मैं ये बता दूं की में एक धर्मनिरपेक्ष यानी सेकुलर इंसान हूँ,( संघी और भाजपा वेल जिसे गाली समझते हैं) क्यूंकी में एक हिंदू हूँ, और इस विश्व में एकमात्र हिंदू ( इसमे में जैन, बौद्ध ,सिख को भी मानता हूँ) ही है जो धर्मनिरपेक्ष या सेकुलर है. क्यूंकी इसीमे ये कहने क़ी ताक़त है " सर्व धर्म सम भाव"("वैसे धर्म की भी अलग व्याख्या है, उसपर फिर कभी चर्चा करेंगे.)
 तो मैं अब्राहिमक धर्मों ( यहूदी,ईसाई,इस्लाम) का भी उतना ही सम्मान करता आहुं जितना धार्मिक (हिंदू,सिख,बौद्ध,जैन) का. अतएव किसी मुस्लिम,यहूदी या ईसाई भाई या बहन को चोट पहुँचे तो मैं अभी ही कहूँगा आगे ना पढ़े और क्षमा करें.
 हाँ तो में कह रहा था कि अक्सर हम पब में बैठके कई चर्चा करते थे,जिसमे धर्म भी था, और जैसा की गैर हिंदू यही समझते हैं हिंदू यानी गाय का मूत्र पीने वाला व्यक्ति,तो एक श्री लंकाई मित्र ने अपना दुख रोया की यार ये हमारे धर्म मे ऐसा क्यूँ है,जिसकी वजह से हमे बेइज्जत होना पड़ता है, यह गाय मूत्र ,मूर्ति पूजा ये सब क्या और क्यूँ है?
 उसका रोना वज़िब था, क्यूंकी जिस धर्म में वा पैदा हुआ उसके बारे में उसे कोई जानकारी नही थी और कोई बताने वाला नही था,साथ बैठे एक पाकिस्तानी मित्र ने तुरंत कहा कि इसीलये आप लोगों को सच्चे धर्म याने इस्लाम को अपनाना चाहिए,एक अंग्रेज़् मित्र जो की प्रॉटेस्टेंट ईसाई था,वो भी कहने लगा "हा यार, तुम लोग गाय का पिशाब क्यूँ पीते हो? और अगर ऐसा तुम्हारे धर्म में है तो उसे छोड़ कर सही रास्ते पे आना चाहिए."
 मैं मदिरा नही पीता इसीलये शरबियों के साथ बैठने में बहुत मज़ा आता है, उनकी हरकतें देखने मेइन.
तब मैने कहा" यानी जिस धर्म में मूत्र पीना लिखा हो,या मूत्र peene kaa व्याख्यान हो वो धर्म बेकार है"? "
" बिल्कुल"मुझे उत्तर मिला.
 मैने जे2ओ का एक सीप लिया,
और कहा" हदित सहीह-अल-बुख़ारी 8:82:794:- उक्ल नाम के कबीले के कुछ लोग पैगंबर के पास आए और इस्लाम कबूल किया,मदिने का मौसम उन्हे नही भाया और वे बीमार पड़ गये, तो पैगंबर ने फरमाया की जाओ और जो यहा पे हमारे उंटों का झुंड है, उनका दूध और मूत्र पीओ, उन्होने ऐसा ही किया और वे स्वस्थ हो गये. उसके बाद रात में उन्होने ऊँट के रखवाले को मार डाला और ऊँटों को लेकर भाग गये, पैगंबर को जब ये पता चला तो उन्होने तुरंत उनका पीछा करवाया और उन्हे पकड़ कर उनके सामने लाया गया, तब पैगंबर ने उनके हाथ, पाव कटवा दिए और उनकी आँखों को गर्म लोहे की सलाखो से दगवा दिया."
अब आप बाइबल की सुनें:"Proverb:5:15: Drink waters out of thine own cistern, and running waters out of thine own well."
और सुनें:  Ezekiel 4:12-15And thou shalt eat it  as barley cakes, and thou shalt bake it with dung that cometh out of man...Then said I, Ah, Lord God, behold, my soul hath not been polluted: for from my youth even till now have I not eaten of that which dieth of itself...Then he said unto me, Lo, I have given thee cow’s dung for man’s dung, and thou shalt prepare thy bread therewith”
यानी परमात्मा ने मानव मल का उपयोग करने के लिए कहा, परंतु जब लोगों के इससे घृणा की तो उन्होने गाय के गोबर का उपयोग करने को कहा. ( मज़े की बात ये है की वेटिकन की वेब साइट मे एज़ाइकिल 4:12 से 15 गायब है, सीधे 4:11 से 16 पे जंप है. तो वो खुद भी इस भाग को निकाल देना चाहते हैं. रेफरेन्स के लिए http://www.vatican.va/archive/ENG0839/__PRC.HTM देखें, जो वॅटिकेन की ओफ़िसियल वेब साइट है.
खैर मेरे यह उदाहरण देने के बाद कुछ लोगों का चेहरा तमतमा गया और कुछ लोग बहुत खुश हो गये,( वैसे इस पर अभी बहुत बहस होनी बाकी है,) लेकिन मेरे हिंदू मित्रों को कुछ  राहत अवश्य मिली , मूत्र पुराण के तानों से.
और भी आगे बहुत कुछ हुआ, लेकिन फिर कभी....

Tuesday, 14 February 2012

वैलेंटाइन डे पर प्रेम नहीं बल्कि सेक्स ट्वायज का बाजार बन गया है !


नोट --निश्चय ही मेरा ब्लॉग मेरे स्वाभाव से बिपरीत है पर जो सत्य प्रतीत हो रहा है आज के समय में वही लिख रही हु !

फरवरी माह के प्रारंभ होते ही प्रेमी जोड़ियों की उत्सुकता और उनका उत्साह अत्याधिक बढ़ने लगता है. उनके इस बढ़ते उत्साह का सबसे प्रमुख और शायद एकमात्र कारण चौदह फरवरी यानि कि वैलेंटाइन डे होता है. पूर्ण रूप से लव-बर्ड्स को समर्पित इस दिन को रोमांटिक बनाने के लिए प्रेमी जोड़े काफी पहले से इससे संबंधित योजनाएं बनाना शुरू कर देते हैं. लेकिन आज जब व्यक्तिगत भावनाओं के क्षेत्र में बाजार भी अपनी महत्वपूर्ण और शायद जरूरी भूमिका निभाने लगा है तो वैलेंटाइन डे केवल आपसी मसला ना रहकर कमाई का एक बड़ा साधन बन गया है. जहां एक ओर यह बाजार आपको खुल कर अपनी भावनाएं व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है वहीं बाजार के माध्यम से आप अपने प्रेमी को आकर्षक तोहफे भी दे सकते हैं !.


लेकिन इस बार वैलेंटाइन डे पर बाजार की मंशा पहले के मुकाबले थोड़ी ज्यादा अलग है. क्योंकि इस बार बाजार ने प्रेमी जोड़ियों के बीच रोमांस या प्यार जैसे भावों को कोई महत्व नहीं दिया है. टेडी बियर, फूल, ग्रीटिंग कार्ड्स और अन्य भावपूर्ण तोहफों को दरकिनार कर बाजार अब कामुकता और भोग की भावना को प्रबल करने की फिराक में है क्या यह समाज के हित में है ?.


मेट्रो शहरों की बात करें तो यहां वैलेंटाइन डे के आयोजन के लिए रेस्त्रां और डिस्को मालिक, प्रेमी जोड़ियों से कहीं ज्यादा उत्सुक नजर आ रहे हैं. इस बार उन्होंने जोड़ियों के लिए कामसूत्र नाइट का आयोजन किया गया है, जिसके अंतर्गत 14 फरवरी वाले दिन प्रेमी जोड़ियों की प्राइवेसी के लिए के लिए वहां रोमांटिक अंदाज में टेंट लगाए जाएंगे. इतना ही नहीं जो लोग रात को ठहरना नहीं चाहते उन्हें जाते समय वोडका में डूबे हुए चॉकलेट फूल दिए जाएंगे. पब मालिकों का कहना है कि इस बार हम जोड़ियों को ज्यादा बोल्ड वेलकम देना चाहते हैं. कई पब और डिस्को के प्लान में 20,000 रुपए में गोवा की ट्रिप भी शामिल है.यह सभी बाते समाज को किस दिशा में ले जा रही है ?


भारत में सेक्स ट्वायज बेचने और लाने पर बैन है, लेकिन इस बार अवैध रूप से ही सही यह भी खरीददारों को कम मूल्य में उपलब्ध है. यही कारण है कि युवा अब एक-दूसरे को तोहफे के रूप में यह सब देना ज्यादा पसंद कर रहे हैं.क्या यही भारतीय संस्कार है ?


एक सेक्स ट्वायज विक्रेता की मानें तो इस बार उसने बहुत अच्छी खासी बिक्री की है. मतलब साफ है कि अब हमारे युवाओं का शारीरिक संबंधों के प्रति बढ़ते उत्साह और क्रेज को बाजार भी मनचाहे ढंग से कैश कर रहा है. वर्तमान परिदृश्य के अनुसार आज हमारी प्रेम रूपी भावनाओं पर सेक्स पूरी तरह हावी हो चुका है. यही कारण है कि विवाह से पहले और विवाह के पश्चात अन्य व्यक्तियों के साथ शारीरिक संबंध होना आज के समाज की पहचान ही बन गई हैजो की भारतीय समाज के हित में नहीं है यदि इसी प्रकार से पतन होता रहा हमारे देश के यूवाओ का तो निश्चय ही हम सभी इसके लिए गुनहगार है आपकी क्या राय है ??


Monday, 13 February 2012

भारत में एक लड़की के रूप में जन्म लेना गुनाह है क्या ?

अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो। इस जुमले को अब बदल देना चाहिए। अगले जन्म मोहे बिटिया तो कीजो लेकिन भारत में न पैदा कीजो । आखिर क्यों बिटिया का भारत में जन्म लेना अभिशाप है। पिछले साल उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की पत्नी सलमा अंसारी ने दिल्ली में कहा था कि भारत में लड़कियों को पैदा होते ही मार देना चाहिए। उनके इस बयान पर ख़ूब विवाद हुआ था। ज़ाहिर है सलमा अंसारी का आशय भारतीय समाज में लड़कियों से किए जाने वाले भेदभाव और महिलाओं के ख़िलाफ़ बढ़ते अपराधों पर अपना आक्रोश जताना था। ये कहते वक्त सलमा अंसारी के मन में जो कुछ भी रहा हो लेकिन संयुक्त राष्ट्र के ताज़ा आंकड़ों ने उनके बयान पर मुहर लगा दी है। इन आंकड़ों के मुताबिक बच्चियों के अस्तित्व को दुनिया में भारत से ज़्यादा ख़तरा किसी और देश में नहीं है।
ये दुर्योग ही है कि संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग (UN-DISA) ने बच्चियों की भारत में भयावह स्थिति को लेकर आंकड़े ज़ाहिर किए तो दिल्ली के एम्स में भर्ती दो साल की मासूम फ़लक की दर्दनाक कहानी सबके सामने है । संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के ज़िक्र से पहले फ़लक की बात कर ली जाए । फ़लक को जिस 15 साल की लड़की किशोरी (काल्पनिक नाम) ने एम्स में बुरी हालत में भर्ती कराया, उसकी आपबीती भी कम रौंगटे खड़े करने वाली नहीं है। किशोरी पर आरोप है कि उसने वहशी की तरह नन्ही सी जान फलक को पीटा, सिर पटक कर दे मारा, मुंह पर बुरी तरह से काटा । फ़लक की हालत देखकर किसी का भी कलेजा मुंह को आ सकता है। लेकिन सवाल ये भी है कि 15 साल की किशोरी के सिर पर दरिंदगी क्यों सवार हुई। क्या ये लड़की खुद उसके साथ जो अपने-परायों ने किया, उसका बदला मासूम से लेना चाहती थी । या वो नहीं चाहती थी कि जो उसके साथ हुआ  वो बड़ी होने पर फ़लक को भी झेलना पड़े। 
भारत में लड़कियों से किया जाने वाला भेदभाव और संसाधनों तक उनकी कम पहुंच ने भारत को लड़कियों के वजूद के लिए सबसे ख़तरनाक जगह बना दिया है। यहां बच्चियों को खाना देने में, बीमार पड़ने पर डाक्टर के पास ले जाने में, यहां तक कि जीवन रक्षक टीके लगवाने में भी लड़कों के मुकाबले दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है। एक तरफ़ समाज में लड़कियों के लिए विषम परिस्थितियां है तो बड़ी होने पर उनके खिलाफ बलात्कार, छेड़छाड़ जैसे अपराध देश में लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। ऐसे में बिटिया क्यों न कहें…अगले जन्म मोहे भारत में पैदा न कीजो…

Sunday, 12 February 2012

भारतीय समाज पर गंभीर प्रश्न ?


नई दिल्ली में महज दो वर्ष की एक बच्ची के साथ हुए अमानवीय बर्ताव और दरिंदगी की घटना को सुनकर पूरा देश चकित है। इसे लेकर मीडिया और बुद्धिजीवियों में एक तरह की बहस छिड़ी हुई है, लेकिन महिलाओं और लड़कियों के साथ ऐसी न जाने कितनी भेदभाव की घटनाएं आए दिन होती रहती हैं जिनका संज्ञान शायद ही किसी को होता है। फिर बात चाहे कन्या भ्रूण हत्या की हो, दहेज अपराधों की अथवा घरेलू हिंसा की। इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक कल्याण विभाग की यह रिपोर्ट कोई बहुत चौंकाने वाली नहीं है कि लड़कियों की असुरक्षा के मामले में भारत सबसे ऊपर है।
जनगणना आंकड़ों से भी पता चलता है कि भारत में महिला और पुरुष का अनुपात काफी असंतुलित है, जो प्रति 1000 पुरुषों पर महज 914 महिलाओं का है। आज यह एक आम धारणा बन गई है कि भ्रूण हत्या दहेज मांगों की वजह से होती है, क्योंकि परिवार दहेज की वजह से बेटियों को बोझ समझकर उन्हें पैदा ही नहीं होने देना चाहते। मैं इस विचार और तर्क से सहमत नहीं। दहेज बेटियों की अवमानना का कारण नहीं, बल्कि महज लक्षण है। दहेज केवल उन्हीं संप्रदायों में दिया जाता है, जिनमें बेटियों को संपत्ति अधिकार से वंचित किया गया है। यह कुचक्र अंग्रेजी शासन काल के दौरान चला, जिसके तहत भूमि बंदोबस्त अभियान व संपत्ति संबंधी कानूनों में बहुत से स्त्री विरोधी फेरबदल किए गए। इनमें सबसे अहम बदलाव मातृवंशी परिवारों को पितृवंशी संपत्ति वितरण प्रणाली की ओर धकेलना और परंपरागत सामूहिक पारिवारिक संपत्ति को निजी संपत्ति में बदल दिया जाना था। पारिवारिक सामूहिक संपत्ति की व्यवस्था आदिवासियों और जनजातियों में होती है, जिसमें हर एक को समान रूप से चाहे वह अजन्मा बच्चा ही क्यों न हो, को उत्तराधिकार का अधिकार था और इसे किसी भी तरह से चुनौती नहीं दी जा सकती थी, लेकिन बाद में जब पुरुष के हाथ में संपत्ति का अधिकार आ गया तो बेटियों का अधिकार लुप्त हो गया और इसके बदले में स्त्री धन अथवा दहेज की परंपरा शुरू हुई, जो क्षतिपूर्ति का एक रूप था। बेटियों को मिलने वाला दहेज कभी भी बेटों को मिलने वाली संपत्ति के बराबर नहीं रहा। इसके अतिरिक्त बेटों को अचल संपत्ति दी जाती है, जिसमें मकान, दुकान, व्यापार, जमीन आदि शामिल होता है, जबकि बेटियों को चल संपत्ति दी जाती है, जिनमें जीवन निर्वाह की चीजें, बर्तन, फर्नीचर, गहने आदि होते हैं। अब जब आर्थिक अधिकार से वंचित बहू ससुराल जाती है तो वह इसे पाना चाहती है, जिससे सास-ससुर और ससुराल वालों के साथ उसका टकराव लड़ाई-झगड़े में बदल जाता है। आज कानून तो बदल गया है, लेकिन मानसिकता नहीं बदली। बेटियों को अब भी पराया धन समझा जाता है और उसे माता-पिता के परिवार का अटूट अंग नहीं माना जाता, जिससे उसकी स्थिति कमजोर ही रहती है।
इसके अलावा किसी भी समाज में जब सामाजिक हिंसा और अपराध बढ़ जाता है तो इसका सबसे ज्यादा प्रभाव स्त्रियों पर होता है। भारत में भी पर्दा प्रथा, घूंघट, बुर्का आदि उन्हीं क्षेत्रों में पाया जाता है जो करीब एक हजार साल तक बाहरी हमलों से ग्रस्त रहे हैं। जो संप्रदाय महिलाओं की अस्मिता बचाने में अक्षम हुए उन्हीं संप्रदायों के पुरुषों ने स्त्रियों को घूंघट में या चहारदीवारी में कैद किया। इस तरह बाहरी समाज से कटी इन महिलाओं में बाहरी दुनिया को समझ पाने और उन्हें झेलने की क्षमता खत्म होती गई और वे परनिर्भरता के लिए मजबूर हो गई। आज भी सार्वजनिक जीवन में अपराधी हावी हैं और सरकार कानून एवं व्यवस्था के माध्यम से महिलाओं को सुरक्षा देने की बजाय अपराधियों को ही संरक्षण देती नजर आती है। ऐसे में माता-पिता के लिए बेटियों का समुचित पालन-पोषण कर पाना और उनकी रक्षा कर पाना मुश्किल होता है। इसलिए असुरक्षा बोझ से मुक्त होने के लिए बेटियों की कम उम्र में शादी कर दी जाती है। इस तरह बेटियों के साथ एक अनवरत शोषण का सिलसिला शुरू हो जाता है।
उत्तर भारत के गांवों में यह कथन आज भी कहा जाता है-जितने बेटे उतना लठ, जितना लठ उतना कब्जा। यानी संपत्ति की रक्षा के मामले में भी लड़कियों को कमतर आका जाता है, क्योंकि वे वह काम नहीं कर सकतीं जो पुरुष कर सकते हैं। निश्चित ही लड़ाई-झगड़े के काम में लड़कियां कमजोर होती हैं इसलिए वह परिवार के लिए उतनी महत्वपूर्ण नहीं रह जातीं। इस कारण भी उनके साथ भेदभाव होता है। यह बात शहर और गांव, शिक्षित और अशिक्षित सभी पर लागू होता है। इस तरह की धारणा बेटी को अपंग और एक तरह से कमजोर बना देती है। बेटी को जहां पराया धन समझा जाता है वहीं बेटों को आज भी बुढ़ापे का सहारा माना जाता है। मां-बाप समझते हैं परिवार बेटों के बिना फल-फूल नहीं सकता, लेकिन यह धारणा इस देश में बूढ़े मां-बाप के लिए घातक सिद्ध हो रही है। भारत को परिवार की तुलना उन समाजों से करनी चाहिए जहां बेटियां उत्तराधिकारी होती हैं, जैसा कि थाईलैंड और मणिपुर आदि में हैं। यहां बेटे और बहुओं की तुलना में बेटियां उत्तराधिकारी होती हैं, जो मां-बाप की ज्यादा अच्छी देखभाल करती हैं। जाहिर है बेटियों के प्रति भेदभाव के नजरिए से न केवल परिवार कलह का शिकार हो रहे हैं, बल्कि कन्या भ्रूण हत्या के कारण लिंगानुपात बिगड़ रहा है और प्रत्येक पुरुष को जीवनसाथी नहीं मिल पा रहा। इससे जहां दुष्कर्म आदि की घटनाएं बढ़ रही हैं वहीं स्त्रियों की खरीद-फरोख्त का बाजार फल-फूल रहा है। एम्स में जीवन-मौत से जूझ रही बच्ची के साथ हुआ दु‌र्व्यवहार इसी व्यवस्था और मानसिकता का परिणाम है, जिन्हें समूल नष्ट करने के लिए हमें समग्रता में विचार करने की आवश्यकता है।

Saturday, 4 February 2012

कपड़े छोटे या समाज की सोच छोटी !


कुछ दिन पहले मैं किसी काम से अवधेश प्रताप सिंह बिश्वबिध्यालय रीवा (मध्यप्रदेश) गई थी। वहां से काम निपटा कर लौट ही रही थी कि तभी कुछ लड़कों का ग्रुप मेरे पास से निकला जिनकी बातचीत का विषय लड़कियां थीं। बातचीत का विषय लड़कियों की सुन्दरता या उनका बॉयफ्रैंड नहीं था, बल्कि वे लड़कियों के कपड़ों पर फब्तियां कस रहे थे। लड़कियों को सर से पैर तक ढका देखकर कह रहे थे, '"उफ ये सर्दियां भी न! खूबसूरती देखने का मौका ही छीन लेती हैं।"

वैसे! लड़कियां कुछ भी पहनें किन्तु पुरूषों की नज़र उन्हीं पर रहती है। फिर वे कहते-फिरते हैं कि लड़कियों के कपड़े हमें उनकी ओर आकर्षित करते हैं। उदाहरण के तौर पर, अभी कुछ समय पहले एक ब्लॉगर ने ऐसी टिप्पणी देते हुए ब्लॉग भी लिखा था। अक्सर लोगों को यही कहते सुना है कि लड़कियों के छोटे कपड़े ही इस तरह की वारदातों का कारण होते हैं। अगर खबरों पर गौर किया जाए तो रेप केस में 5 साल की बच्ची से लेकर अधेड़ उम्र की महिला तक इस तरह की घटनाओं का शिकार बनी है। एक बुरके में रहने वाली औरत को भी रास्ते में कई बार पुरूषों द्वारा छेड़खानी का सामना करना पड़ता है। क्या उस समय भी वह महिला छोटे कपड़ों में होती है?

पश्चिमी सभ्यता को कोसते हुए हमेशा महिलाओं को ही गलत बताकर ऐसी घटनाओं को दबाने की कोशिश की जाती है। आज यदि भारत में पश्चिमी सभ्यता का साया है, तो केवल महिलाएं ही नहीं बल्कि पुरूष भी इसका अनुसरण कर रहे हैं। फिर केवल महिलाओं को ही क्यों दोषी माना जाता है? कुछ समय पहले आंध्र प्रदेश के डीजीपी दिनेश रेड्डी ने कहा था, �महिलाओं के फैशनेबल और पारदर्शी कपड़े पहनने से रेप की घटनाएं बढ़ती हैं।� यहां भी एक तरह से महिलाओं को गलत बताते हुए उन्होंने पुरूषों का ही समर्थन किया। आखिर क्यों पुरूषों की नैतिकता उस समय धराशाही हो जाती है, जब महिलाएं �भड़काऊ� (जैसा कि पुरुष कहते हैं) कपड़े पहनती हैं? जब एक छोटी-सी बच्ची तक को वे अपनी लालसा का शिकार बना लेते हैं तो उस नादान ने कौन से भड़काऊ कपड़े पहने होते हैं, जिसे देखकर वह बेकाबू हो जाते हैं।

भारत एक आजाद देश है। यहां हर व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार बोलने, खाने और पहनने का अधिकार है तो क्यों महिलाएं केवल पुरूषों की सोच के लिए अपना पहनावा बदलें! लड़की छोटे कपड़े पहने या बड़े, पुरूषों के सामने से गुजरते वक्त उसे किसी न किसी प्रकार की फब्ती को झेलना पड़ता ही है। पता नहीं लड़कियों के कपड़े ज़्यादा छोटे हैं या हमारे समाज की सोच...!

Tuesday, 31 January 2012

दलित नेता और दलित समाज

बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर भारतीय राजनीति के उस शिखर पुरुष का नाम है जिन्हें देश का प्रत्येक वर्ग व समाज आदर, श्रद्घा तथा सम्मान की नजर से देखता है। बावजूद इसके कि वे स्वयं एक दलित परिवार में जन्मे तथा जीवन के अन्तिम समय में बाबासाहब ने अपने लाखों समर्थकों व अनुयाईयों के साथ बौद्घ धर्म स्वीकार कर लिया था। फिर भी उनकी काबिलियत, योग्यता तथा देश व राजनीति के प्रति की गई उनकी कुर्बानियों ने उन्हें उस स्थान तक पहुंचा दिया था कि भारतीय समाज उन्हें किसी वर्ग विशेष का नेतृत्व करने वाले नेता के रूप में सीमित नहीं रख सका।
  अब लगता है समय काफी कुछ बदल चुका है। आज का दलित नेतृत्व बाबासाहब अम्बेडकर से अपनी तुलना तो करना चाहता है परन्तु उन जैसा आदर्श नहीं स्थापित करना चाहता। वर्तमान दलित नेतृत्व, बातें तो दलित समाज के हितों की करता है परन्तु उसका ध्यान अपने, अपने परिवार के व अपने आसपास के लोगों को लाभ पहुंचाने तक ही केंद्रित रहता है। जब तक बाबू जगजीवन राम को उत्तर भारत के दलितों का नेता माना जाता रहा, उस समय तक तो दलित राजनीति में गांधीवाद तथा सादगी के दर्शन हो भी जाया करते थे। परन्तु जब से राम विलास पासवान, कांशीराम व मायावती जैसे आधुनिक सोच रखने वाले नेताओं ने दलित राजनीति को नेतृत्व प्रदान करने का जिम्मा उठाया तब से तो दलित नेतृत्व में, उसके रहन सहन, जीवनशैली, नेतृत्व प्रदान करने की निराली सोच, शानो-शौकत आदि में क्रांतिकारी परिवर्तन देखा जाने लगा। ऐसा नहीं है कि उच्चस्तरीय रहन सहन उनका अधिकार नहीं है या उनकी इस उच्चस्तरीय जीवनशैली से भारतीय समाज के किसी वर्ग को ईर्ष्या है। कहना गलत नहीं होगा कि राजनीति तो राजनेताओं के मनोरंजन एवं भोगविलास का एक उपयुक्त माध्यम मात्र ही बनकर रह गया है। कम ही नेता इस समय देश में ऐसे होंगे जिन्होंने राजनीति में कुछ गंवाया ही होगा, कमाया नहीं। भारत के प्रधानमंत्री पद पर सुशोभित होने वाले लगभग आज तक के सभी नेताओं को इसी श्रेणी में डाला जा सकता है।
  वर्तमान प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह को ही ले लें। देश व दुनिया के उच्चतम पदों पर आसीन रह चुके होने के बावजूद इस व्यक्ति के पास उस दिन भी मात्र मारुति 800 कार ही थी जिस दिन कि उन्हें प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने हेतु बुलाया गया था। भारत के प्रधानमंत्री के पद पर बैठने वाले लोग भी यदि चाहते तो शेर की खाल को अपना आसन या अपने ड्राइंग रूप की शोभा बढाने के साधन के रूप में प्रयोग कर सकते थे। यह भी चाहते तो अपना रहन-सहन व जीवनशैली को राजशाही शैली की भांति शानो-शौकत से परिपूर्ण बना सकते थे। परन्तु इन्होंने ऐसा नहीं किया। इन सभी नेताओं ने सादगीपूर्ण जीवन गुजारकर यह प्रमाणित किया कि वे एक ऐसे बडे राष्ट्र के प्रमुख हैं जहां की अधिकांश आबादी गरीबी रेखा से नीचे बसर करती है।
  परन्तु भारत के दो प्रमुख राज्य उत्तर प्रदेश व बिहार में मायावती तथा राम विलास पासवान जैसे दो ऐसे नेता देखे जा सकते हैं जोकि अपनी राजनीति तो दलितों के नाम पर करते हैं परन्तु दलितों के उत्थान, विकास अथवा उनके रहन-सहन को ऊंचा उठाने से अधिक इनका ध्यान अपने जीवन स्तर को तथा अपने रहन-सहन की शैली को ऊंचा करने में केंद्रित रहता है। कुछ वर्ष पूर्व तक राम विलास पासवान का ड्राइंग रूप अन्य सभी केंद्रीय नेताओं में सबसे आलीशान हुआ करता था। उनके इस शाही वैभव के प्रदर्शन के विषय में जब उनसे पूछ गया तो उन्होंने प्रश्ा* के जवाब में प्रश्ा* ही किया था कि क्या दलित नेता को अपना रहन-सहन ऊंचा रखने का अधिकार नहीं है। यहीं पर बात गांधीजी के विचारों की आती है। वे तीसरे दर्जे के रेल के डिब्बे में यात्रा क्यों करते थे। सिर्फ इसलिए ताकि वे साधारण डिब्बे की यात्रा के द्वारा साधारण भारतीयों के सम्फ में आ सकें तथा उन साधारण रेल यात्रियों के दुःख-सुख को करीब से देख व समझ सकें। किस घटना ने गांधी को अपना शानो-शौकत से भारा जीवन त्यागने तथा तन पर मात्र एक धोती लपेटने हेतु प्रेरित किया था यह भी सभी जानते हैं।
  फिर आखिर वर्तमान शाही दलित नेतृत्व उस समाज को अपने उच्चकोटि के रहन सहन से क्या संदेश देना चाहता है। यदि यह कि दलित समाज इसी शाही ठाठ-बाठ का अनुसरण करे, फिर तो यह बहुत अच्छी सोच है। परन्तु करे तो कैसे करे। यह तो जीवन स्तर के ऊपर उठने से ही सम्भव है। और जब जीवन स्तर सुधारने की बात हो तो समाज का धनवान होना भी जरूरी है। इसके लिए आवश्यकता है ऊंची शिक्षा, स्व रोजगार तथा स्वावलम्बन की। अब प्रश्ा* यह है कि इसके लिए मायावती व राम विलास पासवान जैसे दलित नेताओं ने सम्पूर्ण दलित समाज को स्वावलम्बी बनाने हेतु अब तक किया ही क्या है? क्या बिहार व उत्तर प्रदेश में दलितों पर होने वाले अत्याचारों में कोई कमी आई है? देश में दलितों पर होने वाले हमले, दलित महिलाओं के साथ होने वाली अभद्र घटनाएं, दलितों का शोषण व  उत्पीडन आज भी इस देश की आमतौर पर घटने वाली घटनाएं हैं। वर्तमान दलित नेतृत्व इनको समाप्त करने की दिशा में आखिर क्या कर रहा है?
   आईए हम बताते हैं कि क्या कर रहा है। पूरे दो दशकों तक कांशीराम व मायावती ने दलित समाज को ‘मनुवादियों’ के विरुद्घ जमकर उकसाया। उन्हें अभूतपूर्व तरीके से लामबन्द किया। आज स्थिति यह है कि बहुजन समाज पार्टी भारतीय इतिहास की दलितों के नाम पर गठित होने वाली सबसे बडी व पहली राजनैतिक पार्टी है। इसी फार्मूले के साथ मायावती ने उत्तर प्रदेश में इतनी मजबूती हासिल की कि वे तीन बार प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर अन्य दलों के समर्थन से पहुंची। दलितों को संगठित कर तीन बार गठबंधन सरकार के रूप में सत्ता में आने पर मायावती को यह एहसास हो गया कि दलित समाज, बहुजन समाज पार्टी के झंडे तले कितना ही संगठित क्यों न हो ले परन्तु बहुजन समाज पार्टी को पूर्ण बहुमत में ला पाना अकेले इस समाज के वश की बात नहीं है। बस इसी सोच ने मायावती को मनुवादियों के विरुद्घ जहर उगलने से रोक दिया। बहुजन समाज के बजाए सर्वजन समाज के नारे लगने लगे। मनुवादियों ने भी मायावती को क्षमा करने में ही अपनी भी भलाई समझी। तिलक, तराजू और तलवार जिसका अर्थ ब्राह्मण, वैश्य तथा क्षत्रीय समाज से लिया जाता था तथा अभद्र नारों का प्रयोग कर इन समुदायों को कोसने का अफसोसनाक काम किया जाता था। उसे यू टर्न देते हुए ‘सर्वजन समाज’ की इस मसीहा ने अब नया नारा दिया, ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है।’ मायावती के इस नए नारे की ‘कद्र’ करते हुए या यूं कहें कि मायावती को क्षमा करने में ही अपनी भलाई समझते हुए या फिर सत्ता में भागीदारी की लालसा ने उत्तर पद्रेश के ब्राह्मण समाज को बहुजन समाज पार्टी के साथ जोडकर आखिरकार मायावती को चौथी बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना ही दिया। इस बार मायावती किसी गठबंधन सरकार की नहीं बल्कि बहुजन समाज की पूर्ण बहुमत वाली सरकार की मुख्यमंत्री बनी हैं। क्या यह सही नहीं कि पूर्ण बहुमत में आने की उनकी आकांक्षा ने उन्हें ब्राह्मण समाज के साथ जुडने को मजबूर कर दिया? और यदि ऐसा करना ही था तो देश के दलित समाज के दिलों में ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा राजपूतों के प्रति नफरत पैदा करने वाले नारे लगवाने की उन्होंने जरूरत ही क्यों महसूस की थी।
  मायावती के चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद जहां उन्होंने चार बार प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का एक कीर्तिमान स्थापित किया है, वहीं चमत्कारिक रूप से उन्होंने  15 करोड रुपए के अग्रिम आयकर का भुगतान कर यह भी साबित कर दिया है कि वे उत्तर प्रदेश की सबसे शक्तिशाली नेता मात्र ही नहीं बल्कि वह देश की सबसे धनवान नेत्री भी हैं। मायावती की वार्षिक आया 60 करोड रुपए दर्शाई गई है (कहा से आई )। मायावती को राजनैतिक बिसात बिछाने में जहां महारत हासिल है वहीं धन संग्रह के तरीके भी उनसे बेहतर शायद ही कुछ नेता जानते हों। मैडम ने पहले स्वयं को दलित समाज में दलित नेत्री के रूप में स्थापित किया। अपनी आक्रामक भाषणशैली के द्वारा उनके दिलों में सम्मानजनक स्थान बनाया। और फिर स्वयं को जिंदा देवी के रूप में पूजने का भी आह्वान किया। उन्होंने अपने अनुयाईयों को यह भी कहा कि वे मंदिरों में जाकर पैसे चढाना बंद करें। मैं जिंदा देवी हूं, जो कुछ चढाना है वे मुझपर चढाएं। कभी आपने कल्पना भी की है कि बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर जैसा महान नेता भी इस स्तर की राजनीति या ऐसे आह्वान कर सकता था? बात यहीं तक खत्म हो जाती तो भी गनीमत थी। अब तो खुलेआम मायावती जी अपने जन्मदिन के बहाने भारी धन संग्रह किया करती हैं। सोने-चांदी, हीरे आदि के आभूषण तथा नकदी सब कुछ उनके जन्मदिन पर सौगात के रूप में आती है। धन संग्रह तथा इसके द्वारा अर्जित सम्पत्ति का तो अब मायावती को खौफ भी सताने लगा है। पिछले दिनों दिए गए उन्हीं के बयान से यह पता चलता है कि उन्हें इस बात की शंका है कि आय से अधिक संपत्ति के लंबित पडे एक मामले में उन्हें जेल भी भेजा जा सकता है। गोया दलित नेतृत्व के भोग विलास व ऐशो आराम का पैमाना इतना लबरेज हो चुका है कि वह अब सम्भवतः छलकने ही वाला है। अफसोस कि इस इन्तेहा तक पहुंचने के बाद भी बहन मायावती स्वयं को बाबासाहब अम्बेडकर के समतुल्य कहने से बाज नहीं आतीं।
  उपरोक्त पूरे घटनाक्रम में यदि कोई ठगा हुआ सा नजर आता है तो वह है देश का वही दलित समाज जिसके कंधों पर कदम रखते हुए मायावती ने स्वयं को न सिर्फ चौथी बार उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बडे राज्य के मुख्यमंत्री पद तक पहुंचाने का कीर्तिमान बना दिया बल्कि इसी के माध्यम से वे देश की सबसे बडी आयकर देने वाली नेत्री भी बन बैठीं। अगर सब कुछ ठीक ठाक चलता रहा तो अभी मायावती के मुंह से एक और आवाज निकलने वाली है कि दलित को देश का प्रधानमंत्री बनाओ। और यदि किसी भी दल ने उनके प्रधानमंत्री बनने का किसी भी कारणवश विरोध किया तो उसपर भी ‘मनुवादी’ अथवा दलित विरोधी होने का लेबल लगा दिया जाएगा।
  समय चक्र यूं ही चलता रहेगा। दलित समाज की ही तरह अन्य समाजों में भी बिरादरी, वर्ग, क्षेत्र तथा जाति आदि की राजनीति करने वाले लोग स्वयं तो यूं ही ऐश करते रहेंगे तथा अपने राजनैतिक लाभ के निहितार्थ समाज के निमित्त यह फैसले करते रहेंगे कि कब किसे गाली देनी है तथा कब किसके गले में हाथ डालना है। इसी प्रकार नेताओं का अपना जीवन तो पूरी ऐश व सुरक्षा के साथ गुजरता रहेगा जबकि सम्बद्घ समाज यूं ही टकटकी लगाए यथापूर्व स्थिति इस राजनैतिक तमाशे को केवल देखता ही रह जाएगा। 

Friday, 27 January 2012

हमारी भूलें : जातिगत व धर्मगत भावनाओं में डूबे रहना

पहले आध्यात्मिक विकास के लिए किये जाने वाले प्रयत्नों को ही धर्म के नाम से संबोधित किया जाता था| किन्तु आजकल धर्म शब्द का अभिप्राय बिल्कुल भिन्न हो गया है| धर्म के नाम पर कुछ क्रिया-कलाप होने लगे है| तथा इन्हीं क्रिया कलापों को धर्म कहा जाता है| कौन किस प्रकार से जीवन बिताता है,इसको झगड़े व विवाद का विषय बना लिया गया है| व् इसी विषय पर साधारण झगड़े ही नहीं महायुद्धों तक की रचना हुई है|

वर्ण व जातियां भी किसी प्रकार से धर्म का अंग नहीं है| चार युगों में से सतयुग व कलियुग में वर्ण नहीं होती| कलियुग में वह नष्ट हो जाती है और सतयुग में उसकी आवश्यकता ही नहीं रहती| त्रेता के आरम्भ में जब समाज पत्नोमुखी होने लगा, उसकी रोकथाम के लिए वर्ण व्यवस्था का निर्माण किया जाता है| जो कलियुग के आरम्भ होते होते पूरी तरह से विफल हो,नष्ट हो जाती है| इस प्रकार से चार योगों के कार्यकाल को जोड़ा जाय तो आधे भाग में सतयुग व कलियुग होता है, जिसमे वर्णव्यवस्था का कोई स्थान नहीं होता| फिर भी यदि लोग वर्ण व जाति व्यवस्था को धर्म का आधार बताने की चेष्टा करे तो इसे दुस्साहस ही कहा जायेगा|

आज व्यावसयिक बुद्धि के लोग धर्म व जाति के नाम पर अनेक प्रकार के संगठनों का निर्माण, न केवल सुविधा पूर्वक जीवन बीता रहे है, बल्कि वे समाज के शोषण के हेतु बने हुए है| ऐसे लोग जातिय व धार्मिक कट्टरता फैलाकर समाज को शेष मानवता से अलग-थलग कर देने के लिए दोषी समझे जाने चाहिए|

जातिय व धार्मिक संगठनों कि यदि वास्तव में कोई उपयोगिता है तो वह यही हो सकती है कि अपने पूर्व पुरुषों द्वारा आध्यात्मिक विकास में जो मार्ग खोजे गए थे, उनका अन्वेषण कर, उस पाठ पर चल कर स्वयं का, समाज का व मानवता का कल्याण किया जाए| लेकिन यह करू अत्यंत कठिन है| इसके लिए व्यक्ति को कठोर साधना का आश्रय लेकर अपने तथाकथित भौतिक सुख साधनों का उत्सर्ग करना पड़ता है| इस लिए लोगों ने पूर्वजों के नाम पर,गौरव गाथाओं का बखान कर संगठन बनाने की पद्धति अपना ली है, ताकि समाज व पूर्वजों के नाम पर स्वयं हित का साधन कर सके व लोगों को गुमराह कर, उनके साधनों व शक्तियों का अपने हित में उपयोग कर सकें|

यह निश्चित तथ्य है कि वर्तमान युग में जिस प्रकार से जितने धर्म व जातियां चल रही है उनका अस्तित्व अधिक समय तक चलने वाला नहीं है| अत: जातिय संगठनों को वास्तविकता स्वीकार कर लोगों को स्वयं का विकास करने के लिए परम्परागत आध्यात्मिक प्रणालियों का आश्रय लेने के लिए प्रेरित करना चाहिए| जो धार्मिक व सामाजिक संगठन यह कार्य नहीं कर सकेंगे, वे कालांतर में स्वयं समाज व धर्म का विनाश करने के लिए दोषी ठहराए जायेंगे|

आज से एक हजार वर्ष पूर्व जब मौखिक विज्ञान अपने विकास को द्रुतगति दे रहा था| उस समय अन्धकार में डूबे हुए लोग अपनी यश गाथाएँ सुनने, भोग विलास करने, व धार्मिक मदान्धता में लिप्त हुए अपने आपको अद्भुत प्राणी समझ रहे थे| लेकिन विज्ञान के चमत्कार ने उनकी सारी बुद्धिमानियों को मूर्खता साबित कर दिया| पिछले दो सौ वर्षों में विज्ञान जिस गति से आगे बढ़ा है, उसने समस्त भौतिक मूल्यों को ही बदल दिया है| पालकियों, रथ, हाथी, घोड़ों व चरसों को किसी ने नष्ट नहीं किया, वे बदले हुए काल चक्र के प्रभाव से अपने आप ही समाज द्वारा भुला दिए गए व स्वत: ही नष्ट हो गए|

पिछले आठ सौ वर्षों से आध्यात्मिक जगत में विलक्षण चमत्कार हो रहे है| संसार की सभी कौमों में व संसार के सभी धर्मों में धार्मिक कट्टरता, मदान्धता व धार्मिक पंडावाद के खिलाफ विद्रोह करने वाले श्रेष्ठ पुरुष पैदा हुए है| उनकी आवाज को बुद्धिमान लोगों ने सुना व ह्रदय गम किया है| व समाज को नए रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित किया है| लेकिन धर्म व जातिगत भावनाओं से लोग अंधे हो गए है, उन्हें यह सब कुछ दिखाई नहीं देता है| वे आज भी बैल गाड़ियों से चंद्रलोक तक पहुँचने की कल्पना लेकर समाज को मुर्ख बनाने की चेष्टा कर रहे है|

आगे आने वाले दो सौ वर्ष संसार में आध्यात्मिक विकास के लिए उतने ही मत्वपूर्ण होंगे जितने महत्वपूर्ण पिछले दो सौ वर्ष भौतिक विज्ञान के विकास के लिए रहे है| मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, मठ व चर्चों की दीवारों में जो लोग धर्म को बाँध कर रखना चाहते है उनके हौसलें इस तरह से पस्त होंगे, जिनकी आज लोग कल्पना भी नहीं कर पा रहे है| इन धर्म के नाम पर ठगी के अखाड़ों को किसी को नष्ट करने की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी| समाज द्वारा इन्हें सभी प्रकार से परित्यक्त कर दिया जावेगा| जिस प्रकार रथ,हाथी व घोड़े समाज द्वारा छोड़ दिए गए है|

धर्म व जाती के नाम पर चलने वाले अखाड़ों के भीतर घुसकर यदि हम देखने की चेष्टा करें तो न वहां हमें जीवन दिखाई देगा और न ही सौंदर्य| जीवन से विहीन, विशाल भवनों व किलों की दुर्गति आज हम देख रहे है वही गति इन धर्म के नाम पर चलाये जाने वाले संगठनों की होगी| वे स्वत: ही खंडहर बनकर लोगों के द्वारा छोड़ दिए जायेंगे| जिन लोगों में जीवन जीवन है, उन्हें चाहिए कि सम्यक रूप से स्वयं पर व समाज व सामाजिक संगठनों पर दृष्टि डाले| इन खंडहरों को का जो स्वरूप है, उसे बचाया नहीं जा सकता| इस तथ्य को स्वीकार कर लेने के बाद ही नव निर्माण का सूत्रपात होगा|

नव निर्माण का प्रयोजन केवल एक ही हो सकता है| अपनी परम्परागत साधना व आराधना पद्धतियों कि खोज तथा उनका अनुसरण कर श्रेष्ठ व्यक्तित्व का निर्माण| जो भी व्यक्ति, समाज या धर्म इस कार्य को कर लेगा, वही आने वाले समय में जीवित रहेगा,विकसित रहेगा व संसार पर छा जायेगा| वह समय दूर नहीं है, जब आध्यात्मिक शक्तियों से संपन्न लोग उसी तरह से छा जायेंगे, जिस प्रकार आज भौतिकवादी छाये हुए है|

Tuesday, 24 January 2012

!!---हिंदुत्व और भारतीयता---!!

लगभग तीस भाषाओँ और तीन सौ बोलियों वाले भारतवर्ष के एकता का सूत्र क्या है? क्यों चावल को मुख्य भोजन मानने वाला बंगाल, रोटी खाने वाले पंजाब के साथ वन्दे मातरम गा लेता है. कुछ विरोधाभाषों के बाद भी आखिर तमिल और गुजरती के मध्य एकता के सूत्र क्या हैं? क्यों जब महाराष्ट्र में बिहारियों पर हमला हुआ तो विरोध में मराठी हीं उठ खड़े हुए ? वास्तव में इन तमाम विरोधाभाषों और भिन्नताओं के बीच, भारत के एकता का सूत्र है क्या ? जितना भी सोचिये, जितना भी विचार कर लीजिये, घूम-फिर कर उत्तर यही आएगा कि हिमाचल के पहाड़ों में रहने वालों और केरल के समुद्रतट पर रहने वाले लोगों के मध्य एक हीं सूत्र है जो उन्हें जोड़ता है, वो है हमारा धर्म - हिंदुत्व . यह हिंदुत्व हीं है जो सभी विरोधाभाषों के बीच हमें जोड़ता है और हमें भारतीय बनाता है . अर्थात यह हिंदुत्व हीं है जो भारत की आत्मा है. वास्तव में हिंदुत्व शब्द भारतीयता का पर्यायवाची शब्द है.आज हमारे लिए राष्ट्रवाद की वही परिभाषा है, जो योरोप ने अपने लिए तय किया था. लगभग सभी योरोप देशों में इसाई मत हीं बहुमत में है, फिर भी योरोप एक देश नहीं. इसका कारण भाषाई विभेद हीं हैं. लेकिन भाषा, खानपान अथवा रहनसहन हमारे राष्ट्रवाद के मध्य कभी नहीं आया. हमारी तुलना तुलना किसी अन्य देश अथवा भूभाग से नहीं कि जा सकती है क्योंकि हमारी सोच और संस्कृति आयातित ना हो कर मौलिक है और दो मौलिक विचारधारा में अंतर होना स्वाभाविक हीं है. आश्चर्य से भी अधिक तो यह दुखद बात है कि विश्वगुरु भारतवर्ष को राष्ट्रवाद के मानदंड वहां से लाना पड़ा,जहाँ सभ्यता के जन्म होने से पहले हीं भारतवर्ष के राष्ट्र के रूप में परिणत ही चूका था. वास्तव में राष्ट्र के रूप में हमारी स्थिति अद्वितीय है. हमारे देश में राष्ट्र का आधार हीं धर्म है, धर्म क्या - हिंदुत्व! हिंदुत्व क्या - जीवन के अंतिम लक्ष्य के प्रति एकरूपता. तो फिर यह स्वीकार करने में संकोच कैसा कि हिंदुत्व हीं भारतीयता है.महर्षि अरविंद घोष ने कहा है "जब -जब, जहाँ कहीं भी हिन्दू धर्म का क्षरण हुआ है, अखंड भारतवर्ष सिकुरता गया है". उदहारण के लिए ब्रह्मा देश (मयन्मार) से लेकर उपगणस्थान (अफगानिस्तान) से लेकर आज का पाकिस्तान और बंगलादेश भी है. जो खंडित भारतवर्ष आज बचा है वो भी इसलिए कि इस भूमि पर सनातनधर्मियों की बहुलता है. स्वामी विवेकानंद जी ने भी कहा था "जो हिंदुत्व को छोड़ा तो तुम्हारा अंत निश्चित है".जब कांग्रेस के दुर्नीतियों के फलस्वरूप, 1947 में देश पर विभाजन आया और करोडो हिन्दुओं को तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान(अब बंगलादेश) और पशिमी पाकिस्तान से बलपूर्वक हटाया गया तो, उन्होंने भारतभूमि का रुख किया. आज भी पाकिस्तान अथवा बंगलादेश में हिन्दू पर अत्याचार होता है तो वे भारत का रुख करते हैं. प्रश्न है कि कराची के चावल व्यापारी जो हाल में हीं भारत में, अपना सबकुछ छोड़, शरण लेने आये हैं, वे भारत हीं क्यों आये ? क्यों नहीं इरान अथवा अफगानिस्तान चले गए? आज भी बंगलादेश में त्रस्त हिन्दू भारत का हीं रुख क्यों करते हैं, चीन अथवा मयन्मार का क्यों नहीं? आप सोचेंगे तो जवाब यही आएगा कि भारत में उन्हें हिन्दुओं के लिए एक स्वाभाविक शरण स्थली दिखती है. जब कि सच्चाई तो यह है कि हमारा देश घोषित तौर पर धर्मनिरपेक्ष है.आज जो हमारा खंडित भारत बचा है उसमे भी अलगाववाद की आवाज उठ रही हैं. लेकिन आवाज भी सिर्फ वही उठती है जहाँ हिन्दू अल्पसंख्यक हैं. भले कई बार तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आन्दोलन हुए हों. लेकिन कह्भी भारत को विभाजित करने जैसी भावना नहीं दिखी. भूलवश भी किसी हिन्दू बहुल राज्य के राजनीतिक संगठन ने भारत के अस्तित्व पर सवाल उठाने का साहस नहीं किया. लेकिन हिन्दुओं के अल्प संख्या वाले राज्यों में यह आम बात है.जब वीर सावरकर ने कहा कि धर्मान्तरण हीं राष्ट्रान्तरण है तो उनका कांग्रेस के चमचो ने बड़ा विरोध किया. परन्तु जब हम कश्मीर से उत्तर-पूर्व तक धर्मान्तरण में राष्ट्रान्तरण का बिज देख रहे हैं तो भला इस सत्य को स्वीकार करने से इनकार कैसे करें.इस भारतभूमि में, भारत का होना ना होना, हम हिन्दुओं के अतिरिक्त, किसी के लिए महत्व नहीं रखता. देश के बहुसंख्य मुसलमानों के लिए तो सम्पूर्ण भारतवर्ष को पाकिस्तान बनाना आज भी स्वप्न है. 1947 में विभाजन के पहले, हुआ आखिरी चुनाव पृथक निर्वाचन पद्धति के साथ हुआ था. यानि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में मुसलमानों के लिए सीटें आरक्षित थी, जहाँ उम्मीदवार भी मुसलमान होते थे और मतदाता भी मुसलमान हीं हो सकते थे. कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने सभी मुस्लिम आरक्षित सीटों पर उम्मीदवार दिया था. कांग्रेस ने घोषित किया था कि यदि वे चुनाव जीत गए तो फिर देश नहीं बटेगा. वहीँ मुस्लिम लीग, अपने एक सूत्री मांग - भारत विभाजन के साथ मुकाबले में उतरा था. जो चुनाव परिणाम आये, वे चौकानेवाले थे. कांग्रेस को मुस्लिमों के लिए आरक्षित सीटों पर भरी धक्का लगा था. जो सीटें कांग्रेस ने मुस्लिम कोटे की जीती भी थी, वे पख्तून क्षेत्र में थी (संभव है ऐसा सीमांत गाँधी के उन क्षेत्रों में प्रभाव के कारण हुआ हो). लेकिन उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम, बिहार सहित सम्पूर्ण भारत में मुस्लिम लीग का झंडा फहराया था. अर्थात वर्त्तमान भारत में रह रहे मुस्लिमों और उनके पूर्वजों ने पाकिस्तान को चुना था. मौलाना अबुल कलम आजाद ने भी अपनी पुस्तक में इस पर चर्चा कि है कि विभाजन में जब उत्तर प्रदेश, बंगाल और बिहार को पाकिस्तान में नहीं मिलाया जा सका तो मुसलमान हताश थे. वे आजाद से मिले तो आजाद ने उन्हें भारत में हीं रहने और भारत देश के साथ वफ़ादारी निभाने कि सलाह दी.लेकिन सच्चाई कुछ और हीं है. सुहरावर्दी ने सम्पूर्ण बंगाल को पाकिस्तान बनाना चाहा था. उसने सोनार बांग्ला (स्वर्ण बंगाल) का नारा दिया, लेकिन श्यामा प्रसाद मुख़र्जी के प्रभाव के कारण वह असफल रहा. तब सुहरावर्दी ने मुसलमानों से पश्चिम बंगाल में हीं रह कर ऐसी स्थिति बनाने कि मांग कि जिससे एकदिन सम्पूर्ण बंगाल को भारतवर्ष से अलग किया जा सके. यही कहाँइ असम कि भी है. हम सबको एक बात समझने कि जरूरत है कि वर्तमान भारत के मुसलमानों ने यदि अखंड भारत चाहा होता तो भारत का विभाजन नहीं होता. विभाजन का आधार हीं यही था कि लगभग ९५ प्रतिशत मुसलमानों ने अलग देश चाहा था. आज कि तिथि में यदि आप मुसलमानों की राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता देखना चाहते हैं तो 'वन्दे मातरम' जो कि राष्ट्रगीत है, के प्रति उनकी भावना को देखिये और समझिये.मैं कई बार सोचता हूँ कि भला सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में भारत हीं एक मात्रा ऐसा देश क्यों है, जहाँ आप जितने ऊँचे सुर में चाहें, धर्मनिरपेक्षता का नारा लगा सकते हैं. क्यों हिन्दू यह सवाल नहीं करताकि विभाजन के बाद पकिसन में 11,000 मंदिर तोड़ दिए गए तो हम एक विवादित ढांचा (मस्जिद नहीं) को तोड़कर राष्ट्रपुरुष मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का मंदिर क्यों नहीं बना सकते? क्यों हिन्दू यह सवाल नहीं करता कि 1949 में जब पाकिस्तान में 18 प्रतिशत हिन्दू जनसँख्या थी और बंगलादेश में 35 प्रतिशत तो आज वे सब कहाँ विलुप्त हो गए? पाकिस्तान और बंगलादेश कि बात तो छोडिये, हिन्दू तो अपने हीं देश, कश्मीर में हीं हजारो मंदिरों के तोड़े जाने पर सवाल नहीं करते. वे तो यह भी नहीं पूछते कि जब 1950 में पश्चिम बंगाल में मुसलमान मात्रा 10 प्रतिशत थे तो आज 30 प्रतिशत क्यों और कैसे हो गए और यही हाल बिहार, उत्तर प्रदेश और असम का भी कैसे हो रहा है ? मेरे प्रश्न का उत्तर भी हिंदुत्व में हीं है. हिंदुत्व में स्वयं हीं इतने आलोडन हैं कि इसे कट्टरता कि सीमा में कभी बंधा हीं नहीं गया और ह्रदय के द्वार उदारता के सुगन्धित वायु के लिए खुले रखे गए. वास्तव में हिंदुत्व religion नहीं है, यह धर्म है. religion हिंदी में संप्रदाय के समक्ष ठहरता है, वह धर्म का अंग्रेजी अर्थ कभी नहीं हो सकता. इसी तरह इसाइयत अथवा इस्लाम धर्म नहीं हैं, ये संप्रदाय हैं. सम्प्रदायों में एक विशेष नियम होता है, उनसे अलग जाने कि आज्ञा किसी को नहीं होती. सम्पूर्ण इस्लाम कुछेक सौ पन्नो के कुरान पर आधारित है, जैसे हीं कोई मुसलमान 2000 वर्ष पूर्व अरब देशों के कबीलाई सभ्यता के लिए लिखे गए कुरान से अलग आचरण करता है, उसे इस्लाम से बाहर कर दिया जाता है. कमोबेश यही हालात इसाई धर्म कि भी है. दुसरे, सभी संप्रदाय में अपनी संख्या बढ़ने कि होड़ लगी रहती है. मुसलमान इसके लिए जिहाद करते हैं तो इसाई अपने चर्च और मिशनरियों का सहारा लेते हैं. लेकिन क्या किसी ने कभी सुना है कि धर्मविरुद्ध आचरण के दोषी पाए जाने पर हिन्दू धर्म से किसी का निष्काशन हुआ है? क्या ऐसी कोई पुस्तक हमारे धर्मगुरुओं ने परिभाषित कि है जिसके विचारों को बिना सोचे समझे अमल में लाना हमारे लिए हिन्दू होने कि पहली शर्त हो? अथवा तलवार के शक्ति से अथवा राजाश्रय का सहारा लेकर ऐसे लोगों के धर्मपरिवर्तन कि कोशिश हुई हो जो पहले हिन्दू ना रहे हों ? उत्तर सिर्फ नहीं में हो सकता है. हाँ बौद्ध, सिख अथवा जैन, संप्रदाय के श्रेणी में आता है.अंततः हमें यह स्वीकार करना चाहिए हिंदुत्व और भारतीयता की स्थिति अन्य समकक्षों से अलग है, और दोनों का हीं सम्बन्ध अटूट है. इतना अटूट कि हिंदुत्व और भारतीयता एक दुसरे के पर्याय हैं. अब चुकी हम हिन्दू हैं, अर्थात भारतीय हैं तो हिंदुत्व अर्थात भारतीयता की रक्षा का और अखंड भारत के अखंड स्वप्न को पूर्ण करने का कर्तब्य भी हमारी हीं है.   !वन्दे मातरम! जय श्री राम!