Monday, 5 December 2011

महिलाओ को आरक्षण या शिक्षण…??

अपना इतिहास जाने बगैर कोइभी इंशान इतिहास नहि बना शकता.. इस लिये भारतीय महिलाओ को अपना सच्चा इतिहास जानना चाहिये और बाद मे आरक्षण विधेयक पर गहन अभ्यास करना चाहिये..
भारत मे करीब 50 % महिलाए है, और उनके लिये आरक्षण सिर्फ 33%..?? क्या इसके पीछे कोइ राजनिती नहि है?? दलितो एवं आदिवासीओ को आरक्षण का कितना लाभ हुआ है?? क्या उनको आरक्षण का पूरा लाभ दिया भी जाता है..?? क्या महिलाओ को ये लोग न्याय देंगे..?? इस युग को हम वैज्ञानिक युग मानते है.. भारतीय महिला अवकाश मे भी सफर कर आई है, आज कंइ भारतीय महिलाए मल्टी नेशनल कंपनी चला रही है, कलेक़्टर है, आइ. पी. एस. है, पायलट है, बंदूक उठा के देश की रक्षा भी करती है.. लेकिन धार्मिक क्षेत्र मे महिलाओ का वर्चस्व कितना है…जब महिला आचार्या बन शकती है तो, शंकराचार्या क्यों नहि बन शकती?? अगर कोइ मंदीर के पुजारी एक दिन के लिये मंदीर मे नहि जा शके तो, क्या उनकी जगह उनकी पत्नी से पुजा करवा शकते है..?? क्यों नहि?? तो फिर ये वैज्ञानिक सदी का क्या मतलब?? आज भी धार्मिक क्षेत्र पर एक ही जाति के लोग और उस मे भी सिर्फ पुरुष का ही एकाधिकार क्यों?? धार्मिक स्थानो पर बिराजमान मंदीर के पुजारी से लेकर शंकराचार्य तक ब्राह्मण के अलावा किसी को भी स्थान नहि… ब्राह्मण महिला को भी नहि… क्यों??
महिलाओ को सिर्फ आरक्षण देने से उनकी  समस्या का समाधान नहि होता… मानसिक असमानता से महिलाए कैसे बचेगी?? महिलाओ को अभी भी अपने दुश्मन को पहचान लेना चाहिये.. जब तक आपका नजरिया नहि बदलता, तब तक आप कुछ परिवर्तन नहि ला शकते…. और नजरिया बदलने के लिये मजबुत मनोबल की जरूरत होती है.. जो आज शायद ही किसीके पास होगा… जब तक समाज महिलाओ के प्रति अपनी सोच नहि बदलता, तब तक चाहे कितने भी बिल पास हो जाये, कुछ फर्क नहिं पडता…. आखिरकार महिलाओ को अपनी लडाई खुद ही लडनी होगी…
एक धर्म पुस्तक मे लिखा है की, “ढोल गँवार शुद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी”, महिलाए भी इसे सत्संग मे बहुत ध्यान से सुनती है और ताली बजाती है… कभी कसाइ ने भी पशुओ की रक्षा की है..?? जो ये लोग आरक्षण से महिलाओ का लाभ होने देगे… महिला आरक्षण तो इनके लिये जरिया मात्र है, पाना तो कुछ और चाहते है. आज भी घरेलु हिंसा मे सबसे ज्यादा शिकार महिलाए होती है. आज भी बेटी के जन्म से मां – बाप को उतनी खुशी नहि होती जितनी बेटे के जन्म पर होती है… और खुश हो भी कैसे शकते है… वो जानते है की समाज मे स्त्री का स्थान कहाँ पर है.   महिलाए रात तो क्या, दिन मे भी स्वतंत्रतासे घुम-फिर नहि शकती. उसे हर हंमेश समाज और भारतीय संस्कृति के ठेकेदारो का डर रहता है. आज भी कंइ धर्मस्थानो पर महिलाओ को इजाजत नहिं मिलती.. ये सब पाबंदीओ के लिये कौन जिम्मेदार है..?? राम के राज्य में भी सीता जैसी कइ स्त्रीओ को अग्नि परीक्षा के नाम पर जलाया गया था… आज भी ऐसे अपराध होते ही रहते है…लेकिन किसे परवाह है… हमे तो सिर्फ बिल पास करवाना है…

भारतीय महिलाए जिन्होंने रोशन की नयी राहे

यु तो हर महिला शक्ति स्वरुप है और हर दिन महिला दिवस है क्योकि बिना महिला के स्रष्टि की कल्पना करना मुश्किल है /फिर भी कुछ महिलाओं ने आने वाली पीढी की राहो  को रोशन किया है अपने अपने क्षेत्र में सफलता के दिए जलाकर /
सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला जज : जस्टिस एम. फातिमा बेबी
एम. फातिमा बीवी भारत की पहली महिला जज थी जो १९८९ में  भारत के सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त की गयी थी इसके साथ साथ पहली मुस्लिम महिला भी थी जो इतने उच्च पड़ पर आसीन हुई / इनका जन्म तीस अप्रैल 1927 को हुआ पथानमथीट्टा , केरल राज्य, में हुआ था इनके माता पिता का नाम मीरा साहिब और खादिजा बीवी था /इनकी स्कूली  शिक्षा  पथानमथीट्टा , व्  यूनिवर्सिटी  तिरुवनंतपुरम से इन्होने बी एस सी व् इसके बाद कानूनी पढाई भी यही से की /१४ नवम्बर १९५० में वकील के रूप में खुद का नामांकन करवा कर अपने करियर की शुरुआत की 
पहली महिला फिल्म अभिनेत्री जो राजसभा की सदस्य बनी : नरगिस दत्त
एक जून 1929 को पैदा हुई नर्गिस का असली नाम फातिम रशीद था उनकी माँ मशहूर गायिका जद्दनबाई थीं। सिर्फ छह साल की उम्र में उन्होंने फिल्म तलाश.ए. हक से अभिनय की शुरुआत कर दी थी। नर्गिस को पद्मश्री और उर्वशी सहित कई  फिल्म फेयर  पुरस्कार मिले। हिंदी सिनेमा की एक यादगार अभिनेत्री है नर्गिस जिन्होंने मदर इंडिया में राधा की भूमिका के जरिए भारतीय नारी को एक नया और सशक्त रूप दिया  बाद में उन्हें राज्यसभा के लिए भी नामित किया गया। लेकिन अपनी बीमारी के चलते वो अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पायी  तीन मई 1981 को कैंसर के कारण उनकी मौत हो गई /
हाई कोर्ट की पहली महिला चीफ जस्टिस : लीला सेठ
भारत में हाई कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश बनने वाली पहली महिला थीं लीला सेठ साथ ही  देश की पहली ऐसी महिला भी थीं, जिन्होंने लंदन बार एग्जामिनेशन में टॉप किया। लीला सेठ का जन्म 1930 में लखनऊ में हुआ। जांच आयोग की सदस्य रह चुकीं लीला सेठ सन 2000 तक लॉ कमीशन में भी रहीं और उन्हें हिंदू सक्सेशन एक्ट में संशोधन का श्रेय भी जाता है। इसी संशोधन के तहत संयुक्त परिवारों में रह रही बेटियों को भी पिता की संपत्ति में समान अधिकार मिलता है। लीला सेठ ने पुरुष प्रधान माने जाने वाली न्यायप्रणाली में अपनी एक अलग पहचान बनाई /इनकी ऑटोबायोग्राफी  भी प्रकाशित है - ऑन बैलेंस। इसमें लीला सेठ के संघर्ष और बुलंदियों तक पहुंचने का पूरा विवरण है  , जो हर महिला  के लिए प्रेरणा बन सकती है।
सुचेता कृपलानी  पहली महिला मुख्या मंत्री
सुचेता कृपलानी का जन्म १९०८ में हुआ /उनकी शिक्षा शिक्षा लाहौर और दिल्ली में हुई थी।  ये उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री बनीं और १९६३ से १९६७ तक वह उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं। ये  भारत की प्रथम महिला मुख्य मंत्री थीं।सुचेता कृपलानी ने गांधी जी   के करीब रहकर देश की आजादी की नींव रखी और आजादी के आन्दोलन में जेल भी गयी / 1 दिसंबर १९७४ को उनका निधन हो गया। अपने शोक संदेश में श्रीमती इंदिरा गांधी ने कहा कि "सुचेता जी ऐसे दुर्लभ साहस और चरित्र की महिला थीं, जिनसे भारतीय महिलाओं को सम्मान मिलता है।"
भारत की पहली रेल ड्राइवर : सुरेखा यादव
महाराष्ट्र के सतारा जिले की सुरेखा यादव ने वो काम कर दीखाया जो सिर्फ पुरुषो के लिए समझा जाता था इन्होने  विद्युत अभियांत्रिकी में पत्रोपाधि पाठ्यक्रम 1986 में पूरा किया और इंजन ड्राइवर के लिए आवेदन कर दिया  तीन वर्षों तक उन्हें विभिन्न परीक्षणों के दौर से गुजरना पड़ा। और आखिर वो देश की  ही  नहीं, एशिया महादीप की प्रथम महिला ड्राइवर बन गयी /
यूएन जनरल एसेम्बली की पहली महिला प्रेसिडेंट : विजय लक्ष्मी पंडित
पंडित जवाहरलाल नेहरू की छोटी बहन थी विजयलक्ष्मी पंडित उनका जन्म  18 अगस्त 1900 को हुआ था। घर में पढ़ाई करने वाली विजयलक्ष्मी ने देश की आजादी के बाद विभिन्न अंतरराष्ट्रीय पदों पर अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 1947 से 1949 तक सोवियत संघ में वह भारतीय राजदूत रहीं। 1949 से 1951 तक मैक्सिको की, 1955 से 1961 तक आयरलैंड में वह भारतीय राजदूत रहीं।
वर्ष 1953 में विजयलक्ष्मी संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनीं।
इसी दौर में वह ब्रिटेन में भारतीय उच्चायुक्त रहीं। 1958 से 1961 के बीच स्पेन में भारतीय राजदूत रहीं विजयलक्ष्मी पंडित ने 1946 से 1968 के बीच संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व भी किया।
अंतरिक्ष में जाने वाली पहली भारतीय महिला : कल्पना चावला
कल्पना चावला का जन्म १ जुलाई सन् १९६१ मे करनाल हरियाणा में हुआ /कल्पना चावला ने प्रारंभिक शिक्षा टैगोर पब्लिक स्कूल करनाल से प्राप्त की। आगे की शिक्षा वैमानिक अभियान्त्रिकी में पंजाब इंजिनियरिंग कॉलेज, चंडीगढ़ ,भारत से करते हुए १९८२ में अभियांत्रिकी स्नातक की उपाधि प्राप्त की। १९८२ में वह अमेरिका चली गयी फिर वहा से  वैमानिक अभियान्त्रिकी में विज्ञान निष्णात की उपाधि टेक्सास विश्वविद्यालय आर्लिंगटन से प्राप्त की / कल्पना चावला  को हवाईजहाज़ों, ग्लाइडरों व व्यावसायिक विमानचालन के  लिए प्रमाणित उड़ान प्रशिक्षक का दर्ज़ा हासिल था।  अन्तरिक्ष यात्री बनने से पहले वो एक सुप्रसिध नासा कि वैज्ञानिक थी।मार्च १९९५ में नासा के अंतरिक्ष यात्री कोर में शामिल हुईं और उन्हें १९९८ में अपनी पहली उड़ान के लिए चुना गया था। उनका पहला अंतरिक्ष मिशन १९ नवम्बर, १९९७ को छह अंतरिक्ष यात्री दल के हिस्से के रूप में अंतरिक्ष शटल कोलंबिया की उड़ान एसटीएस-८७ से शुरू हुआ। कल्पना  अंतरिक्ष में उड़ने वाली पहली भारतीय महिला थी/
एवरेस्ट पर दो बार चढ़ने वाली विश्व की प्रथम महिला संतोष यादव
संतोष यादव का जन्म सन १९६९ में हरियाणा के रेवाड़ी जिले में हुआ था।  वह माउंट एवरेस्ट पर दो बार चढ़ने वाली विश्व की प्रथम महिला हैं।  इसके अलावा वे कांगसुंग  तरफ से माउंट एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक चढ़ने वाली विश्व की पहली महिला भी हैं। उन्होने महारानी कॉलेज जयपुर से शिक्षा प्राप्त की है। उन्हें सन २००० में पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया
कुछ अन्य महिलाए जीने भी अपने अपने क्षेत्रो में प्रथम महिला होने का गौरव प्राप्त है
इंजीनियरिंग में डिग्री प्राप्त करने वाली प्रथम महिला -: इला मजुमदार
प्रथम महिला प्रधानमंत्री -: श्रीमती इंदिरा गांधी
एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त करने वाली प्रथम महिला -: विद्युमूखी बोस
भारतीय महिला क्रिकेट टीम की प्रथम कप्तान -: शांता रंगास्वामी
प्रथम महिला आईपीएस -: किरण बेदी
प्रथम महिला आईएएस -: अन्ना जॉर्ज
प्रथम महिला राष्ट्रपति : श्रीमती प्रतिभा पाटिल

20वीं सदी की भारतीय महिलाए

बात चाहे आजादी की जंग लड़ रहे हिंदुस्तान की हो या आजाद भारत की, महिलाओं का योगदान भुलाया नहीं जा सकता। कुछ कर दिखाने का जज्बा उस समय भी उनके मन में था, जब वे घर की चारदीवारी में सजाकर रखे जाने वाले सामान की तरह थीं। तब भी उन्होंने चौखट से बाहर आकर अपनी शक्तिदुनिया को बताई। कोमल मन की दृढ़ता और असीमित क्षमताएं तब खुलकर सामने आईं, जब ये देश ही नहीं, बल्कि विदेश में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा आईं। यकीनन इन चेहरों का रसूख अब नहीं रहा, लेकिन प्रभाव आज भी कायम है।
कोमल मन की नायिका-सरोजिनी नायडू
1947 में देश की पहली महिला राज्यपाल (उप्र) चुनी गईं
कुशल राजनेता और कवि हृदय सरोजिनी का जन्म 1879 में हैदराबाद में हुआ। 1925 में उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। सरोजिनी नायडू की सक्रियता ने महिलाओं के लिए राजनीति में अहम स्थान बना दिया। आजादी के लिए हुए आंदोलन में सक्रिय रहीं सरोजिनी ने दांडी यात्रा में महात्मा गांधी के कदम से कदम मिलाए। गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने धरसाना सत्याग्रह की कमान भी बखूबी संभाली। आजादी के बाद वह देश की पहली महिला राज्यपाल (उत्तर प्रदेश) बनीं। हिंदी के अलावा वे उर्दू, तेलुगू, अंग्रेजी, फारसी और बंगाली भाषाओं की भी अच्छी जानकार थीं।
हौसले के तीखे तेवर- इंदिरा गांधी
1966 में पहली बार भारत की प्रधानमंत्री बनीं
जवाहरलाल नेहरू की पुत्री और देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी किसी परिचय की मोहताज नहीं। अपने तीखे और क्रांतिकारी तेवरों की झलक उन्होंने बचपन में ही वानर सेना का गठन करके दिखा दी थी। जवाहरलाल नेहरू ने ऑटोबायोग्राफी टूवर्डस फ्रीडम में लिखा है कि जब वह जेल में थे, तब ब्रिटिश सरकार ने उन पर कुछ जुर्माना लगा दिया था। उसे वसूलने के लिए पुलिस अचानक उनके घर जा पहुंची और फर्नीचर उठाकर ले जाने लगी। घर के सभी लोग सकते में थे, लेकिन चार साल की इंदिरा से यह सहन नहीं हुआ और वह खुलकर उनका विरोध करने लगी। इंदिरा के इन तेवरों में नेहरू को बेटी का उज्जवल भविष्य दिखाई दिया। पिता के साथ इंदिरा का जुड़ाव शुरू से ज्यादा रहा। वह उनसे लगातार पत्र व्यवहार करतीं और राजनीतिक मुद्दों पर दोनों विचार-विमर्श भी करते। अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि से बिल्कुल अलग दबंग और कुशल राजनेता के रूप में उन्हें जाना जाता था। वह आपातकाल और स्वर्णमंदिर ऑपरेशन जैसे कड़े फैसलों के लिए पहचानी जाती हैं।
विदेश में मिली विजय- विजयलक्ष्मी पंडित
1937 में पहली महिला मंत्री चुनी गईं
जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और सरोजिनी नायडू से प्रेरित थीं। असहयोग आंदोलन में प्रभावी भूमिका निभाने वाली विजयलक्ष्मी आजादी के बाद सोवियत संघ (1947-1949), मैक्सिको (1949-1951), आयरलैंड (1955-1961) और स्पेन (1958-1961) में भारत की राजदूत रहीं। 1953 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्षता करने वाली वह पहली महिला बनीं। 1979 में उन्होंने संरा मानवाधिकार आयोग में भारत का प्रतिनिधित्व किया। भाई की बेटी इंदिरा के साथ उनके संबंधों में ताउम्र तल्खी रही, जो अकसर देखने को मिली।
खुले मन की एक कहानी- पद्मजा नायडू
1986 में पश्चिम बंगाल की पहली महिला राज्यपाल बनीं
सरोजनी नायडू की पुत्री पद्मजा अपनी मां की ही तरह देश के लिए समर्पित थीं। उन्होंने खादी को बढ़ावा देने के साथ विदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल रोकने की दिशा में काफी काम किया। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाली पद्मजा जेल भी गईं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन्हें 1956 में पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया गया। दूसरी बार 1967 में वह बंगाल की राज्यपाल बनीं। बांग्लादेश रिफ्यूजी ऑपरेशन के दौरान वह इंडियन रेडक्रॉस सोसायटी की चेयरमैन थीं। इसके अलावा उन्हांेने भारत सेवक समाज, ऑल इंडिया हैंडीक्राफ्ट बोर्ड और नेहरू मेमोरियल फंड में भी अहम जिम्मेदारियां निभाईं। पद्मजा को नेहरू की करीबी महिला मित्रों में गिना जाता है। नेहरू को उनका सेंस ऑफ ह्यूमर और खुली विचारधारा बहुत पसंद थी। वे पद्मजा के मां सरोजिनी नायडू के प्रति उनका अगाध प्रेम से भी काफी प्रभावित थे। जब भी वह मां के बारे में बात करतीं तो उनकी आंखें भर आतीं। कई मामलों में उन्होंने नेहरू को सलाह भी दी। पद्मजा की एक और खासियत यह थी कि वह जब कभी टूर पर जातीं तो हर रोज बाल जरूर धोतीं।
घर से उठी चिंगारी- सुचेता कृपलानी
1963 में पहली महिला मुख्यमंत्री चुनी गईं
स्वतंत्रता आंदोलनों में सुचेता कृपलानी की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी उन्‍होंने सक्रिय भूमिका निभाई। वह 1946 में संसद की सदस्य चुनी गईं और 1958-60 के मध्य कांग्रेस की जनरल सेकेट्ररी भी रहीं। 1963 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। उन्हें देश की पहली महिला मुख्यमंत्री होने का गौरव प्राप्त है। लंबे समय तक सक्रिय राजनीति में रहने के बाद वह रिटायर हो गईं। वह जितनी अच्छी राजनीतिज्ञ थीं, उतनी ही जिम्मेदार पत्नी भी।
बढ़े मदद के हाथ- मदर टेरेसा
1980 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित
दया की प्रतिमूर्ति और गरीब, बेसहारा लोगों के लिए हमेशा काम करने वाली मदर टेरेसा को 1980 में उनके मानवीय कार्यो के लिए नोबेल पुरस्कार से नवाज़ा गया। अल्बानिया में जन्मी मदर समाज सेवा करना चाहती थीं और उन्‍होंने भारत को अपनी कर्मस्थली चुना। यहां उन्होंने बरसों तक गरीब और बेसहारों की मदद के लिए हाथ बढ़ाए। मदद के ये हाथ हमेशा मिलते रहें, इसके लिए उन्‍होंने कोलकाता में मिशनरीज ऑफ चैरिटी संस्था की नींव रखी। यह संस्था एड्स, कुष्ठ रोग और टीबी के मरीजों के अलावा गरीब और बेसहारा लोगों के लिए काम करती है। मरणोपरांत मदर को संत की उपाधि दी गई। उन्हें 1980 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया।
खूबसूरत ताकत- महारानी गायत्री देवी
1960 के दशक में वोग के कवर पेज पर आईं
खूबसूरती का प्रतीक महारानी गायत्री देवी को मशहूर इंटरनेशनल पत्रिका वोग ने 60 के दशक में अपने कवर पेज पर दुनिया की दस सबसे खूबसूरत महिलाओं की श्रेणी में रखा। बचपन की टॉम बॉय गायत्री धीरे-धीरे अपने लुक को लेकर सजग होती गईं। उनके पास ज्वैलरी का खासा कलेक्शन था। वह एमरॉल्ड को कभी भी ग्रीन साड़ी पर नहीं पहनती थीं। इससे उनकी मिक्स एंड मैच का पता चलता है। जयपुर राजघराने की महारानी होने के साथ ही उनका राजनीति में भी खासा दखल रहा।
मुखर कलम की धनी- अमृता प्रीतम
1956 में साहित्य अकादमी अवॉर्ड, ज्ञानपीठ अवॉर्ड जीता
भारत के प्रमुख साहित्यकारों की सूची इनके बिना अधूरी है। मूल रूप से पंजाबी भाषा में लिखने वाली अमृता पहली महिला थीं, जिन्हें 1956 में साहित्य अकादमी अवॉर्ड से नवाजा गया। अमृता को जितना प्यार भारत में मिला, उतना ही सम्मान पाकिस्तान ने दिया। 100 से भी ज्यादा किताबों लिखने वाली अमृता कविता, फिक्शन, बायोग्राफी और पंजाबी लोकगीतों के लिए जानी जाती हैं। छह दशक तक साहित्य को समर्पित अमृता की किताब पर फिल्म भी बनी। जितनी मुखर उनकी कलम थी, उतना ही बोल्ड उनका व्यक्तित्व भी। चित्रकार इमरोज के साथ उनके संबंध हमेशा चर्चा में रहे। 2004 में उन्हें पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया गया।
अद्वितीय कलाकार- गंगूबाई हंगल
2002 में पद्म विभूषण और 1971 में पद्म भूषण से सम्मानित
शास्त्रीय गायन को एक नई पहचान दिलाने में गंगूबाई हंगल का अहम योगदान रहा है। कर्नाटक की इस गायिका को उनकी खनकदार और गहरी आवाज के लिए जाना जाता है। गणेशोत्सव से सुर साधना शुरू करने वाली गंगूबाई ने गायकी की घराना परंपरा को बरकरार रखा। किराना घराना के साथ उन्हांेने सवाई गंधर्व की दीक्षा भी ली। गायन में अभिन्न योगदान के लिए उन्हें कर्नाटक संगीत नृत्य अकादमी और संगीत नाटक अकादमी अवार्ड भी मिला।
उभरी नई तस्वीर- अमृता शेरगिल
1933 में पेरिस के एसोसिएशन ऑफ द ग्रैंड सैलून में प्रदर्शनी
इस खूबसूरत चित्रकार की कूची ने कैनवास पर भारत की एक नई तस्वीर उकेरी है। अपनी पेंटिंग्स के बारे में अमृता का कहना था- मैंने भारत की आत्मा को एक नया रूप दिया है। यह परिवर्तन सिर्फ विषय का नहीं, बल्कि तकनीकी भी है। अमृता का जन्म भले ही हंगरी में हुआ, लेकिन उनकी पेंटिंग्स भारतीय संस्कृति और उसकी आत्मा का बेहतरीन नमूना हैं। इनको धरोहर मानकर दिल्ली की नेशनल गैलेरी मंे सहेजा गया है। अमृता जितनी खूबसूरत थीं, उतना ही उनकी पेंटिंग्स में नफासत थी। उनकी पेंटिंग यंग गल्र्स को पेरिस में एसोसिएशन ऑफ द ग्रैंड सैलून तक पहुंचने का मौका मिला। यहां तक पहुंचने वाली वह पहली एशियाई महिला चित्रकार रहीं। यह गौरव हासिल करने वाली वह सबसे कम उम्र की महिला चित्रकार भी थीं।
सपनों की उड़ाने- कल्पना चावला
1997 में कोलंबिया से अंतरिक्ष में पहली उड़ान
हरियाणा के करनाल में जन्मीं कल्पना ने देश-विदेश ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा है। आसमान में उड़ने की प्रेरणा कल्पना को मशहूर पायलट व इंडस्ट्रियलिस्ट जेआरडी टाटा से मिली। 1995 में नासा एस्ट्रोनट के रूप में कल्पना ने अपनी उड़ान की ओर पहला कदम बढ़ाया। वह अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की पहली महिला थीं। हालांकि दुर्भाग्यवश उनका अंतरिक्ष यान कोलंबिया धरती पर लौटते समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया।