मैडम
भीकाजी कामा पहली भारतीय थीं, जिन्होंने 22 अगस्त 1907 को जर्मनी में
इंटरनेशनल सोशलिस्ट कॉन्फ्रेंस के दौरान हजारों विदेशी प्रतिनिधियों के
सामने भारतीय राष्ट्र ध्वज फहराया था। तब उस भारतीय युवती का ओजस्वी
व्यक्तित्व देखकर वहां उपस्थित विभिन्न देशों के प्रतिनिधि चकित रह गए। कुछ
लोग उन्हें भारत की महारानी या राजकुमारी समझ रहे थे। राष्ट्रध्वज फहराने
के बाद उन्होंने वहां उपस्थित जनसमुदाय को संबोधित ...
करते
हुए कहा था, भारत की आजादी का यह झंडा उन अनगिनत भारतीय युवाओं के पवित्र
खून से रंगा है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने जीवन का बलिदान दे
दिया। मैं यहां उपस्थित सभी लोगों से आग्रह करती हूं कि आप भारतीय
स्वतंत्रता के इस ध्वज को सलाम करें। मैं विश्व के सभी स्वतंत्रताप्रेमियों
से आग्रह करती हूं कि वे स्वाधीनता की इस लडाई में हमें सहयोग दें। यह
सोचने वाली बात है कि देश की आजादी के 40 वर्ष पहले अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक
मंच पर भारत की उपस्थिति दर्ज कराने वाली, उस अकेली भारतीय स्त्री की
शख्सीयत कितनी दमदार रही होगी।
1914 में प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जब फ्रांस और ब्रिटेन के बीच संधि हुई तो पेरिस इंडियन सोसायटी के लगभग सभी सदस्यों ने पेरिस छोड दिया, लेकिन भीकाजी ने विपरीत स्थितियों में भी वहीं रह कर देश की आजादी के लिए संघर्ष करना मंजूर किया। जब पंजाब रेजिमेंट की टुकडी ब्रिटेन और उसके मित्र देशों की तरफ से लडाई करने के लिए फ्रांस की धरती पर पहुंची तो भीकाजी ने उसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और उसी दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 1935 तक वह यूरोप में नजरबंद रहीं। इसी बीच वहीं उन्हें पक्षाघात का दौरा पडा और उनके वकील सर कावासाजी जहांगीर के काफी प्रयासों के बाद उन्हें घर वापस जाने की अनुमति मिल गई और वह मुंबई लौट आई। अपने देश की आजादी के लिए अंतिम सांस तक लडने वाली इस महान शख्सीयत का 13 अगस्त 1936 को, 74 वर्ष की आयु में मुंबई के पारसी जनरल हॉस्पिटल में स्वर्गवास हो गया।
दोस्तों ये हैं हमारे "हिंदुस्तान" की "जांबाज नारियां"
इन्हें दिल से सलाम ....
जय हिंद ... वन्देमातरम .....
1914 में प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जब फ्रांस और ब्रिटेन के बीच संधि हुई तो पेरिस इंडियन सोसायटी के लगभग सभी सदस्यों ने पेरिस छोड दिया, लेकिन भीकाजी ने विपरीत स्थितियों में भी वहीं रह कर देश की आजादी के लिए संघर्ष करना मंजूर किया। जब पंजाब रेजिमेंट की टुकडी ब्रिटेन और उसके मित्र देशों की तरफ से लडाई करने के लिए फ्रांस की धरती पर पहुंची तो भीकाजी ने उसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और उसी दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 1935 तक वह यूरोप में नजरबंद रहीं। इसी बीच वहीं उन्हें पक्षाघात का दौरा पडा और उनके वकील सर कावासाजी जहांगीर के काफी प्रयासों के बाद उन्हें घर वापस जाने की अनुमति मिल गई और वह मुंबई लौट आई। अपने देश की आजादी के लिए अंतिम सांस तक लडने वाली इस महान शख्सीयत का 13 अगस्त 1936 को, 74 वर्ष की आयु में मुंबई के पारसी जनरल हॉस्पिटल में स्वर्गवास हो गया।
दोस्तों ये हैं हमारे "हिंदुस्तान" की "जांबाज नारियां"
इन्हें दिल से सलाम ....
जय हिंद ... वन्देमातरम .....

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