Tuesday, 6 December 2011

नक्सलवादियो की करतूत

 

''माओवादी शिविरों मेंदिन भर की हाड़ तोड़ मेहनत करने वाली महिलाओं को रात में शीर्ष नेता यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर करते हैं.'' ये बातें एक माओवादी डायरी से सामने आईं हैं.

 

''माओवादी शिविरों में महिलाओं की जीवन सबसे कठिन है. उनका वहां जमकर शारीरिक शोषण किया जाता है. यह जीवन बेहद कठिन है. शिविरों में कुछ दिन गुजरते ही वे तमाम सपने और आदर्श ताश के पत्तों की तरह भरभरा कर ढह जाते हैं जिनके चलते महिलाएं इस संगठन में शामिल होती हैं.'' यह कोई कहानी नहीं बल्कि एक महिला माओवादी की डायरी के हिस्से हैं. राज्य में नक्सल आंदोलन के इतिहाल में पहली बार किसी माओवादी नेता की डायरी पुस्तक की शक्ल में सामने आई है. इसका प्रकाशन और विमोचन कोलकाता पुस्तक मेले के आखिरी दिन हुआ. यह डायरी लिखी है एक पूर्व माओवादी कमांडर शोभा मांडी ने. रोज रोज के शोषण से तंग आकर उसने बीते साल अगस्त में हथियारों समेत पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया था. फिलहाल वह पश्चिम मेदिनीपुर जिले में हथियार डालने वाले माओवादियों के पुनर्वास के लिए बने ट्रांजिट कैंप में रह रही है.
एक माओवादीर डायरी (एक माओवादी की डायरी)' शीर्षक बांग्ला में लिखी यह पुस्तक माओवादी शिविरों में  खासकर आदिवासी महिलाओं की हकीकत का खुलासा करती है. शोभा ने बीते साल हथियार डालने के बाद सीपीआई (माओवादी) के राज्य सचिव कंचन समेत कई शीर्ष माओवादी नेताओं के खिलाफ बलात्कार की शिकायत दर्ज कराई थी. इस पुस्तक में शोभा की लिखी लघु कविताएं भी शामिल हैं. मेले में दूसरे नक्सल साहित्य के उलट इस पुस्तक का विमोचन बहुत गुपचुप तरीके से हुआ. इस पुस्तक में माओवादी शिविरों, जंगलमहल इलाके में नाकेबंदी और हथियार डालने के बाद शोभा मांडी की कुछ तस्वीरें भी हैं.पुस्तक मेले में एक माओवादी की डायरीपुस्तक मेले में एक माओवादी की डायरी
लेकिन ट्रांजिट कैंप में रहते हुए शोभा ने प्रकाशकों से संपर्क कैसे किया? इस सवाल पर एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कहते हैं, ''शोभा हमारी शरण में जरूर है. लेकिन वह आजाद है और किसी से भी संपर्क कर सकती है.'' पुस्तक में सीपीआई (माओवादी) संगठन और उसके ढांचे के बारे में काफी सूचनाएं हैं. शोभा ने लिखा है कि शीर्ष माओवादी नेता किशनजी संगठन में महिला काडरों के शोषण पर कोई ध्यान नहीं देते थे. उसने लिखा है, ''किशनजी ने एक खास राजनीतिक दल से जुड़े किसी भी व्यक्ति की हत्या करने का निर्देश दिया था. हमें कभी यह नहीं बताया गया कि आखिर बेकसूर लोगों की हत्या से क्या मिलेगा.''
बांकुड़ा जिले की कोएरपहाड़ी की जमादार मांडी की पुत्री शोभा वर्ष 2003 में संगठन में शामिल हुई थी. माओवादियों ने उसके परिवार को भरोसा दिलाया था कि संगठन में शामिल होने के बाद शोभा का जीवन बेहतर हो जाएगा. शोभा कहती है, ''हम गरीब थे. उनकी बातों में आकर मैं संगठन में शामिल हो गई. लेकिन वह जीवन का एक खौफनाक अनुभव रहा.'' हथियार डालते वक्त शोभा ने कहा था कि जंगल में उसका मानसिक और शारीरिक शोषण किया गया और उसे शीर्ष नेताओं के साथ सोने पर मजबूर किया गया. उसने किशनजी से भी इस बात की शिकायत की थी. लेकिन उन्होंने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया.
लगभग सात साल तक इस खौफनाक दौर से गुजरने के बाद आखिर शोभा ने तय किया कि अब बहुत हो गया. उसने पुलिस के आला अधिकारियों से संपर्क किया और हथियार डाल दिए.!!

महिलाओं के लिए चौथा सबसे खतरनाक देश भारत !!

 

हिंसा, खराब स्वास्थ्य सुविधाएं, गंभीर गरीबी के कारण अफगानिस्तान महिलाओं के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक देश है. लेकिन पड़ोसी भारत की हालत भी ऐसी ही. पाकिस्तान कांगो के बाद चौथा सबसे खतरनाक देश भारत.

 
कांगो में महिलाओं पर होने वाली बलात्कार की अत्यधिक घटनाओं के कारण यह दूसरा सबसे खतरनाक देश है. थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन एक्सपर्ट के मत सर्वेक्षण में यह तथ्य सामने आया है.
खतरे में पाकिस्तान तीसरे, भारत चौथे और सोमालिया पांचवे नंबर पर है. इस सर्वे में घरेलू हिंसा, महिलाओं के प्रति आर्थिक भेदभाव से लेकर एसिड हमलों को आधार बनाया गया है. विमेन चेंज मेकर्स ग्रुप की अध्यक्ष एंतोनेला नोतारी कहती हैं, "जारी संकट, नाटो के हवाई हमले और सांस्कृतिक परंपराएं अफगानिस्तान को महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक जगह बनाते हैं. साथ ही जो महिलाएं सार्वजनिक समाज में मुंह खोलने की कोशिश करती हैं या नेतृत्व करती हैं, या पुलिसस पत्रकार के तौर पर काम करती हैं तो उन्हें अक्सर धमकाया जाता है या मार दिया जाता है." कांगो की अराजक स्थितिकांगो की अराजक स्थिति
ट्रस्ट लॉ का पोल 
थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन की कानूनी समाचार सेवा ट्रस्ट लॉ ने यह सर्वे करवाया. ट्रस्ट लॉ ने महिलाओं के कानूनी अधिकारों के बारे में उन्हें जागरूक करने और सूचना देने के लिए विशेष विभाग बनाया है.   
इस सर्वेक्षण के तहत पांच देशों के 213 जेंडर मामलों के जानकारों से सवाल पूछे गए. इसके तहत उनसे खतरनाक का मतलब, स्वास्थ्य सुविधाओं, यौन हिंसा, हिंसा, सांस्कृतिक या धार्मिक तथ्यों से जुड़े सवाल पूछे गए.
कुछ जानकारों का मानना था कि भेदभाव जैसे मामले कभी मुख्य खबर नहीं बनते लेकिन वह भी बम, गोली, पत्थरबाजी जितने ही खतरनाक साबित हो सकते हैं. वॉशिंगटन की इंटरनेशनल रेस्क्यू कमेटी में काम करने वाली एलिजाबेथ रोएसेच कहती हैं, "मुझे लगता है कि महिलाओं के लिए खतरनाक सभी मुद्दों को देखा जाना चाहिए. अगर कोई महिला इसलिए स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ नहीं ले सकती क्योंकि उसके स्वास्थ्य को कोई प्राथमिकता ही नहीं दी जाती है, तो यह बहुत ही गंभीर बात होगी." पाकिस्तान तीसरा सबसे खतरनाकपाकिस्तान तीसरा सबसे खतरनाक
सबसे खतरनाक    
अफगानिस्तान को सबसे खतरनाक की श्रेणी में इसलिए रखा गया है क्योंकि वह छह में से तीन श्रेणियों में बिलकुल पिछड़ा हुआ है. स्वास्थ्य, हिंसा और आर्थिक संसाधनों के मामले में अफगानिस्तान खराब हालत में है. प्रसव के दौरान मां की मृत्यु, डॉक्टरों तक कम पहुंच और आर्थिक अधिकारों का नहीं होना हालात खराब बनाता है. अफगानिस्तान में प्रसव के दौरान हर 11 में एक महिला की मौत हो जाती है.
डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो अभी भी 1998 से 2003 तक चले युद्ध से उबर नहीं पाया है. और पूर्वी कांगो में महिलाओं के साथ यौन हिंसा की दर बहुत ज्यादा है. हर साल देश में चार लाख महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं. संयुक्त राष्ट्र ने कांगो को बलात्कारियों की राजधानी करार दिया है.
भारत में कम कार्रवाई
पाकिस्तान दुनिया में महिलाओं के लिए तीसरा सबसे खतरनाक देश है. इसका कारण देश की सांस्कृतिक, कबायली और धार्मिक परंपराएं हैं. इनमें एसिड हमले, बाल विवाह, जबरन विवाह और सजा या पत्थर मार कर सजा देने जैसे रिवाज शामिल हैं. अंतरराष्ट्रीय एचआईवी एड्स एलियांस की दिव्या बाजपेई कहती हैं, "पाकिस्तान में दहेज के लिए हत्या या ऑनर किलिंग और जल्दी शादी के बहुत मामले सामने आते हैं." पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग के मुताबिक वहां हर साल एक हजार महिलाएं या लड़कियां ऑनर किलिंग का शिकार होती हैं. मानव तस्करी बड़ी समस्यामानव तस्करी बड़ी समस्या
भ्रूण हत्या कारण
भारत का चौथा नंबर मुख्य तौर पर कन्या भ्रूण की हत्या और मानव तस्करी है. 2009 में तात्कालीन गृह सचिव मधुकर गुप्ता ने कहा था कि हर साल 10 करोड़ लोग खासकर महिलाओं और लड़कियों की तस्करी की जाती है. यह बात इतनी आम है लेकिन सरकार और पुलिस के चंगुल से बच जाती है. 
भारत के केंद्रीय जांच ब्यूरो सीबीआई का अंदाज है कि 2009 में 90 फीसदी तस्करी देश में ही हुई और देश में करीब 30 लाख यौनकर्मी हैं जिनमें अधिकतर बच्चियां हैं.
यौन कर्मियों के अलावा मजदूरी, जबरन विवाह के मामले भी शामिल हैं. और आंकड़ें कहते हैं कि इस तरह के अवैध काम करने के वालों के खिलाफ तेजी से कार्रवाई नहीं की जा रही और उन्हें कानून के फंदे में भी नहीं जकड़ा जा रहा है.!!

यूरोप में भी कन्या भ्रूण की हत्या


भारत में ही नहीं, यूरोप में भी कन्या भ्रूण हत्या के मामले सामने आ रहे हैं. खास तौर से पूर्वी यूरोप के देशों में ऐसा देखा जा रहा है कि लड़कों को ज्यादा पसंद किया जाता है. यूरोपीय परिषद इस बारे में कदम उठाना चाहता है.

 
जॉर्जिया, अजरबैजान, आर्मीनिया और अल्बानिया ऐसे देश हैं जहां लड़कियों की संख्या लड़कों के मुकाबले बहुत कम है. इन देशों में औसतन हर सौ लड़कियों की तुलना में 112 लड़के हैं. जर्मन समाचार पत्रिका 'डेयर श्पीगल' से बात करते हुए स्विट्जरलैंड की डॉरिस श्टुम्प ने इसे चिंताजनक बताया है. डॉरिस श्टुम्प यूरोपीय परिषद में स्विट्जरलैंड का नेतृत्व करती हैं. श्पीगल ऑनलाइन को दिए इंटरव्यू में श्टुम्प ने कहा, "औरतों पर इस बात का दबाव होता है कि वे बेटा पैदा करें और खानदान को वारिस दें. यह जरूरी है कि इस दबाव को कम किया जाए."
यूरोपीय परिषद के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर श्टुम्प ने एक प्रस्ताव तैयार किया है जिसके अनुसार बच्चे का लिंग जानने के बाद गर्भपात पर रोक लगाई जा सके. अगले हफ्ते इस प्रस्ताव पर चर्चा होगी. परिषद का यह सुझाव भी है कि लिंग की जांच को गैर कानूनी बनाया जाए.
डीएनए टेस्ट किट
जहां एक तरफ परिषद में लिंग जांच पर रोक लगाने की बहस हो रही है तो दूसरी ओर नई नई तकनीकों से जांच के और सरल तरीके लोगों को पेश किए जा रहे हैं. आम तौर पर गर्भ धारण करने के बारह हफ्ते बाद अल्ट्रासाउंड के जरिए देखा जा सकता है कि होने वाला बच्चा लड़का है या लड़की. लेकिन डीएनए टेस्ट के जरिए डॉक्टरों को बच्चे के लिंग के बारे में बहुत पहले से ही पता चल जाता है. 2007 में ब्रिटिश कंपनी 'डीएनए वर्ल्डवाइड' ने एक ऐसी किट तैयार की जिस से छह हफ्ते बाद ही यह टेस्ट किया जा सकता है. इसके बाद एक जर्मन कंपनी ने भी ऐसी ही किट बनाने का दावा किया. यानी घर बैठे ही आप अपना टेस्ट खुद ही कर सकते हैं वैसे ही जैसे प्रेगनेंसी टेस्ट किट से किया जाता है. यदि परिषद इस प्रस्ताव को पारित करता है तो उसे इस बात को भी सुनिश्चित करना होगा कि बाजार में इस तरह की चीजें उपलब्ध ना हों.
कब हो जांच?
जर्मनी में गर्भपात को लेकर नियम काफी सख्त हैं. यहां बारहवे हफ्ते के बाद गर्भपात की अनुमति नहीं है और लिंग जांच की अनुमति केवल बारहवे हफ्ते के बाद ही है. इस तरह से बच्चे के लिंग के कारण गर्भपात की कोई संभावना नहीं बचती. श्टुम्प का मानना है कि पूरे यूरोप में इसी तरह का कानून लागू होना चाहिए. उनका कहना है कि कन्या भ्रूण हत्या केवल पूर्व यूरोप के इन चार देशों में ही नहीं होती, बल्कि पश्चिम यूरोप में ऐसे कई देश हैं जहां ऐसा किया जाता है, "हमें इस बात के प्रमाण मिले हैं कि कई आप्रवासी भ्रूण के लिंग के कारण गर्भपात कराते हैं." श्टुम्प के अनुसार अभी इस बार में और छानबीन की जरूरत है.
अब आगे क्या?
यदि यह प्रस्ताव पारित हो जाता है और इस पर यूरोप में नया कानून लागू हो जाता है, तो क्या उसके बाद स्थिति बदल जाएगी? भारत और चीन में कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ कानून है. डॉक्टरों को लिंग बताने की इजाजत नहीं है. कन्या भ्रूण हत्या करने वाले डॉक्टर और मरीज दोनों को सजा हो सकती है. लेकिन इन कानूनों के बावजूद आज भी लोग होने वाली बेटियों की जान लेते हैं. कुछ लोग डॉक्टरों को रिश्वत दे कर बच्ची के पैदा होने से पहले ही उसकी जान ले लेते हैं, तो कुछ लोग बेटी पैदा होने के बाद उसका कत्ल कर देते हैं. एशिया में इस समय पुरुषों की तुलना में 16 करोड़ कम महिलाएं हैं. इस से निपटने के लिए केवल कानून बदलना ही काफी नहीं होगा, लोगों की सोच में बदलाव आना जरूरी है.

गर्भपात से भारत में घटती लड़कियां

 

भारत में अब भी ज्यादातर परिवार चाहते हैं कि उनके घर में लड़का पैदा हो. एक नए शोध से पता चला है कि लिंग निर्धारण के बाद हुए गर्भपातों के कारण पिछले दशक में जन्मी लड़कियों की संख्या 70 लाख कम रही.

 

ब्रिटिश मेडिकल जर्नल लैंसेट में छपी रिपोर्ट के मुताबिक जिन परिवारों में पहला बच्चा लड़की हुई और अल्ट्रासाउंड में उन्हें पता चला कि दूसरा बच्चा भी लड़की है तो उसे गर्भ में ही मार दिया जाता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि गरीब परिवारों के मुकाबले समृद्ध परिवारों में इस तरह लिंग आधारित गर्भपात ज्यादा होते हैं. आम तौर पर गरीब गर्भपात से पहले होने वाले टेस्ट कराने के काबिल नहीं होते.
1980 से लेकर 2010 के बीच एक करोड़ 20 लाख भ्रूणों की हत्या की गई. शोध में कहा गया है, "कन्या भ्रूण का पता लगने के बाद ही ज्यादातर मामलों में गर्भपात किया गया है, खासकर उन परिवारों में जहां पहले लड़की हुई है. इस वजह से लड़के और लड़कियों की संख्या में भारी फर्क आया है." 1991 में छह साल तक की उम्र के बच्चों में लड़कियों की संख्या लड़कों के मुकाबले 40 लाख कम थी. 2001 में यह संख्या बढ़कर 60 लाख हो गई.
2008 में जन्म दर प्रति महिला करीब 2.6 आंकी गई. 1990 में यह आंकड़ा 3.8 था. शोधकर्ताओं का मानना है कि जन्म दर घटने के साथ साथ अगर परिवार लड़के पैदा होते देखना चाहते हैं, तो इससे लड़कियों की संख्या पर भी असर होता है. सालाना तीन से लेकर छह लाख कन्या भ्रूणों को मार दिया जाता है. 2010 में लगभग एक करोड़ 35 लाख महिलाओं के गर्भ में लड़कियां थीं. इनमें से दो से लेकर चार प्रतिशत महिलाओं ने गर्भपात कराया. 2001 से 2011 के बीच कन्या भ्रूणों पता लगने के बाद गर्भपात 170 प्रतिशत के दर से बढ़ा है. लेकिन अच्छी बात यह है कि यह 1991 से 2011 के दशक में 260 प्रतिशत के दर से काफी कम रहा.
शोध में 2011 की जनगणना से जानकारी ली गई है और पूरे देश से लगभग दो लाख 50,000 जन्मों को देखा गया. इन सब परिवारों में पहले लड़की पैदा हुई. इसमें पता चला कि 1990 में हर 1000 लड़कों पर 906 लड़कियां थीं जबकि 2005 में लड़कियों की संख्या घटकर 836 हो गई. शोध से पता चला कि जिन परिवारों में पहले लड़का हुआ, उन्हें बाद में लड़की पैदा होने पर गर्भपात करने की जरूरत महसूस नहीं हुई.
भारत में पहला बच्चा लड़की होने पर गर्भपात करने के सबूत भी साफ नहीं हैं. भारत में 1963 में भ्रूण के लिंग निर्धारण पर पाबंदी लगाई गई थी. लेकिन इस कानून को तोड़कर सैंकड़ों परिवारों ने लड़का पैदा करने की अपनी तमन्ना को पूरा किया गया है. शोधकर्ता कहते हैं कि कानून तोड़ने से डॉक्टरों को बहुत कम सजा का सामना करना पड़ता है और यह पैसा कमाने का अच्छा जरिया है.

कन्या भ्रूण हत्या क्यों ??

 

कन्या भ्रूण हत्या भारत की समस्या है. दक्षिण एशिया के कई देशों में यह बुराई मिल जाती है. लेकिन अब यूरोप में भी यह समस्या जगह बना रही है.

 

"फिर बेटी...डॉक्टर साहब मैं इस बच्ची को जन्म नहीं दे सकती. मेरी पहले ही तीन बेटियां हैं."
यह डॉयलॉग एकदम भारतीय लगता है. समस्या वही, जज्बात वही, इलाज भी वही. लेकिन कहने वाली महिला भारतीय नहीं अल्बानिया की है. आंसू भरी आंखों से रोजा ने तिराना शहर में यह बात अपनी डॉक्टर से कही. 28 साल की रोजा के बाल अभी से सफेद होने लगे हैं. वह चौथी बार मां बनने वाली हैं. प्रेग्नेंसी को चार महीने हो चुके हैं. मतलब अबॉर्शन की वैध सीमा पार हो चुकी है. लेकिन वह बच्ची को जन्म न देने के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगाने को तैयार हैं.
बिगड़ता संतुलन
भारत में यह सामान्य बात लगती है. लेकिन अल्बानिया में भी अब यह बात सामान्य होने लगी है. और लोकतंत्र और मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली 47 देशों की संस्था काउंसिल ऑफ यूरोप ने चेतावनी दे दी है कि बेटों को जन्म देने के लिए कन्या भ्रूण हत्या जारी रही तो मामला गंभीर हो जाएगा. फिलहाल अल्बानिया में हर 100 लड़कियों पर 112 लड़के हैं. कुदरती तौर पर यह अनुपात 100 के मुकाबले 106 का होना चाहिए.
दक्षिण एशिया में कन्या भ्रूण हत्या पुरानी और गंभीर समस्या है. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक चीन, भारत और वियतनाम में लड़के लड़की का अनुपात सबसे ज्यादा बिगड़ा हुआ है. लेकिन काउंसिल ऑफ यूरोप चिंतित है कि समस्या ने यूरोप जैसे आधुनिक माने जाने वाले समाज में भी जगह बना ली है. अल्बानिया, आर्मेनिया, अजरबैजान और जॉर्जिया में स्थिति गंभीर होती जा रही है.
इन देशों में भी समस्या वही है जो भारत में है. बेटा नाम चलाता है और परिवार के लिए कमाने वाला बनता है. जानी मानी मानवविज्ञानी आफ्रेडिटा ओनुजी कहती हैं, "यह मानसिकता है जो चली आ रही है. कुछ क्षेत्रों में लड़कियों को बड़ा बोझ माना जाता है."
इस मानसिकता के नतीजे वैसे ही भयानक होते हैं जैसे भारत में बेटियों को जन्म देने वाली मांओं को भुगतने पड़ते हैं. रोजा बताती हैं, "पिछली बार मेरे पति ने मेरी जान ही ले ली होती. जब उसे पता चला कि मैं उसे बेटा नहीं दे सकती तो वह हिंसक हो गया. और मेरी सास भी." रोजा का पति तो उन्हें और उनकी बेटियों को घर से निकाल देना चाहता था. इसलिए रोजा पैदा होने से पहले अपनी चौथी बेटी को मार देना चाहती है.
सख्त कानून की जरूरत
अल्बानिया में एक सीमा से पहले अबॉर्शन की कानूनन इजाजत है. वहां 12 हफ्ते के गर्भ से पहले अबॉर्शन कराया जा सकता है. इसके बाद अबॉर्शन तभी हो सकता है जब तीन डॉक्टर उस पर राजी हों. लेकिन मानवाधिकार संगठन कहते हैं कि पाबंदियां सख्त नहीं हैं इसलिए अबॉर्शन कराना इतना मुश्किल नहीं है. 2002 से भ्रूण जांच की सुविधा उपलब्ध है, जिसने कन्या भ्रूण के अबॉर्शन को और ज्यादा बढ़ा दिया है. 15 यूरो यानी लगभग एक हजार रुपये में ही अल्ट्रासाउंड से भ्रूण की लिंग जांच कराई जा सकती है. और अबॉर्शन भी 9-10 हजार रुपये में हो जाता है.
काउंसिल फॉर यूरोप ने एक प्रस्ताव पारित कर इस स्थिति को खतरनाक बताया है. उसने अल्बानियाई अधिकारियों को इस बारे में गहन जांच करने और उचित कदम उठाने को कहा है. हालांकि अल्बानियाई अधिकारी स्थिति को ज्यादा गंभीर नहीं मानते. देश के स्वास्थ्य मंत्री पेट्रिट वासिली कहते हैं, "अस्पतालों में सब कुछ नियंत्रण में होता है. ग्रामीण क्षेत्रों में लोग बेटों को तरजीह देते हैं लेकिन उसका जनसंख्या के नियंत्रण पर कोई असर नहीं है."
देश के स्वास्थ्यकर्मी सिर्फ सख्त कानून को समस्या का इलाज नहीं मानते. तिराना के कोचो ग्लोजेनी अस्पताल की मुखिया रुबेना मोइजू कहती हैं कि कानूनों को दाव पेंच से धोखा दिया जा सकता है, इसलिए इसका तरीका यही है कि लिंग जांच को ही बंद कर दिया जाए. वह कहती हैं, "हमें मानसिकता बदलनी होगी."

तलाक तलाक तलाक -क्या मजाक है ??

इस्‍लामी मंशा के खिलाफ भी है इस तरह की ज्‍यादतियां
पूरे देश में अलख जगायेंगी इस मसले पर मुस्लिम महिलाएं
मुस्लिम निजी कानूनों को संहिताबद्ध कर दिये जाने की मांग
नेता और मजहबी रहनुमा ही बने हैं औरतों की राह का रोडा
भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने आज साफ ऐलान कर दिया कि तीन बार तलाक कह कर किसी  भी महिला को उसके हक और हुकूक से महरूम कर देने की साजिश का पुरजोर विरोध किया जाना चाहिए। केवल तीन बार तलाक कह देना किसी की बपौती नहीं है। इस्‍लामी कानून सबके लिए बराबर है और सभी को उसका सम्‍मान करना ही चाहिए। यह महिलाएं इस्‍लामी कानूनों को संहिताबद्ध करने की भी मांग कर रही हैं ताकि महिलाओं के हितो की रक्षा की जा सके। वजह यह  कि निजी कानूनो में महिलाओं के लिए जो जगह छोडी गयी है वह कुरआन के सिद्धांतों के सर्वथा खिलाफ है। कुरआन में महिलाओं के अधिकार मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड में नजर ही नहीं आते। इन महिलाओं का कहना है कि अब इस मसले पर देशव्‍यापी आंदोलन छेडा जाएगा।
भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की ओर से कैसरबाग स्थित नारी नाट्य कला केंद्र में जुबानी एकतरफा तलाक के विरोध में अधिवेशन का आयोजन किया गया। इसमें लगभग 500 मुस्लिम महिलाओं ने भाग लिया। अधिवेशन में मुस्लिम निजी कानून को संहिताबद्ध किये जाने की मांग की गई। बीएमएम की संस्‍थापक साफिया नियाज ने कहा कि पाकिस्‍तान बांग्‍लादेश इंडोनेशिया इजिप्‍ट मोरक्‍को जैसे मुस्लिम देशों में निजी कानूनों को कोडीफाई किया जा चुका है लेकिन भारत में यह काम सरकार और मजहबी नेताओं और तथाकथित धार्मिक रहनुमाओं की साजिशों के चलते ठप है। कार्यक्रम में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की संस्थापक सदस्य नाइश हसन ने कहा कि बांग्लादेश पाकिस्तान इंडोनेशिया मिस्र मोरक्को में मुस्लिम निजी कानून को संहिताबद्ध किया जा चुका है लेकिन हमारे देश में मजहबी रहनुमाओं के चलते अभी तक ऐसा नहीं हो सका है। सरकार भी वोट बैंक की सियासत के कारण मुस्लिम महिलाओं के हितों की अनदेखी कर रही है।
इस मौके पर अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की नेता सुभाषिनी अली ने कहा कि एक तरफा जुबानी तलाक के विरोध में समस्त मुस्लिम महिलाओं को संगठित होकर आवाज उठाने की जरूरत है। अधिवेशन में भरतीय महिला फेडरेशन की महासचिव आशा मन्नी बेगम नाज रजा हाशमी औलिया आफरीन समेत कई लोग मौजूद रहे!

इस्लाम में महिलाओं की स्थित !!

इस्लाम मेँ विचार की कोई स्वतंत्रता नहीँ होती है । कुरान , हदीस , हिदाया और सीरत -अन -नबी - से प्राप्त निर्देशोँ , विचारोँ और भावनाओँ से बाहर निकलकर विचार व्यक्त करना मुसलमानोँ के लिए वर्जित है । यही कारण है कि दुनिया के सभी मुस्लिम देश कट्टरता के साथ अपने मजहबी निर्देशोँ से बँधे होते हैँ और स्वतंत्र , आधुनिक , विकसित , तर्क संगत , न्यायप्रिय और नैतिक आदर्शोँ के साथ नहीँ चल पाते हैँ । महिलाओँ के अधिकारोँ को मध्ययुगीन , बुर्कोँ मेँ कैद कर मानवीय अधिकारोँ का घोर उलंघन करते हैँ । चार चार शादियोँ की छूट , मनमाना तलाक का अधिकार और जेहाद द्वारा प्राप्त गैर मुसलमानोँ की औरतोँ को रखैल रखना और उनसे बलात्कार करना उनके मजहब द्वारा स्वीकृत विधान है । वे विश्वास करते हैँ कि ये सब अल्लाह के हुक्म के अनुसार हैँ । अपनी मजहबी परम्पराओँ के कारण कोई मुस्लिम देश प्रजातंत्र को नहीँ अपना पाता है और नागरिक अधिकार...ोँ से अपनी जनता को वंचित रखने का प्रयास करता है । जेहाद को सर्वोच्च या प्रथम मजहबी फर्ज जानता है , जिसमेँ गैर मुसलमानोँ की हत्या करना , उनका धन लूटना , उनकी औरतोँ और बच्चोँ को गुलाम बनाना , औरतोँ से बलात्कार करना , उनकोँ बीवियाँ या रखैल बनाना आदि पवित्र कर्म माना जाता है । दुनियाँ के दुसरे सभी समाजोँ मेँ इन कर्मोँ को शैतानियत और नीच कर्म समझा जाता है । अन्याय , अनैतिकता , आतँक और अत्याचार के इन दुष्कर्मोँ का कोई मुसलमान विरोध नहीँ कर सकता है । सारी दुनिया के मुसलमानोँ ने गैर मुसलमानोँ के साथ यही किया है । दारूल इस्लाम बनाना उनका मजहबी कर्तव्य है । उसके लिए धोखाधडी , चोरी , बेईमानी , तस्करी , झूठ , फरेब सब कुछ नैतिक है । ऐसा नहीँ है कि इन दुष्कर्मोँ को मुसलमान बुरा कर्म नहीँ समझते हैँ । वे अपने समाज के अंदर इसे वैसा ही समझते है । लेकिन अपने समाज के बाहर अर्थात् गैर मुसलमानोँ के साथ उनके ये व्यवहार पवित्र कर्म बन जाते हैँ । क्योँकि उनके मजहब के निर्देश के अनुसार जेहाद उनका सर्वोच्च कर्तव्य है । जेहाद का अर्थ है लडाई । उनके पैगम्बर के अनुसार लडाई का अर्थ है धोखाबाजी । धोखाबाजी किसके साथ ? काफिरोँ के साथ ; जिन्हेँ कुरान का अल्लाह मुसलमानोँ का खुला दुश्मन घोषित करता है । अभी मुसलमान दुनिया को दारूल इस्लाम बनाने के काम मेँ जुटे हैँ । यदि मानवता के दुर्भाग्य से यह संभव हो गया तो अविचार , आतँक और धर्मान्धता की परम्परा उनके विभिन्न फिर्कोँ मेँ ही ऐसा विध्वँश पैदा करेगी कि मानवता का ही अन्त हो जाएगा । जो संस्कृति तर्क , न्याय और नैतिकता की जगह बल , विध्वँश और उत्पीडन से पैदा होती है वह अन्ततः अपना शत्रु आप ही होती है । उसे संस्कृति नहीँ , विकृति समझना चाहिए ।

कैसे चले दाल रोटी ?

आज के इस महगाई के यूग में कोई भी भारतीय नारी किस तरह से अपनी गृहस्ती को संचालित करे ?



बचपन में एक गाना सुना था- दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ। शायद उस समय दाल सस्ती होती होगी जो यह कहा जाता था।
इसी प्रकार एक अन्य मुहावरा दालों पर होता था-यह मुहं और मसूर की दाल।
यानि मसूर की दाल महंगी होती होगी जो यह कहा जाता था। (अगर गलत हो तो पाठक सुधार कर दें।)
लेकिन आज के समय में यह दोनों की पुरानी कहावतें या मुहावरे पुराने पड़ चुके हैं।
दालों के भाव आसमान छू रहे हैं और दाल-रोटी पाकर संतोष कर पाना एक कठिन कार्य हो चुका है।
नया मुहावरा है यह मुहं और अरहर की दाल क्योंकि अरहर की दाल अब 88 रुपए प्रति किलो हो गई है।

महंगाई मार गई

जहां अरहर की दाल 88 रुपए प्रति किलो है वहीं साबुत मसूर का भाव 66 रुपए, साबुत उड़द 60 रुपए और दाल उड़द 66 रुपए, मूंग साबुत और दाल मूंग दोनो ही 66 रुपए प्रति किलो हैं। चना 40 रुपए और चना दाल 56 रुपए प्रति बिक रही हैं।
दालें हमारे दैनिक आहार की प्रमुख खाद्य वस्तु है और मानव शरीर के लिए आवश्यक भी है क्योंकि इनमें प्रोटीन की मात्रा सबसे अधिक होती है। प्रोटीन प्राप्ति का दूसरा स्त्रोत मांस है जिसे शाकाहारी खा नहीं सकते हैं।
देश में दालों की कमी कोई नई बात नहीं है क्योंकि उत्पादन की तुलना में खपत अधिक होती है। एक अनुमान के अनुसार देश में दालों की वार्षिक खपत लगभग 180 लाख टन है जबकि उत्पादन 130 से 148 लाख टन के बीच घूम रहा है। अपनी खपत को पूरा करने के लिए दालों का आयात करना पड़ता है। हर वर्ष दलहनों का आयात किया जा रहा है जो 25 से 30 लाख टन के बीच होता है।
गत वर्ष भी देश में दालों के भाव में बढ़ोतरी हुई थी लेकिन आयात के कारण भाव अधिक नहीं बढ़ पाए। सरकार ने दालों के निर्यात पर भी प्रतिबंध लगा दिया।

बेकाबू अरहर

बहरहाल, इस वर्ष अरहर के बारे में हालात काबू से बाहर होते जा रहे हैं। इसका कारण इस वर्ष वर्षा की कमी या सूखे जैसी स्थिति है। अरहर खरीफ की प्रमुख दलहन है। देश में 2005-06 के दौरान अरहर का उत्पादन 27.38 लाख टन हुआ था जो 2006-07 में गिर कर 23.14 लाख टन होने के बाद अगले ही वर्ष सुधर कर 30.75 लाख टन हो गया था। गत वर्ष उत्पादन 25 लाख टन ही होने का अनुमान है। और चालू वर्ष यानि 2009-10 का मानसून ही मालिक है।
जहां तक विदेशों का प्रश्न है वहां पर भी अरहर के भाव में तेजी आ रही है। गत माह तक अरहर का आयात लगभग 800 डालर प्रति टन की दर पर किया जा रहा था लेकिन अब आयात 1100 डालर से ऊपर के भाव पर किया जा रहा है।

घटती उपलब्धता
देश में दालों का उत्पादन मांग की तुलना में नहीं बढ़ रहा है। इससे बढ़ती जनसंख्या के कारण दलहनों की प्रति व्यक्ति खपत कम होती जा रही है।
वर्ष 2005-06 के दौरान देश में दलहनों का कुल उत्पादन 134 लाख टन था जो 2006-07 में बढ़ कर 142 लाख टन और 2007-08 में बढ़कर 148 लाख टन हो गया। बहरहाल, गत वर्ष यह गिर कर लगभग 142 लाख टन पर आ गया है। इससे सारा संतुलन बिगड़ गया।

खपत
देश में दालों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता भी कम होती जा रही है। वर्ष 1990 में देश में प्रति व्यक्ति दालों की उपलब्धता 41 ग्राम थी जो अब गिर कर 30 ग्राम के आसपास आ गई जबकि अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के अनुसार यह मात्रा 80 ग्राम होनी चाहिए।

उत्पादन कम क्यों?
देश में दलहनों का अधिकांश उत्पादन सिंचित क्षेत्र में होता है और वर्षा की जरा सी भी कमी उत्पादन का सारा गणित बिगाड़ देती है। दूसरा कारण अन्य देशों की तुलना में प्रति हैक्टेयर उत्पादन कम होना है क्योंकि बेहतर किस्म के बीज उपलब्ध नहीं है।
यदि सरकार बेहतर किस्म व रोग तथा कीट रोधक कम समय में पक कर तैयार होने वाले बीज किसानों को उपलब्ध कराए तो किसी सीमा तक देश में दालों की कमी को पूरा किया जा सकता है।