| विश्व साहित्य में वैदिक साहित्य का स्थान अद्वितीय है। इसकी वजह यह है कि इसमें वह सब कुछ मिल जाता है, जिसकी आवश्यकता मनुष्य को हर काल में रही है और रहेगी। सबसे अद्भुत बात यह है कि धर्म, संस्कृति और ईश्वर को जिस रूप में यहां मान्यता दी गई है, वैसी मान्यता और कहीं नहीं मिलती है। धर्म की वैसे तो कोई व्याख्या नहीं की जा सकती है, लेकिन यदि इसे एक वाक्य में कहना हो तो कहेंगे-धर्म मनुष्य जीवन को धारण करने और उसे परिष्कृत करने की एक विधि है। और यदि उपनिषद् की भाषा में कहें तो ईश्वरीय यानी प्रकृति के नियमों के अनुसार चलना धर्म है और इसके विपरीत कार्य करना अधर्म है। जिससे जीवन को परिमार्जित किया जा सके और जो जीवन को एक अच्छी कृति का स्वरूप प्रदान करे वह संस्कृति है। इसी तरह ईश्वर वह परम शक्ति है जो हर काल में इस सृष्टि निर्माण का कारण है। मतलब ऐसी शक्ति जो सृष्टि का निर्माण, पालन और विध्वंस करे। ये तीनों एक परम शक्ति हैं। इन तीनों के द्वारा ही मनुष्य सत्यम्, शिवम्और सुंदरम्को प्राप्त कर सकता है। देखा जाय तो तीनों शक्ति कहीं न कहीं एक दूसरे से जुडी होती है। इनका जुडाव जिस रूप में वैदिक साहित्य में प्रतिष्ठित है और विश्व के किसी भी साहित्य में देखने को नहीं मिलता है। धर्म को वैदिक साहित्य में ऋषियों ने जीवन की पूर्ण इकाई माना है। इसमें संस्कृति और ईश्वर दोनों आ जाते हैं। यह इसलिए कि धर्म ही पूर्ण रूप से धारण किया जा सकता है। यजुर्वेद के मुताबिक-सा प्रथमा विश्ववारा।यानी वैदिक संस्कृति ही विश्ववरणीयसंस्कृति है। इसी में संस्कारों को भी समाहित किया गया। सोलह संस्कारों की जैसी व्याख्या भारतीय संस्कृति में है और कहीं भी देखने को नहीं मिलता है। ये सोलह संस्कार जीवन को पूर्ण बनाते हैं। चारों आश्रम और चारों पुरुषार्थ इन संस्कारों का आधार लेकर ही पूरे किए जा सकते हैं। भारतीय विचारकों के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में मनुष्य के जीवन में धर्म ही मुख्य तत्व था। इससे ही सारे सुख प्राप्त किए जाते थे। वर्ण धर्म, राज धर्म, स्त्री धर्म, पुत्र धर्म, आश्रम धर्म और समाज धर्म की भूमिका शुरू से ही महत्वपूर्ण थी और आज भी है। धर्म के बगैर न तो संस्कृति बच सकती है और न ही ईश्वर को ही समझा जा सकता है। धर्म यह बताता है संस्कार के जरिए कैसे ब्रह्मत्वप्राप्त किया जा सकता है। धर्म यह भी बताता है कि अधर्म से कैसे बचा जा सकता है और सत्य-झूठ, न्याय-अन्याय, अहिंसा-हिंसा, प्रेम-घृणा और मानवता-दानवता में क्या अंतर है? विचारकों के अनुसार बिना धर्म के न पुण्य अर्जित किया जा सकता है और न ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। समाज को बेहतर और पूरी धरती को स्वर्ग बनाना है तो धर्म की शरण में जाना ही होगा। जो धर्म की शरण में पहुंच जाता है उसे सुख, आनंद और परमधाम-ये तीनों प्राप्त हो जाते हैं। जो धर्म की शरण में पहुंच जाता है, उसे ईश्वर की अनुकम्पा और जीवन की सार्थकता भी समझ में आ जाती है। इसलिए भगवान वेदव्यासकहते हैं-धर्म ही तप है और धर्म ही ज्ञान है। धर्म ही शक्ति है और धर्म ही भक्ति है। मतलब धर्म के बगैर न तो ईश्वरीय-पथ पर चला जा सकता है और न ही संस्कृति की रक्षा की जा सकती है। इसलिए वेद में धर्म को जीवन-सोपान माना गया है। आज यदि समाज में विकृति आ रही है तो धर्म रूपी यह सोपान टूट रहा है, जिसे बचाने की आवश्यकता है। |
बात चाहे आजादी की जंग लड़ रहे हिंदुस्तान की हो या आजाद भारत की, महिलाओं का योगदान भुलाया नहीं जा सकता। कुछ कर दिखाने का जज्बा उस समय भी उनके मन में था, जब वे घर की चारदीवारी में सजाकर रखे जाने वाले सामान की तरह थीं। तब भी उन्होंने चौखट से बाहर आकर अपनी शक्तिदुनिया को बताई। कोमल मन की दृढ़ता और असीमित क्षमताएं तब खुलकर सामने आईं, जब ये देश ही नहीं, बल्कि विदेश में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा आईं। यकीनन इन चेहरों का रसूख अब नहीं रहा, लेकिन प्रभाव आज भी कायम है।
Monday, 16 January 2012
सृष्टि का आधार है धर्म
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सृष्टि का आधार है धर्म
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Rewa, Madhya Pradesh, India
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