Saturday, 10 December 2011

नारी शक्ति और हमारा समाज

नारी और पुरूष, दोनों के बीच के दो दल है। इन दो दलों के माध्यम से ही सृष्टि-शस्य का विकास हुआ है। नारी की शक्ति को रूपा कहा गया है-‘या देबी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।‘यह केवल दुर्गा की शक्ति ही नही है,समस्त नारी जाति की स्तुति है।सभी प्राणियों में जो शक्ति रूप में उपस्थित है, हम उन्हे प्रणाम करते हैं। यही सृष्टि नारी को सृष्टि-सृजन का मूल कारण बनाती है। उसके पास पालन की अदभुत शक्ति है। शिशु को दुग्ध पालन कराने से लेकर संपूर्ण विश्व को करूणा से आप्यायित करने वाली नारी संसार की पर्याय भी है। वह चंडिका भी है। पाश्चात्य देशों में नारी को पुरूष की अर्धांगिनी नही उसे बेटर हाफ (Better Half) भी माना गया है और स्वीकार किया गया है कि प्रत्येक सफल पुरूष के पीछे किसी नारी का ही हाथ होता है।‘जहाँ नारी का आदर होता है वहाँ देवता निवास करते हैं।’
शारीरिक संरचना की भिन्नता में नारी को स्वभावत: सुकोमल शरीर और मनोलोक प्रदान किया गया है। वह सौंदर्य की प्रतिमूर्ति है। उसके आचरण में सर्वाधिक शील समाया हुआ है। इसके साथ ही उसमें शक्ति का वह स्फुल्लिंग भी प्रज्वलित होता रहता है, जो सृजन के साथ-साथ संहार की संपूर्ण संभावनाएं अपने तेज में समेटे रहता है। इस तरह नारी सौंदर्य, शील और शक्ति की त्रियामी क्षमताओं का समुच्चय है। सृष्टि के प्रारंभिक काल से लेकर पूर्व वैदिक काल तक नारी की शक्ति का सम्यक उपयोग सृष्टि को सुंदर बनाने में होता रहा है। नारी-पुरूष, का भेद उस काल तक मेधा, प्रतिभा, शक्ति आदि स्तरों पर नही था। पुरूष के समान नारी जीवन के सभी प्रसंगों में अपनी संपूर्ण शक्तियों का प्रयोग करती थी।
उत्तर वैदिक काल संपूर्ण विश्व में नारी शक्ति के अपक्षय का काल रहा है। पुरूष की बढती अहम्मन्यता ने नारी को दोयम श्रेणी का नागरिक मान लिया। उसे अपने अधिकार क्षेत्र की सीमाओं में सुरक्षित रखने की नीति के अंतर्गत समाहित कर लिया। बचपन में पिता, यौवन में पति और बुढापे में पुत्र नारी का संरक्षक होता है। वह कभी स्वतंत्र नही रह सकती। यह दृष्टिकोण भारतीय मनु का ही नही था अपितु मिश्र, ग्रीक, रोम आदि में भी स्त्री को पण्य वस्तु जैसा स्वीकार किय़ा गया। वह गुलामों जैसी खरीदी-बेची जाने लगी थी। एक पुरूष अनेक नारियों का स्वामी य़ा पति बन सकता था। इन परिस्थितियों में नारी शक्ति का न केवल ह्वास हुआ,बल्कि लोप भी होने लगा।
मध्द्यकालीन सामंतवाद ने नारी को भोग्या बनाकर उसकी शक्तियों को कीलित कर दिया। परिणामस्वरूप, नारी शक्ति का प्रयोजन केवल पुरूष के मनोरंजन और संतान-प्रजनन तक सीमित हो गया। वह स्थायी-हीनता बोध से ग्रस्त होकर अपंग व्यक्तित्व की मालकिन बन गई। यद्यपि इस लंबे अंतराल में अनेक नारियों ने भी इतिहास के सुनहरे पृष्ठों में अपना नाम दर्ज किया है, किंतु इनकी संख्या नगण्य ही रही। पिछली पूरी शताब्दी नारी शक्ति के पुनर्जागरण का काल रहा है। अमेरिका तथा यूरोप में नारी स्वतंत्रता का बिगुल पहले से ही बज रहा था, किंतु वहाँ भी नारी की पूर्ण शक्ति का उदघाटन नही हो पा रहा था। एशियाई एवं अफ्रीकी देशों में यह प्रक्रिया थोड़ी देरी से प्रारंभ हुई। भारत में उन्नीसवीं शताब्दी में नारी शक्ति के जागरण के लिए संविधान के जरिए एवं स्वतंत्र संगठनों के माध्यम से अनेक प्रयास किए गए। मुस्लिम देशों में तो अभी भी नारी–चेतना के द्वार अवरूद्ध हैं।
बीसवीं शताब्दी में भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बाँगलादेश, आदि देशों में नारियों ने राजनीतिक शक्ति के रूप में सर्वोत्तम प्रदर्शन किया है और आज विश्व स्तर पर जीवन के सभी क्षेत्रों में नारी शक्ति उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही है।विज्ञान,उद्योग, व्यवसाय,शिक्षा, कृषि, चिकित्सा, ऱक्षा, क्रीड़ा, कला, संस्कृति आदि क्षेत्रों में महिलाएं अपना सफलतम प्रदर्शन कर रही हैं।
आज भी दुनिया के एक बहुत बड़े हिस्से के देहाती इलाकों में नारी की श्रम-शक्ति कृषि और घरेलू उत्पादों में पुरूष से अधिक उपार्जित कर रही हैं। इधर वैज्ञानिक विकास के फलस्वरूप टेलीफोन आपरेटर, कंप्यूटर, साफ्टवेयर उद्योगों में क्रियाशील सेवाओं में नारी शक्ति का अधिक नियोजन हो रहा है।पाश्चात्य देशों में जहाँ नारी की शिक्षा का स्तर बढ़ा है वहाँ नारियां पुरूष क्षेत्र में भी पूर्ण दक्षता के साथ कार्य कर रही हैं।चिकित्सा, शिक्षा, कानून आदि क्षेत्रों में उनकी संख्या पर्याप्त है। भारत में नारी शिक्षा के स्तर में सुधार के फलस्वरूप उनके लिए नौकरियों के नए-नए अवसर सामने आ रहे हैं। आँगनवाड़ी कार्यकर्ता से लेकर पायलट तक के रूप में नारी कार्यशील है।
हमारे संविधान के अनुच्छेद 16 में नारी को पुरूष के समान ही अधिकार दिए गए हैं। विगत 64 वर्षों में समय-समय पर नारी के उत्थान और उसके अधिकारों के विस्तारों के लिए कई अधिनियम भी पारित किए गए। दहेज-समस्या,देह व्यापार समस्या आदि के साथ-साथ पैतृक संपत्ति मे भागीदारी और पिता की तरह माता के नाम का उल्लेख करने संबंधी अधिनियम भी पारित किए गए।
पाश्चात्य देशों में नारियों द्वारा चलाए गए ‘वूमेन्स लीव’ या ‘फेमिनिस्ट मूवमेंट’ इस बात की ओर संकेत करते हैं कि पश्चिम में कई नारियां अपनी शक्ति के विकाश की सही दिशा नहीं तलाश पा रही हैं और स्वयं अंतर्द्वन्धों से ग्रस्त हैं। मूल प्रश्न उस पुरूष मानसिकता का है, जिसमें नारी को देह से अधिक और कुछ नहीं माना जा रहा है। नारी शक्ति के जागरण में पुरूष के वे संस्कार आड़े आ रहे हैं जो शताब्दियों से उनमें सक्रिय हैं।
आज हमारे देश में नारी देह-दोहन प्रकरण में बेहताशा वद्धि क्यों हो रही है! अनेक युवतियां दहेज के दानव की बलि क्यों चढ रही हैं! आज भी गांव-देहातों में नारी को चारदीवारी के अंदर घूँघट डालकर असूर्यपश्या बनाने की कोशिश क्यों की जाती है! तलाक के बाद नारी के गुजारा भत्ता की राशि इतना कम क्यों ऱखी जाती है कि उससे अकेले भी उसका भरण-पोषण न हो सके! क्यों किशोरियों को बेचकर उनको वेश्यालय के नरक में ढकेला जा रहा है! बालिकाओं से लेकर वृद्धाओं तक से सरेआम बलात्कार के कुत्सित कृत्य क्यों हो रहे हैं!
यद्यपि यह कहना भी उचित नही है कि मात्र पुरूष ही इसके लिए दोषी हैं।महिलाएं विज्ञापनों, फिल्मों एवं अन्य कार्यक्रमों में अपने आपको जिस तरह प्रस्तुत कर रही हैं, उसमें देह उत्तेजक वातावरण बनाने की संभावनाएं प्रबल रही हैं। उपभोक्तावाद ने नारी देह को नए सिरे से भुनाने का प्रचार तंत्र बनाया है और यह एक तरह का आधुनिकीकृत सामंतवाद है, जिसके जाल मे स्वयं पढ़ी लिखी नारिय़ां भी फँस रही हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त महिलाएं वेश्यालयों की संचालिका बन रही हैं।
आर्थिक प्रतिस्पर्धा की इस अंधी दौड़ में नारी और पुरूष, दोनों इतने मशगूल हो गए हैं कि सारी नैतिकताएं ताक पर रख दी गई हैं। जब नैतिकता रहित समाज तैयार होता है तब उसका पहला आघात भी नारी को ही भोगना पड़ता है। आज नारी को संरक्षण या आरक्षण की जरूरत नही है। वह अपने भीतर से नारी होने की कुंठा का त्याग कर दे-इतना ही काफी है।
शिक्षा के क्षेत्र में लड़कियों को बेहतर अवसर उपलब्ध हो सके: सामाजिक स्तर पर दहेज समस्या, भ्रूण-परीक्षण आदि पर कड़े प्रतिबंध हो और सामाजिक संगठन इन पर नियंत्रण रखे तो नारी शक्ति की संपूर्णता का लाभ समाज उठा सकेगा, अन्यथा उभरती हुई नारी शक्ति को सही परिप्रेक्ष्य नही मिल पाएगा, जिससे सृजन की बजाय ध्वंस की आर्थिक संभावना बनी रहेगी।

नारी क्या अबला है ?

चिरकाल से नारी को अबला का दर्जा दिया गया है। सभ्य समाज में उसे हमेशा से दबाकर रखने की कोशिश की गई। प्रत्यक्ष नहीं तो परोक्ष रूप में उसे दोयम स्थान पर ही पहचान दी गई....उसे समाज में बोलने का हक नहीं था ...। हमेशा उसे दबा दिया जाता रहा है ...समय बदला ..दौर बदला....नारी की दशा भी बदलती गई आज नारी .. समाज के हर क्षेत्र में कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं और नये उदाहरण प्रतिदिन पेश कर रही है।अंतरिक्ष तक की सैर कर आई नारी अभी बलशाली होने की दौड़ में शामिल है। सपने रूमानी हैं और इरादे फौलादी .।रू़ढ़िवादी ..सामाजिक तानेबाने के मकड़जाल को काट बाहर आने की कोशिश में लगी नारी आज हर क्षेत्र में आगे निकलने की होड़ में लगी है . फुल पावर से लैस वामा नौकरी ,कारोबार,घर परिवार,समाज ,सरकार देश में आगे बढ़कर भूमिका निभा रही है ..आज भविष्य की दिशा तय कर मंजिल पर पहुंचने का नारा बुलंद कर रही ये महिलायें आने वाली अपनी पीढ़ी के लिये एक आईडल आइकान बन चुकी हैं ।.श्रीमती इंदिरा गांधी,इंद्रा नूई, चंदा कोचर,कल्पना चावला, निरूपमा राव,सुनीता नारायण, विनिता बाली ,इंदु लिब्राहन ,किरण बेदी,जयश्री व्यास ,फराहखान जैसे हजारों नाम ऐसे हैं जो आने वाली पीढ़ी को उनके इरादों ...उनके सपनों को सच्चा करने की प्रेरणा देते रहेंगे ...आज कहते हैं वो अपनी भाग्यविधाता है ..अनहोनी को होनी में टालने का हिम्मत रखती हैं ...देश में इस समय आबादी का 48 प्रतिशत हिस्सा महिलाओं का है ..उनके विचार ,कार्यशैली ,मूल्यपद्धति परिवार, समाज और देश को एक नईं बुलंदियों तक ले जाने में सक्षम हैं...हर जगह इनका रण बिगुल बज रहा है....
पर मेरा मानना है कि वामा की भागमभाग और रफ्तार पकड़ती दौड़ में कहीं कोई कन्फ्यूजन या पाश्चात्य फ्यूज़न का असर तो नहीं ...। आज शहर और गांव के नारी जगत में जमीन आसमान का फर्क देखने को मिलता है।क्या पाश्चात्य तौर तरीकों को अपना कर ही तो कहीं आज की नारी अपने आप को स्वतंत्र और सक्षम तो नहीं मान रही है। तकनीकि और शिक्षा ने बदलाव का रास्ता खोल दिया है।अभिभावकों की भी सोच में बदलाव आया है,परिवार और समाज भी उनके साथ खड़े नज़र आने लगे हैं। लेकिन सिर्फ भौतिक स्वरूप को तब्दील कर वो अपने दामन से अबला शब्द तो नहीं मिटा रही है। पश्चिम का अनुकरण करने में ही तो कहीं वो दिशाहीन होती जा रही है। कहीं वो इस तरह बेकार में परेशान तो नहीं है, अपने आप को समाज में साबित करने के लिये और पुरूष के बराबर रेस लगाने के चक्कर में ...। ऐसे में जरुरत है सजग हो जाने की और सामयिक विशलेषण की।
मैं कहता हूं कि उसे इस देश की सभ्यता और संस्कृति से ही सबक लेना चाहिए। भारत की नारी शुरू से ही सर्व शक्तिशाली रही है ,प्राचीन काल से ही उसे शक्ति के रूप में पूजा जाता रहा है ,भगवान राम ने भी लंका पर धावा बोलने के पहले मां दुर्गा की पूजा की थी । कहते है एक बार युद्ध में सारे देवतागण महिषासुर से हारने लगे राज पाट जाने लगा तो देवता भागकर भगवान के पास पहुंचे । भगवान ने सारे देवाताओं की सारी शक्तियां एक जगह इक्कठा कर नारी शक्ति के रुप में दुर्गा को उत्पन्न किया। अनेक सिर, अनेक हाथ ..हर में अस्त्र शस्त्र...सिंह पर सवार साहस शौर्य की प्रतीक उस नारी स्वरूप मां दुर्गा ने देवताओं(पुरूष) को महिषासुर से मुक्ति दिलाई और महिषासुर मर्दनी कहलाईं...।पर आज क्या नारी अपनी इस ताकत को समझ और संगठित कर पाई...पहचान पाई है अपनी उन शक्तियों को जो असुरों का दमन कर सकती हैं ..
वो खुद समाज में जाति लिंग के आधार पर भेदभाव में जुटी हुई है ।इज्जत के हक के लिये तरसती नारी को पहचानने की जरूरत है अपनी उस शक्ति को। उसे हटाना होगा मुखौटा रबर स्टैंप का ...बदलनी होगी इच्छा शक्ति...हटानी होगी दबने की मानसिकता...तभी वो उभर कर सामने आ पायेगी ।नारी को मां त्याग की मूर्ति,और ना जाने क्या पदवी देकर बोझ के तले दबाने की कोशिश लगातार जारी हैं ...खोखले दर्जों से दबी नारी अपनी तथाकथित जिम्मेदारियों को निभाती रही ...शायद ये पुरुष प्रधान समाज की सोच या षडयंत्र है या, समाज का ढ़कोसला...सदियों से महिलायें बचपन से झूठे आडम्बरो के बीच पिसते हुये इसे अपनी नियति मान चुकी हैं ..।बदलते दौर में उसने कोशिश की है ....पर फिर भी वो नितांत अकेली है ..जहां वो अपने को खोज रही है .....कुछ अपवादों को छोड़ दें तो देखें आज भी नारी वहीं है ..
मेरा सपना एक ऐसे समाज का है जहां स्त्री को अपने हक के बारे में सोचने की और अपने फैसले लेने की स्वतंत्रता हो। .य़े सही है कि आज़ादी के बाद इंदिरा गांधी, सरोजिनी नायडू,लक्ष्मी सहगल, सोनिया गांधी ,प्रतिभादेवी सिंह पाटिल, किरण बेदी,वसुंधरा राजे,ममता बनर्जी,उमा भारती,जयललिता, माया वती,राबड़ी देवी,देविकारानी से अरूणा ईरानी, रेखा,मधुबाला से मल्लिका शेरावत ,सैलिना जेटली,पीटी उषा,सानिया मिर्जा,एकता कपूर,सुष्मिता सेन, जैसी शख्सियतों के रूप में नारी के बदलते रूपों की झलक देखी...पर ये दौड़...इनके फौलादी इरादों को नहीं डगमायेगी ये तो इनका आने वाला कल ही बतला सकता है .......


नारी :शक्ति,बुद्धि,लक्ष्मी स्वरूपा,कल आज और कल

या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रूपेण संस्तिथा नमस्तस्यै ,नमस्तस्यै ,नमस्तस्यै नमो नम:।।
या देवी सर्व भूतेषु विद्या रूपेण संस्तिथा नमस्तस्यै ,नमस्तस्यै ,नमस्तस्यै नमो नम:।।
या देवी सर्व भूतेषु लक्ष्मी रूपेण संस्तिथा नमस्तस्यै ,नमस्तस्यै ,नमस्तस्यै नमो नम:।।
हिंदू धर्म में देवी के इसी तरह अनंत रूप माने गए हैं ,वह शांति रूपा हैं ,कला रूपा हैं ,भक्ति रूपा हैं ,प्रेम स्वरूपा हैं , वह लज्जा ,कांति,श्रद्धा,दया ,स्मृति ,मातृ रूपा हैं , वह श्रेष्ट हैं ,आदि हैं ,अनादी हैं ,सारे ब्रह्मांड की जननी हैं क्योकी वह नारी हैं । नारी शक्ति रूपिणी हैं ,दया, माया प्रेम की अदिष्ठात्री देवी हैं इसलिए वह पूज्य हैं । नवरात्री आते ही भारतीय संस्कारो में विश्वास रखने वाली सभी नारियाँ देवी पूजा में तल्लीन हो जाती हैं , माता पार्वती के अनेक रूपों की पूजा गुजरात ,बंगाल,महाराष्ट्र व देश के अन्य हिस्सों में भक्तिभाव से की जाती हैं । प्राचीन काल से भारतीय नारी स्वयं में एक उदाहरण और आदर्श रही हैं ,वह कभी सीता हुई ,कभी सावित्री ,कभी द्रौपदी,कभी मेत्रर्यी,कभी गार्गी ,कभी मीरा ,कभी भगिनी निवेदिता ,कभी शिवाजी को गढ़ने वाली जीजा बाई ,कभी अंग्रेजो से लड़ने वाली झाँसीवाली ,कभी महारानी अवंती बाई ,कभी सरोजनी नायडू ,कभी गांधीजी की अर्धांगिनी कस्तूरबा गाँधी,जिन्होंने गांधीजी को जीवन के हर कदम पर साथ दिया ,कभी सावित्री बाई फूले ,कल्पना चावला ,कभी गायिका एम्.एस .शुभलक्ष्मी ,यामिनी कृष्णमूर्ति,हीरा बाई बडोदेकर ,लता मंगेशकर ,इंदिरा गाँधी ,बेगम अख्तर ,अनीता देसाई, और कभी किरण बेदी । यह तो सिर्फ़ उदाहरण मात्र हैं ,इनके आलवा भी कितनी ही नारियों ने नारी जाती का गौरव बढाया हैं ,ईश्वर ने नारी को सदा ही अनंत गुणों का भंडार दिया हैं ,वह शारीरिक दृष्टि से भले ही कमजोर हो किंतु उसमे भरपूर आत्मिक और नैतिक बल हैं ,और इसी बल के सहारे वह आज तक स्वयं को साबित करती आई हैं । भारतीय नारी पूज्य ,हैं गौरव शालिनी हैं तो उसमे समाये भारतीय जीवन मूल्यों ,आदर्शो और गुणों के कारण,इन्ही के कारण वह औरो से अलग हैं ,श्रेष्ठ हैं ,पूज्य हैं । किंतु आजकल कुछ लड़कियों को देखती हूँ जो सिर्फ़ आधुनिकता के चलते अपने आत्मिक और नैतिक ,सात्विक गुणों को तिलांजलि दे देती हैं तो दुःख होता हैं ,दुःख होता हैं की यह विश्व की श्रद्धा धुरी माँ भारती की सुपुत्रीयां हैं । आजकल हर कोई समय से आगे भागना चाहता हैं ,समय से पहले जीतना चाहता हैं ,अपनी ही धुन पर जीवन की सुर पेटी को बजाना चाहता हैं ,भटकाव की आंधी भारतीय संस्कृति ,सभ्यता को स्वयं में छुपा रही हैं ,और इस आंधी में भटकती भारतीय संन्नारियां अपना वजूद खो रही हैं ।जीवन जीना एक कला हैं ,उसे एक उद्देश्य और अर्थ प्रदान करना कलाकारी। कोई भी कला धैर्य ,और समय मांगती हैं लगन मांगती हैं ,इसलिए उन महिलाओ से जो इस अंधी दौड़ में आँख बंद कर के भाग रही हैं ,या वे जिन्हें अपनी शक्तियों ,क्षमताओ का पूर्ण ज्ञान न होने से कठिन रास्तो पर लडखडा कर गिर रही हैं उनसे अनुरोध हैं ,की जाने की वे जिस देवी की पूजा कर रही हैं ,वो देवी किसी मन्दिर या मूर्ति में नही स्वयं उनकेआत्मा में निवास कर रही हैं ,तभी वे नारी के सही रूप को जान पाएँगी,और देवी की सही पूजा कर पाएँगी .आज भी उनके लिए प्रेरणा स्वरुप कितनी ही नारिया भारत को गर्वान्वित कर रही हैं ,और अपने जीवन को सही तरीके से जीकर सफल बना रही हैं । आख़िर स्त्रियों पर ही कल की नारियाँ और भविष्य की देवियाँ गढ़ने की जिम्मेदारी हैं मैं चाहती हूँ की आने पीढीयाँ ह्रदय से गाये "त्वं ही दुर्गा दश प्रहरण धारिणी ,कमला कमल दल विहारिनिम ,वाणीर विद्या दायिनी ,नमामि त्वं नमामि कमलां अमलां अतुलाम..........................."