Tuesday, 14 February 2012

वैलेंटाइन डे पर प्रेम नहीं बल्कि सेक्स ट्वायज का बाजार बन गया है !


नोट --निश्चय ही मेरा ब्लॉग मेरे स्वाभाव से बिपरीत है पर जो सत्य प्रतीत हो रहा है आज के समय में वही लिख रही हु !

फरवरी माह के प्रारंभ होते ही प्रेमी जोड़ियों की उत्सुकता और उनका उत्साह अत्याधिक बढ़ने लगता है. उनके इस बढ़ते उत्साह का सबसे प्रमुख और शायद एकमात्र कारण चौदह फरवरी यानि कि वैलेंटाइन डे होता है. पूर्ण रूप से लव-बर्ड्स को समर्पित इस दिन को रोमांटिक बनाने के लिए प्रेमी जोड़े काफी पहले से इससे संबंधित योजनाएं बनाना शुरू कर देते हैं. लेकिन आज जब व्यक्तिगत भावनाओं के क्षेत्र में बाजार भी अपनी महत्वपूर्ण और शायद जरूरी भूमिका निभाने लगा है तो वैलेंटाइन डे केवल आपसी मसला ना रहकर कमाई का एक बड़ा साधन बन गया है. जहां एक ओर यह बाजार आपको खुल कर अपनी भावनाएं व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है वहीं बाजार के माध्यम से आप अपने प्रेमी को आकर्षक तोहफे भी दे सकते हैं !.


लेकिन इस बार वैलेंटाइन डे पर बाजार की मंशा पहले के मुकाबले थोड़ी ज्यादा अलग है. क्योंकि इस बार बाजार ने प्रेमी जोड़ियों के बीच रोमांस या प्यार जैसे भावों को कोई महत्व नहीं दिया है. टेडी बियर, फूल, ग्रीटिंग कार्ड्स और अन्य भावपूर्ण तोहफों को दरकिनार कर बाजार अब कामुकता और भोग की भावना को प्रबल करने की फिराक में है क्या यह समाज के हित में है ?.


मेट्रो शहरों की बात करें तो यहां वैलेंटाइन डे के आयोजन के लिए रेस्त्रां और डिस्को मालिक, प्रेमी जोड़ियों से कहीं ज्यादा उत्सुक नजर आ रहे हैं. इस बार उन्होंने जोड़ियों के लिए कामसूत्र नाइट का आयोजन किया गया है, जिसके अंतर्गत 14 फरवरी वाले दिन प्रेमी जोड़ियों की प्राइवेसी के लिए के लिए वहां रोमांटिक अंदाज में टेंट लगाए जाएंगे. इतना ही नहीं जो लोग रात को ठहरना नहीं चाहते उन्हें जाते समय वोडका में डूबे हुए चॉकलेट फूल दिए जाएंगे. पब मालिकों का कहना है कि इस बार हम जोड़ियों को ज्यादा बोल्ड वेलकम देना चाहते हैं. कई पब और डिस्को के प्लान में 20,000 रुपए में गोवा की ट्रिप भी शामिल है.यह सभी बाते समाज को किस दिशा में ले जा रही है ?


भारत में सेक्स ट्वायज बेचने और लाने पर बैन है, लेकिन इस बार अवैध रूप से ही सही यह भी खरीददारों को कम मूल्य में उपलब्ध है. यही कारण है कि युवा अब एक-दूसरे को तोहफे के रूप में यह सब देना ज्यादा पसंद कर रहे हैं.क्या यही भारतीय संस्कार है ?


एक सेक्स ट्वायज विक्रेता की मानें तो इस बार उसने बहुत अच्छी खासी बिक्री की है. मतलब साफ है कि अब हमारे युवाओं का शारीरिक संबंधों के प्रति बढ़ते उत्साह और क्रेज को बाजार भी मनचाहे ढंग से कैश कर रहा है. वर्तमान परिदृश्य के अनुसार आज हमारी प्रेम रूपी भावनाओं पर सेक्स पूरी तरह हावी हो चुका है. यही कारण है कि विवाह से पहले और विवाह के पश्चात अन्य व्यक्तियों के साथ शारीरिक संबंध होना आज के समाज की पहचान ही बन गई हैजो की भारतीय समाज के हित में नहीं है यदि इसी प्रकार से पतन होता रहा हमारे देश के यूवाओ का तो निश्चय ही हम सभी इसके लिए गुनहगार है आपकी क्या राय है ??


Monday, 13 February 2012

भारत में एक लड़की के रूप में जन्म लेना गुनाह है क्या ?

अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो। इस जुमले को अब बदल देना चाहिए। अगले जन्म मोहे बिटिया तो कीजो लेकिन भारत में न पैदा कीजो । आखिर क्यों बिटिया का भारत में जन्म लेना अभिशाप है। पिछले साल उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की पत्नी सलमा अंसारी ने दिल्ली में कहा था कि भारत में लड़कियों को पैदा होते ही मार देना चाहिए। उनके इस बयान पर ख़ूब विवाद हुआ था। ज़ाहिर है सलमा अंसारी का आशय भारतीय समाज में लड़कियों से किए जाने वाले भेदभाव और महिलाओं के ख़िलाफ़ बढ़ते अपराधों पर अपना आक्रोश जताना था। ये कहते वक्त सलमा अंसारी के मन में जो कुछ भी रहा हो लेकिन संयुक्त राष्ट्र के ताज़ा आंकड़ों ने उनके बयान पर मुहर लगा दी है। इन आंकड़ों के मुताबिक बच्चियों के अस्तित्व को दुनिया में भारत से ज़्यादा ख़तरा किसी और देश में नहीं है।
ये दुर्योग ही है कि संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग (UN-DISA) ने बच्चियों की भारत में भयावह स्थिति को लेकर आंकड़े ज़ाहिर किए तो दिल्ली के एम्स में भर्ती दो साल की मासूम फ़लक की दर्दनाक कहानी सबके सामने है । संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के ज़िक्र से पहले फ़लक की बात कर ली जाए । फ़लक को जिस 15 साल की लड़की किशोरी (काल्पनिक नाम) ने एम्स में बुरी हालत में भर्ती कराया, उसकी आपबीती भी कम रौंगटे खड़े करने वाली नहीं है। किशोरी पर आरोप है कि उसने वहशी की तरह नन्ही सी जान फलक को पीटा, सिर पटक कर दे मारा, मुंह पर बुरी तरह से काटा । फ़लक की हालत देखकर किसी का भी कलेजा मुंह को आ सकता है। लेकिन सवाल ये भी है कि 15 साल की किशोरी के सिर पर दरिंदगी क्यों सवार हुई। क्या ये लड़की खुद उसके साथ जो अपने-परायों ने किया, उसका बदला मासूम से लेना चाहती थी । या वो नहीं चाहती थी कि जो उसके साथ हुआ  वो बड़ी होने पर फ़लक को भी झेलना पड़े। 
भारत में लड़कियों से किया जाने वाला भेदभाव और संसाधनों तक उनकी कम पहुंच ने भारत को लड़कियों के वजूद के लिए सबसे ख़तरनाक जगह बना दिया है। यहां बच्चियों को खाना देने में, बीमार पड़ने पर डाक्टर के पास ले जाने में, यहां तक कि जीवन रक्षक टीके लगवाने में भी लड़कों के मुकाबले दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है। एक तरफ़ समाज में लड़कियों के लिए विषम परिस्थितियां है तो बड़ी होने पर उनके खिलाफ बलात्कार, छेड़छाड़ जैसे अपराध देश में लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। ऐसे में बिटिया क्यों न कहें…अगले जन्म मोहे भारत में पैदा न कीजो…

Sunday, 12 February 2012

भारतीय समाज पर गंभीर प्रश्न ?


नई दिल्ली में महज दो वर्ष की एक बच्ची के साथ हुए अमानवीय बर्ताव और दरिंदगी की घटना को सुनकर पूरा देश चकित है। इसे लेकर मीडिया और बुद्धिजीवियों में एक तरह की बहस छिड़ी हुई है, लेकिन महिलाओं और लड़कियों के साथ ऐसी न जाने कितनी भेदभाव की घटनाएं आए दिन होती रहती हैं जिनका संज्ञान शायद ही किसी को होता है। फिर बात चाहे कन्या भ्रूण हत्या की हो, दहेज अपराधों की अथवा घरेलू हिंसा की। इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक कल्याण विभाग की यह रिपोर्ट कोई बहुत चौंकाने वाली नहीं है कि लड़कियों की असुरक्षा के मामले में भारत सबसे ऊपर है।
जनगणना आंकड़ों से भी पता चलता है कि भारत में महिला और पुरुष का अनुपात काफी असंतुलित है, जो प्रति 1000 पुरुषों पर महज 914 महिलाओं का है। आज यह एक आम धारणा बन गई है कि भ्रूण हत्या दहेज मांगों की वजह से होती है, क्योंकि परिवार दहेज की वजह से बेटियों को बोझ समझकर उन्हें पैदा ही नहीं होने देना चाहते। मैं इस विचार और तर्क से सहमत नहीं। दहेज बेटियों की अवमानना का कारण नहीं, बल्कि महज लक्षण है। दहेज केवल उन्हीं संप्रदायों में दिया जाता है, जिनमें बेटियों को संपत्ति अधिकार से वंचित किया गया है। यह कुचक्र अंग्रेजी शासन काल के दौरान चला, जिसके तहत भूमि बंदोबस्त अभियान व संपत्ति संबंधी कानूनों में बहुत से स्त्री विरोधी फेरबदल किए गए। इनमें सबसे अहम बदलाव मातृवंशी परिवारों को पितृवंशी संपत्ति वितरण प्रणाली की ओर धकेलना और परंपरागत सामूहिक पारिवारिक संपत्ति को निजी संपत्ति में बदल दिया जाना था। पारिवारिक सामूहिक संपत्ति की व्यवस्था आदिवासियों और जनजातियों में होती है, जिसमें हर एक को समान रूप से चाहे वह अजन्मा बच्चा ही क्यों न हो, को उत्तराधिकार का अधिकार था और इसे किसी भी तरह से चुनौती नहीं दी जा सकती थी, लेकिन बाद में जब पुरुष के हाथ में संपत्ति का अधिकार आ गया तो बेटियों का अधिकार लुप्त हो गया और इसके बदले में स्त्री धन अथवा दहेज की परंपरा शुरू हुई, जो क्षतिपूर्ति का एक रूप था। बेटियों को मिलने वाला दहेज कभी भी बेटों को मिलने वाली संपत्ति के बराबर नहीं रहा। इसके अतिरिक्त बेटों को अचल संपत्ति दी जाती है, जिसमें मकान, दुकान, व्यापार, जमीन आदि शामिल होता है, जबकि बेटियों को चल संपत्ति दी जाती है, जिनमें जीवन निर्वाह की चीजें, बर्तन, फर्नीचर, गहने आदि होते हैं। अब जब आर्थिक अधिकार से वंचित बहू ससुराल जाती है तो वह इसे पाना चाहती है, जिससे सास-ससुर और ससुराल वालों के साथ उसका टकराव लड़ाई-झगड़े में बदल जाता है। आज कानून तो बदल गया है, लेकिन मानसिकता नहीं बदली। बेटियों को अब भी पराया धन समझा जाता है और उसे माता-पिता के परिवार का अटूट अंग नहीं माना जाता, जिससे उसकी स्थिति कमजोर ही रहती है।
इसके अलावा किसी भी समाज में जब सामाजिक हिंसा और अपराध बढ़ जाता है तो इसका सबसे ज्यादा प्रभाव स्त्रियों पर होता है। भारत में भी पर्दा प्रथा, घूंघट, बुर्का आदि उन्हीं क्षेत्रों में पाया जाता है जो करीब एक हजार साल तक बाहरी हमलों से ग्रस्त रहे हैं। जो संप्रदाय महिलाओं की अस्मिता बचाने में अक्षम हुए उन्हीं संप्रदायों के पुरुषों ने स्त्रियों को घूंघट में या चहारदीवारी में कैद किया। इस तरह बाहरी समाज से कटी इन महिलाओं में बाहरी दुनिया को समझ पाने और उन्हें झेलने की क्षमता खत्म होती गई और वे परनिर्भरता के लिए मजबूर हो गई। आज भी सार्वजनिक जीवन में अपराधी हावी हैं और सरकार कानून एवं व्यवस्था के माध्यम से महिलाओं को सुरक्षा देने की बजाय अपराधियों को ही संरक्षण देती नजर आती है। ऐसे में माता-पिता के लिए बेटियों का समुचित पालन-पोषण कर पाना और उनकी रक्षा कर पाना मुश्किल होता है। इसलिए असुरक्षा बोझ से मुक्त होने के लिए बेटियों की कम उम्र में शादी कर दी जाती है। इस तरह बेटियों के साथ एक अनवरत शोषण का सिलसिला शुरू हो जाता है।
उत्तर भारत के गांवों में यह कथन आज भी कहा जाता है-जितने बेटे उतना लठ, जितना लठ उतना कब्जा। यानी संपत्ति की रक्षा के मामले में भी लड़कियों को कमतर आका जाता है, क्योंकि वे वह काम नहीं कर सकतीं जो पुरुष कर सकते हैं। निश्चित ही लड़ाई-झगड़े के काम में लड़कियां कमजोर होती हैं इसलिए वह परिवार के लिए उतनी महत्वपूर्ण नहीं रह जातीं। इस कारण भी उनके साथ भेदभाव होता है। यह बात शहर और गांव, शिक्षित और अशिक्षित सभी पर लागू होता है। इस तरह की धारणा बेटी को अपंग और एक तरह से कमजोर बना देती है। बेटी को जहां पराया धन समझा जाता है वहीं बेटों को आज भी बुढ़ापे का सहारा माना जाता है। मां-बाप समझते हैं परिवार बेटों के बिना फल-फूल नहीं सकता, लेकिन यह धारणा इस देश में बूढ़े मां-बाप के लिए घातक सिद्ध हो रही है। भारत को परिवार की तुलना उन समाजों से करनी चाहिए जहां बेटियां उत्तराधिकारी होती हैं, जैसा कि थाईलैंड और मणिपुर आदि में हैं। यहां बेटे और बहुओं की तुलना में बेटियां उत्तराधिकारी होती हैं, जो मां-बाप की ज्यादा अच्छी देखभाल करती हैं। जाहिर है बेटियों के प्रति भेदभाव के नजरिए से न केवल परिवार कलह का शिकार हो रहे हैं, बल्कि कन्या भ्रूण हत्या के कारण लिंगानुपात बिगड़ रहा है और प्रत्येक पुरुष को जीवनसाथी नहीं मिल पा रहा। इससे जहां दुष्कर्म आदि की घटनाएं बढ़ रही हैं वहीं स्त्रियों की खरीद-फरोख्त का बाजार फल-फूल रहा है। एम्स में जीवन-मौत से जूझ रही बच्ची के साथ हुआ दु‌र्व्यवहार इसी व्यवस्था और मानसिकता का परिणाम है, जिन्हें समूल नष्ट करने के लिए हमें समग्रता में विचार करने की आवश्यकता है।

Saturday, 4 February 2012

कपड़े छोटे या समाज की सोच छोटी !


कुछ दिन पहले मैं किसी काम से अवधेश प्रताप सिंह बिश्वबिध्यालय रीवा (मध्यप्रदेश) गई थी। वहां से काम निपटा कर लौट ही रही थी कि तभी कुछ लड़कों का ग्रुप मेरे पास से निकला जिनकी बातचीत का विषय लड़कियां थीं। बातचीत का विषय लड़कियों की सुन्दरता या उनका बॉयफ्रैंड नहीं था, बल्कि वे लड़कियों के कपड़ों पर फब्तियां कस रहे थे। लड़कियों को सर से पैर तक ढका देखकर कह रहे थे, '"उफ ये सर्दियां भी न! खूबसूरती देखने का मौका ही छीन लेती हैं।"

वैसे! लड़कियां कुछ भी पहनें किन्तु पुरूषों की नज़र उन्हीं पर रहती है। फिर वे कहते-फिरते हैं कि लड़कियों के कपड़े हमें उनकी ओर आकर्षित करते हैं। उदाहरण के तौर पर, अभी कुछ समय पहले एक ब्लॉगर ने ऐसी टिप्पणी देते हुए ब्लॉग भी लिखा था। अक्सर लोगों को यही कहते सुना है कि लड़कियों के छोटे कपड़े ही इस तरह की वारदातों का कारण होते हैं। अगर खबरों पर गौर किया जाए तो रेप केस में 5 साल की बच्ची से लेकर अधेड़ उम्र की महिला तक इस तरह की घटनाओं का शिकार बनी है। एक बुरके में रहने वाली औरत को भी रास्ते में कई बार पुरूषों द्वारा छेड़खानी का सामना करना पड़ता है। क्या उस समय भी वह महिला छोटे कपड़ों में होती है?

पश्चिमी सभ्यता को कोसते हुए हमेशा महिलाओं को ही गलत बताकर ऐसी घटनाओं को दबाने की कोशिश की जाती है। आज यदि भारत में पश्चिमी सभ्यता का साया है, तो केवल महिलाएं ही नहीं बल्कि पुरूष भी इसका अनुसरण कर रहे हैं। फिर केवल महिलाओं को ही क्यों दोषी माना जाता है? कुछ समय पहले आंध्र प्रदेश के डीजीपी दिनेश रेड्डी ने कहा था, �महिलाओं के फैशनेबल और पारदर्शी कपड़े पहनने से रेप की घटनाएं बढ़ती हैं।� यहां भी एक तरह से महिलाओं को गलत बताते हुए उन्होंने पुरूषों का ही समर्थन किया। आखिर क्यों पुरूषों की नैतिकता उस समय धराशाही हो जाती है, जब महिलाएं �भड़काऊ� (जैसा कि पुरुष कहते हैं) कपड़े पहनती हैं? जब एक छोटी-सी बच्ची तक को वे अपनी लालसा का शिकार बना लेते हैं तो उस नादान ने कौन से भड़काऊ कपड़े पहने होते हैं, जिसे देखकर वह बेकाबू हो जाते हैं।

भारत एक आजाद देश है। यहां हर व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार बोलने, खाने और पहनने का अधिकार है तो क्यों महिलाएं केवल पुरूषों की सोच के लिए अपना पहनावा बदलें! लड़की छोटे कपड़े पहने या बड़े, पुरूषों के सामने से गुजरते वक्त उसे किसी न किसी प्रकार की फब्ती को झेलना पड़ता ही है। पता नहीं लड़कियों के कपड़े ज़्यादा छोटे हैं या हमारे समाज की सोच...!