प्रत्येक माँ बाप अपने लड़के –
लड़कियों को पढाई के लिए किसी अच्छे संसथान में भेजना चाहते हैं जो
सामर्थ्य होते हैं वह भेजते हैं ! जहां लड़के और लडकियां किसी पिजी अथवा
होस्टल में रहते हैं ! अनजान शहर नये चहरे और नई उम्र ! बुलंद होसले , जोश
से भरे ऐसे युवक – युवतियां घर से काफी दूर रहते हैं ! ऐसे में नया माहोल ,
आधुनिकता , और अकेलेपन से घीरे युवक – युवतियां शहरी माहोल में ढलने लगते
हैं ! जिसके परिणाम सवरूप छोटे शहरो से आये युवक – युवतियां अपने दायरे से
निकल कर लड़के और लड़की की सीमाओं को पाटने ( तोड़ने ) लगते हैं ! जिसके
फलस्वरूप ऐसे संस्थानों में लड़के और लड़की का साथ रहना बोलना घूमना आदि को
फ्रंद्शिप नाम दिया जाता है यानी दोस्ती ! जहां युवक – युवतियों को अपने घर
की किसी ख़ुशी में शामिल करते हैं वाही युवतियां भी ! लेकिन एक कडवी
सच्चाई यह भी है की इस तरह की दोस्ती देसी भाषा में कहू तो सेटिंग होती है
अथवा प्यार ! यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य बात है की 90 % ऐसी दोस्ती
टाईमपास भी कहलाती है ! जिसमे लड़के और लडकियां शारीरिक सम्बन्ध स्थापित
कर लेते हैं ! प्यार – शादी तो बहुत कम लोग ५ , १० लोग ही करते हैं ! एसा
नही हो सकता की इन हालत से कोई भी माँ – बाप वाकिफ न हो ! एक वह भी जमाना
था जब लड़की का घर से दूर जाना भारतीय समाज में अच्छा नही माना जाता था
लेकिन आज जमाना कुछ और है जिसमे हर किसी को आगे निकलना है ! किसी को पडोसी
से तो किसी को रिश्तेदार से ! इसी वजह से माँ – बाप मोन हैं………… लेकिन इन
सबके बीच इस भाग्दोड़ी प्रतियोगिता में कुछ तो है जो हम खो रहे हैं !
अपने सिधांत , संस्कार , सभ्यता , बड़े छोटे का आदर – सम्मान ! लेकिन यह एक
मकडजाल है वह मकडजाल जिसे अंग्रेजो ने बुना और हमें उलझाया ! वयवस्था का
एसा मैकालेम्यी जाल जिसमे हम और आप सभी बस फसे हुए हैं ! ऐसी प्रतियोगिता
जिसमे हार भी हमारी है और केवल हार ही हमारी है ! चुकी इस वयवस्था में जहा
एक और भारतीयता खो रही है वही दूसरी और भारत का भविष्य सिगरेट , बियर और
सेक्स के नशे में चूर है !
बात चाहे आजादी की जंग लड़ रहे हिंदुस्तान की हो या आजाद भारत की, महिलाओं का योगदान भुलाया नहीं जा सकता। कुछ कर दिखाने का जज्बा उस समय भी उनके मन में था, जब वे घर की चारदीवारी में सजाकर रखे जाने वाले सामान की तरह थीं। तब भी उन्होंने चौखट से बाहर आकर अपनी शक्तिदुनिया को बताई। कोमल मन की दृढ़ता और असीमित क्षमताएं तब खुलकर सामने आईं, जब ये देश ही नहीं, बल्कि विदेश में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा आईं। यकीनन इन चेहरों का रसूख अब नहीं रहा, लेकिन प्रभाव आज भी कायम है।
Wednesday, 17 October 2012
इस्लाम का अपमान क्यों ?
समय समय पर इस्लाम के अपमान से जुडी घटनाये सामने आती रहती हैं कभी अमरीकी
पादरी टेरी जोन्स वर्ष 2010 में वर्ल्ड ट्रेड टावर पर हुए हमले की बरसी के
मौके पर क़ुरान की प्रतियाँ जलाने की घोषणा करते हैं तो कभी अफगानिस्तान
में अमरीकी सैनिक कुरान को जलाते हैं ! ताजा विवाद एक कथित ‘इस्लाम-विरोधी’
अमरीकी फिल्म के इंटरनेट पर आने के बाद है ! जिसके बाद लीबिया और अन्य
इस्लामिक देशो में हिंसा का तांडव हो रहा है ! कई देशो में आगजनी दंगे हो
रहे हैं ! यह सही है की किसी भी धर्म का अपमान गलत है और मुसलमानों को उसका
विरोध करने का पूर्ण हक़ है जिसका वह इस्तेमाल कर रहे हैं ! जैसे बाकि
धर्मो को सम्मान मिलना चाहिए वैसे ही इस्लाम को भी ! परन्तु बड़ा सवाल यह
है की इस्लाम का अपमान बार बार क्यों होता है ? क्यों बार बार सभी गैर
मुस्लिम ( काफिर ) मुसलमानों को अपने दुश्मन नजर आते हैं और खुद को अलग
पाते हैं और बाकी सारी दुनिया एक तरफ ! आज की स्थिति बहुत हद्द तक यही है
की इस्लाम को गाली देना मानो आतंक को गाली देना बन गया है जो इस्लाम का
अपमान करता है वह पूरी दुनिया में हीरो बन जाता है ! चाहे वह टेरी जोन्स
हो या अमेरिकी सैनिक या फिर सलमान रुश्दी ! लेकिन सवाल बार – बार रह – रह
कर उभरता है इस्लाम का अपमान या इस्लाम के खिलाफ एक आवाज भी उस आम आदमी
जिसे कल तक कोई जानता नही था हीरो बना देती है अथवा मसीहा तो क्या इसके
पीछे छुपी इस्लाम की कट्टरपंथी सोच है या वे आतंकी जिन्होंने इस्लाम के नाम
पर आतंक का खुनी खेल खेलकर भारत समेत सभी देशो की धरती पर मासूम लोगो का
रक्त पिया है ! अन्यथा मुसलमानों की वह कट्टरपंथी सोच जिसके तहत गैर
मुस्लिम उन्हें दुश्मन (काफिर ) नजर आता है ! विचार आम मुसलमान को करना है
की आखिर आज इस्लाम अपमानित क्यों है ? विचार यह भी यह भी करना होगा की आज
मयामार ,फ़्रांस , अमेरिका , चीन , जापान भारत में मुसलमानों को शक की नजर
से क्यों देखा जाता है क्या इसके लिए आम मुसलमानों की वह भीड़ दोषी है जो
बंगलादेशी घुस्पेठियो के लिए देश में जगह जगह दंगे पर उतारू हो जाती है
अथवा वह भीड़ जो एक देश में रहते हुए वहा के क़ानून से उपर अपने धर्म मजहब
को समझती है ? आम मुसलमान का विचार करना और समझना बेहद जरुरी है की आज वह
कहा खड़ा है क्या एसे चोराहे पर जिसमे गैर मुस्लिम एक तरफ और मुस्लिम बीच
चोराहे पर जिसके चारो और से गैर मुस्लिम उसे घेरे हुए है पर सबसे बड़ी
बात क्यों ?
दहेज़ और भारतीय महिलाए
आजकल
देश के हर राज्य में दहेज़ के मामले तेज़ी से बढ़ रहे है कुछ दहेज़
लोभियों ने सभी लड़के के पक्ष वालो को संदेह के घेरे में ला दिया है लड़की
वाले बहुत ही डर -डर कर अपनी लड़की का रिश्ता करते है .कई बार सुनने और
देखने में आता है की ससुराल पक्ष वालो ने बाइक या गैह्नो की खातिर बहु को
जला दिया या जहर दे दिया .कई बार बात मार -पिटाई ,गाली – गलोच तक सिमित
रहती है …..ताकि लड़की के माँ बाप लड़के वालो को धन या फिर जो उनकी डिमांड
होती है देने के लिए मजबूर हो जाए .दहेज़ लेना और देना अपराध है एसा हमें
सकूलो में पढाया गया है फिर भी कई लोग दहेज़ लेते है और महिलाओं को दहेज़
के लिए प्रताड़ित करते है .ऐसे में दहेज़ मांगने वाले ,या कहे तंग करने
वाले अपने ससुराल पक्ष के लोगो के खिलाफ कुछ महिलाए केस दर्ज कराती है
.जिसके तहत महिला जिन लोगो का नाम दर्ज कराती है उन्हें गिरफ्तार कर लिया
जाता है . किन्तु समाज में ऐसी महिलाओं की भी कमी नहीं है जो इस दहेज़
विरोधी क़ानून का दुरूपयोग पैसे ऐठने या ससुराल पक्ष में अपना दबदबा बनाने
के लिए करती है कभी कभी इस तरह के केस में देखने में आता है की कुछ महिलाए
बेकसूर ससुराल पक्ष के लोगो को भी जेल में ठुस्वा देती है जिन्होंने कभी
दहेज़ की डिमांड की ही नहीं होती इस कानून का प्रयोग कर कई निर्दोष लोग भी
चपेट में आ जाते है .कुछ महिलाए पैसे ऐठने के लिए और कुछ महिलाए ससुराल
पक्ष के लोगो को बेवजह दबाने के लिए भी एसा कदम उठती है .जिसकी वजह से
निर्दोष लोगो पर भी चार -चार साल केस चलता रहता है और लड़के वालो को आर्थिक
और सामाजिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है .चार -पांच सालो तक कोर्ट
में केस चलने की वजह से लड़के का और कही रिश्ता भी नही किया जा सकता .इस
कारण लड़के की उम्र भी काफी हो जाती है और उसे लगातार समाज में परेशानियों
का सामना करना पड़ता है .सवाल उठता है हमारे भारत में आजकल महिला उत्पीडन
के नाम पर महिलाओं के लिए जिस तरह के कानून बनाये जा रहे है क्या इस तरह के
क़ानून भारत में नारी की छवि को बिगाड नहीं रहे है ?क्या इस तरह के क़ानून
का दुरूपयोग करने से पुरूष और ओरत में खाई चोडी हो रही है ?क्या इस तरह के
क़ानून बनाने से भारतीय समाज का परिवारक ढांचा बर्बाद नही हो रहा है ?
क्या इस तरह के कानून की आड़ में किसी निर्दोष परिवार को फ़साना जायज है
?सवाल उठता है की क्या – हर- बार लड़के वाले ही दोषी होते है और जो शब्द ,
जो ब्यान कोई महिला — पुलिस -थाने में दर्ज करवा दे वही “पत्थर की ‘लकीर की
तरह सच है ?बेशक से वह महिला या फिर उसके घरवाले इस तरह के क़ानून का
उपयोग लड़के वालो को परेशान करना पैसो के लिए कई सालो से करते आ रहे हो .
क्या सिर्फ इसलिए नारी की हर बात को सच मान लिया जाए की वह एक महिला है और
उसे भारत में कई तरह के अधिकार मिले है . जो निर्दोष परिवार सालो तक जेल
में रहते है उनमे महिलाए भी होती है क्या उनके कुछ अधिकार नहीं है ?क्या
पुरूष समाज में भावनाए नहीं होती जो उन्हें ही आँख मीचकर गलत मान लिया जाता
है ?
क्या ऐसी महिलाओं या उनके खिलाफ कोई सख्त दंड का प्रावधान हमारे
समाज या फिर क़ानून में नहीं होना चाहिए जो निर्दोष लोगो को बेवजह तंग करती
है ?
क्या इस तरह के कानून की आड़ में किसी निर्दोष परिवार को फ़साना जायज है ?सवाल उठता है की क्या – हर- बार लड़के वाले ही दोषी होते है और जो शब्द , जो ब्यान कोई महिला — पुलिस -थाने में दर्ज करवा दे वही “पत्थर की ‘लकीर की तरह सच है ?बेशक से वह महिला या फिर उसके घरवाले इस तरह के क़ानून का उपयोग लड़के वालो को परेशान करना पैसो के लिए कई सालो से करते आ रहे हो . क्या सिर्फ इसलिए नारी की हर बात को सच मान लिया जाए की वह एक महिला है और उसे भारत में कई तरह के अधिकार मिले है . जो निर्दोष परिवार सालो तक जेल में रहते है उनमे महिलाए भी होती है क्या उनके कुछ अधिकार नहीं है ?क्या पुरूष समाज में भावनाए नहीं होती जो उन्हें ही आँख मीचकर गलत मान लिया जाता है ?
क्या ऐसी महिलाओं या उनके खिलाफ कोई सख्त दंड का प्रावधान हमारे समाज या फिर क़ानून में नहीं होना चाहिए जो निर्दोष लोगो को बेवजह तंग करती है ?
Thursday, 4 October 2012
बहुपत्नी प्रथा और इस्लामिक समाज
बहुपत्नी
प्रथा इस्लामिक समाज में पाई जाने वाली एक ऐसी कुप्रथा है जिसे मुसलमान
अपना जनमसिद्ध अधिकार समझते है. भारत समेत दुनिया कि बहुत सी सरकारे जो
सेक्युलर होने का दम भरती है, इस मुद्दे पर इस्लामिक कट्टरपंथियो के आगे
हथियार डाल चुकी है. भारत में तो हालात इस हद तक खराब है कि समान आचार
सहिता कि बात करने वालो को ही संप्रदयवादी कह कर दुत्कार दिया जाता है. गैर मुस्लिम के लिए ये जानना बड़ा दिलचस्प है कि मुस्लिम समाज के
बुद्धिजीवी इस जाहिल और महिला विरोधी रिवाज़ के पक्ष में क्या दलीले देते
है? ज़ाकिर नाईक जैसे अनेक मुस्लिम विचारक तर्क देते है कि दुनिया के सभी
धर्मो में बहुपत्नी प्रथा पाई जाती है. राजा दशरथ कि 3, ओर श्री कृष्णा की
16108 पत्निया थी. यहूदी, पारसी ओर ईसाई धरम में भी एक शादी जैसी कोई
पाबंदी नही है.केवल क़ुरान में ही शादियो की अधिकतम सीमा तय की गयी है.
यानी ये साफ है कि बाकी धर्मो के लोगो ने अपने प्राचीन रिवाज़ो को नये समय
के साथ बदला है. सिर्फ़ मुसलमान ही ऐसा नही कर पाए वे आज भी सड़ी गली प्रथा
से चिपके हुए हैं.
...
इनका दूसरा तर्क है कि दुनिया में औरतो की तादात मर्दो से ज़्यादा है.
इससे बदतर कोई तर्क नही हो सकता. युरोप के कुछ देशो में महिलाओ की तादात
भले ही अधिक है लेकिन वह चार गुना जीतने स्तर पर नही है. दुनिया में सेक्स
रेशियो 100:101 है. सबसे अजीब बात तो ये है कि जिन देशो में महिलाओ कि
तादात कुछ अधिक है वहाँ तो बहुपत्नी प्रथा गैर क़ानूनी है, जबकि ज़्यादातर
इस्लामिक देशो में, महिलाओं की तादात पुरुषो से कम है. साओदी अरब में तो
100 पुरुषो के अनुपात में सिर्फ़ 85 महिलाए ही है.
यही हाल ज़्यादातर मुस्लिम देशो का है. इस्लामिक विद्वान अमेरिका रशिया आदि
का तो सेक्स रेशियो बताते है पर बड़ी मक्कारी से मुस्लिम देशो का सेक्स
रेशियो छिपा लेते है. भारत में पुरुषो की तादाद कम होने का कारण कन्या
भ्रूण हत्या हो सकता है, पर मुस्लिम देशों में महिलाओ कि संख्या इतनी कम
क्यो है? कुल मिला कर ये तर्क बिल्कुल बकवास है कि दुनिया में महिलाओ कि
संख्या इतनी अधिक है कि पुरुष 4 शादी की छूट ज़रूरी है.
कारण केवल एक है कि जहां बाकी समाज पुरानी ज़ंज़ीरो को तोड़ कर नयी
जीवनशैली को अपना चुके हैं , वहीं मुसलमान अब भी रूढ़िवादी सोच के गुलाम
है.
बहुपत्नी
प्रथा इस्लामिक समाज में पाई जाने वाली एक ऐसी कुप्रथा है जिसे मुसलमान
अपना जनमसिद्ध अधिकार समझते है. भारत समेत दुनिया कि बहुत सी सरकारे जो
सेक्युलर होने का दम भरती है, इस मुद्दे पर इस्लामिक कट्टरपंथियो के आगे
हथियार डाल चुकी है. भारत में तो हालात इस हद तक खराब है कि समान आचार
सहिता कि बात करने वालो को ही संप्रदयवादी कह कर दुत्कार दिया जाता है. गैर मुस्लिम के लिए ये जानना बड़ा दिलचस्प है कि मुस्लिम समाज के
बुद्धिजीवी इस जाहिल और महिला विरोधी रिवाज़ के पक्ष में क्या दलीले देते
है? ज़ाकिर नाईक जैसे अनेक मुस्लिम विचारक तर्क देते है कि दुनिया के सभी
धर्मो में बहुपत्नी प्रथा पाई जाती है. राजा दशरथ कि 3, ओर श्री कृष्णा की
16108 पत्निया थी. यहूदी, पारसी ओर ईसाई धरम में भी एक शादी जैसी कोई
पाबंदी नही है.केवल क़ुरान में ही शादियो की अधिकतम सीमा तय की गयी है.
यानी ये साफ है कि बाकी धर्मो के लोगो ने अपने प्राचीन रिवाज़ो को नये समय
के साथ बदला है. सिर्फ़ मुसलमान ही ऐसा नही कर पाए वे आज भी सड़ी गली प्रथा
से चिपके हुए हैं.
...
...
इनका दूसरा तर्क है कि दुनिया में औरतो की तादात मर्दो से ज़्यादा है.
इससे बदतर कोई तर्क नही हो सकता. युरोप के कुछ देशो में महिलाओ की तादात
भले ही अधिक है लेकिन वह चार गुना जीतने स्तर पर नही है. दुनिया में सेक्स
रेशियो 100:101 है. सबसे अजीब बात तो ये है कि जिन देशो में महिलाओ कि
तादात कुछ अधिक है वहाँ तो बहुपत्नी प्रथा गैर क़ानूनी है, जबकि ज़्यादातर
इस्लामिक देशो में, महिलाओं की तादात पुरुषो से कम है. साओदी अरब में तो
100 पुरुषो के अनुपात में सिर्फ़ 85 महिलाए ही है.
यही हाल ज़्यादातर मुस्लिम देशो का है. इस्लामिक विद्वान अमेरिका रशिया आदि का तो सेक्स रेशियो बताते है पर बड़ी मक्कारी से मुस्लिम देशो का सेक्स रेशियो छिपा लेते है. भारत में पुरुषो की तादाद कम होने का कारण कन्या भ्रूण हत्या हो सकता है, पर मुस्लिम देशों में महिलाओ कि संख्या इतनी कम क्यो है? कुल मिला कर ये तर्क बिल्कुल बकवास है कि दुनिया में महिलाओ कि संख्या इतनी अधिक है कि पुरुष 4 शादी की छूट ज़रूरी है.
कारण केवल एक है कि जहां बाकी समाज पुरानी ज़ंज़ीरो को तोड़ कर नयी जीवनशैली को अपना चुके हैं , वहीं मुसलमान अब भी रूढ़िवादी सोच के गुलाम है.
यही हाल ज़्यादातर मुस्लिम देशो का है. इस्लामिक विद्वान अमेरिका रशिया आदि का तो सेक्स रेशियो बताते है पर बड़ी मक्कारी से मुस्लिम देशो का सेक्स रेशियो छिपा लेते है. भारत में पुरुषो की तादाद कम होने का कारण कन्या भ्रूण हत्या हो सकता है, पर मुस्लिम देशों में महिलाओ कि संख्या इतनी कम क्यो है? कुल मिला कर ये तर्क बिल्कुल बकवास है कि दुनिया में महिलाओ कि संख्या इतनी अधिक है कि पुरुष 4 शादी की छूट ज़रूरी है.
कारण केवल एक है कि जहां बाकी समाज पुरानी ज़ंज़ीरो को तोड़ कर नयी जीवनशैली को अपना चुके हैं , वहीं मुसलमान अब भी रूढ़िवादी सोच के गुलाम है.
मैडम भीकाजी कामा
मैडम
भीकाजी कामा पहली भारतीय थीं, जिन्होंने 22 अगस्त 1907 को जर्मनी में
इंटरनेशनल सोशलिस्ट कॉन्फ्रेंस के दौरान हजारों विदेशी प्रतिनिधियों के
सामने भारतीय राष्ट्र ध्वज फहराया था। तब उस भारतीय युवती का ओजस्वी
व्यक्तित्व देखकर वहां उपस्थित विभिन्न देशों के प्रतिनिधि चकित रह गए। कुछ
लोग उन्हें भारत की महारानी या राजकुमारी समझ रहे थे। राष्ट्रध्वज फहराने
के बाद उन्होंने वहां उपस्थित जनसमुदाय को संबोधित ...
करते
हुए कहा था, भारत की आजादी का यह झंडा उन अनगिनत भारतीय युवाओं के पवित्र
खून से रंगा है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने जीवन का बलिदान दे
दिया। मैं यहां उपस्थित सभी लोगों से आग्रह करती हूं कि आप भारतीय
स्वतंत्रता के इस ध्वज को सलाम करें। मैं विश्व के सभी स्वतंत्रताप्रेमियों
से आग्रह करती हूं कि वे स्वाधीनता की इस लडाई में हमें सहयोग दें। यह
सोचने वाली बात है कि देश की आजादी के 40 वर्ष पहले अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक
मंच पर भारत की उपस्थिति दर्ज कराने वाली, उस अकेली भारतीय स्त्री की
शख्सीयत कितनी दमदार रही होगी।
1914 में प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जब फ्रांस और ब्रिटेन के बीच संधि हुई तो पेरिस इंडियन सोसायटी के लगभग सभी सदस्यों ने पेरिस छोड दिया, लेकिन भीकाजी ने विपरीत स्थितियों में भी वहीं रह कर देश की आजादी के लिए संघर्ष करना मंजूर किया। जब पंजाब रेजिमेंट की टुकडी ब्रिटेन और उसके मित्र देशों की तरफ से लडाई करने के लिए फ्रांस की धरती पर पहुंची तो भीकाजी ने उसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और उसी दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 1935 तक वह यूरोप में नजरबंद रहीं। इसी बीच वहीं उन्हें पक्षाघात का दौरा पडा और उनके वकील सर कावासाजी जहांगीर के काफी प्रयासों के बाद उन्हें घर वापस जाने की अनुमति मिल गई और वह मुंबई लौट आई। अपने देश की आजादी के लिए अंतिम सांस तक लडने वाली इस महान शख्सीयत का 13 अगस्त 1936 को, 74 वर्ष की आयु में मुंबई के पारसी जनरल हॉस्पिटल में स्वर्गवास हो गया।
दोस्तों ये हैं हमारे "हिंदुस्तान" की "जांबाज नारियां"
इन्हें दिल से सलाम ....
जय हिंद ... वन्देमातरम .....
1914 में प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जब फ्रांस और ब्रिटेन के बीच संधि हुई तो पेरिस इंडियन सोसायटी के लगभग सभी सदस्यों ने पेरिस छोड दिया, लेकिन भीकाजी ने विपरीत स्थितियों में भी वहीं रह कर देश की आजादी के लिए संघर्ष करना मंजूर किया। जब पंजाब रेजिमेंट की टुकडी ब्रिटेन और उसके मित्र देशों की तरफ से लडाई करने के लिए फ्रांस की धरती पर पहुंची तो भीकाजी ने उसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और उसी दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 1935 तक वह यूरोप में नजरबंद रहीं। इसी बीच वहीं उन्हें पक्षाघात का दौरा पडा और उनके वकील सर कावासाजी जहांगीर के काफी प्रयासों के बाद उन्हें घर वापस जाने की अनुमति मिल गई और वह मुंबई लौट आई। अपने देश की आजादी के लिए अंतिम सांस तक लडने वाली इस महान शख्सीयत का 13 अगस्त 1936 को, 74 वर्ष की आयु में मुंबई के पारसी जनरल हॉस्पिटल में स्वर्गवास हो गया।
दोस्तों ये हैं हमारे "हिंदुस्तान" की "जांबाज नारियां"
इन्हें दिल से सलाम ....
जय हिंद ... वन्देमातरम .....
महिला सशक्तीकरण के लिए जरूरी है-वित्तीय साक्षरता
तमाम विरोधभास के बावजूद हमारे देश में एक
ओर तो यह सच है कि महिलायें परिवार की धुरी होती हैं तथा भले ही कमाई
पुरूष वर्ग करता है। लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि अगर महिलायें नौकरी
पेशा और कमाऊ हैं तब भी उनकी आय का सारा हिसाब पुरूष ही रखते है। महिलायें
अपनी सारी कमाई अपने पति के हाथों में सौंप देती है, एटीएम के युग में
पत्नियों के एटीएम कार्ड का पासवर्ड भी सिर्फ पति महोदय को ज्ञात रहता है।
कुल मिलाकर यह भी सच है कि हमारे देश में महिलायें अपनी कमाई का भी मनमाफिक
उपयोग नहीं कर सकती है। उनकी भुमिका पारिवारिक व्यय के लिए सिर्फ सूचना
प्रदाता तक ही सीमित है और आर्थिक मामलों पर निर्णय की बात सिर्फ उनकी सलाह
तक ही सीमित है। इस संदर्भ में पुरूष वर्ग यह तर्क देता है कि महिलाओं
में न तो वित्तीय मामलों की समझ होती हैं और न ही वो इसकी अधिकारी है। इस
तरह महिला सशक्तीकरण के तमाम दावों के बीच अब भी आर्थिक मुद्दों पर पूर्ण
रूप से पुरूष वर्ग का ही वर्चस्व है। ऐसें में अगर महिलायें परिवार के
खर्चों का हिसाब रखने की भूमिका से संतुष्ट हैं तो यह उनके सशक्तीकरण के
मुद्दे को भी कमजोर करता है तथा परिवार और समाज के लिए भी नुकसानदायक है।
क्योंकि आज परिवारिक मामलों में महिलाओं की भूमिका बढ़ने से यह जरूरी है कि
वो पारिवारिक आर्थिक मामलों की भी समझ विकसित करें। मसलन वो आय व्यय में
संतुलन के लिए पारिवारिक बजट बनाने के साथ साथ बचत और निवेश की जरूरतों को
भी समझें। एक अच्छा बजट परिवार को आने वाले आर्थिक संकट से सुरक्षित रखता
है।
महिलायें पारिवारिक जरूरतों पर
मुद्रास्फीति और मंहगाई के प्रभाव को भी समझे, महिलायें पारिवारिक खर्च पर
काफी हद तक नियंत्रण कर सकती हैं जैसे बिजली, फोन अनाज और उपयोगिता से जुड़े
तथ्यों का अध्ययन कर इन पर होने वाले अपव्यय को रोक सकती है। महिलाओं के
लिए जरूरी है कि उन्हें पारिवारिक और पति की संपति संबंधी अधिकार के संबंध
में कानूनी प्रावधानों की जानकारी हो। नामिनी और संरक्षक सम्पति संबंधी
अधिकार का ज्ञान होना चाहिए। महिलाओं को बैंकिंग और बचत के तमाम साधनों की
जानकारी भी होना चाहिए जो कि उन्हें नहीं रहती है। यह जरूरी है कि महिलाओं
को पति की आय और व्यय का पूरा पूरा ज्ञान हो साथ साथ यह भी जरूरी हैं कि
पति के द्वारा किए गए निवेश, बैंक खातों, जमा और उधारी का भी ज्ञान होना
चाहिए। क्योंकि किसी अनहोनी वश पति के साथ कोई हादसा हो जाए तो महिला को
आर्थिक मामलों संबंधी किसी प्रकार की कानूनी समस्या से परेशानी न हो। पति
द्वारा परित्याग और तलाक के मामलों में भी महिलाओं को आर्थिक मामलों में
काफी परेशानी और अपमान झेलना पड़ता है अगर महिलाओं को इनसे संबंधित कानूनी
प्रावधानों का ज्ञान हो तो इस प्रकार की समस्याओं से बचा सकता है।
वृद्वावस्था महिलाओं को काफी कष्टप्रद होती है क्योंकि उनके उपर होने वाले
व्यय से उनके बच्चे भी कन्नी काटते हैं इसके लिए जरूरी है कि उन्हे बीमा और
पेंशंन योजनाओं का ज्ञान कराया जाए।
आज जिस तरह महिलाओं की भूमिका समाज और
व्यवसाय के क्षेत्रों में बढ़ी है उस हिसाब से वो बच्चों के जन्म तथा उनकी
शिक्षा दीक्षा के लिए आर्थिक सुदृढ़ता पर विचार करने लगी हैं यह महिला
सशक्तीकरण की राह में शुभ संदेश है। लेकिन महिला सशक्ती करण की यह बात
महिलाओं को वित्तीय साक्षर करने से ही पूरी होगी। तथा पारिवार की आर्थिक
सुरक्षा के लिए भी महिलाओं को वित्तीय साक्षर करने की जरूरत है क्योंकि वो
होम मेकर यानि घर चलाने वाली है। क्योंकि यह बात सच है कि चाहे ग्रामीण
निरक्षर महिला हो या फिर आधुनिक सीईओ महिला। सबको कही न कहीं वित्तीय
साक्षरता की जरूरत हैं क्योंकि कामकाजी महिलाओं को बजट और बचत का उर्पयुक्त
ज्ञान ही नहीं हैं। तथा ग्रामीण महिलायें वित्त के मामलों में लगभग पराधीन
होती हैं और उनकी न तो कोई राय होती है लेकिन वो पारिवारिक बचत तथा
आयवृद्वि में अहम रोल अदा कर सकती है इसके लिए उन्हें स्व सहायता समूहों से
जोड़कर स्वावलम्बन के कार्यक्रम से जोड़कर और बैंकिग की जानकारी, पोस्ट
आफिस बचत तथा पारिवारिक सम्पति संबंधी अधिकारो से सशक्त किया जा सकता हैं।
इसके लिए ग्रामीण महिलाओं के लिए पंचायत या स्वसहायता समूह की बैठकों के
दौरान वित्तीय साक्षरता का ज्ञान दिया जा सकता है।
हमारे देश में इस संदर्भ में भारतीय
प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड(सेबी) ने अपने वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम के
जरिए ग्रामीण महिलाओं में वित्तीय साक्षरता का संदेश पहुंचाया है इसके लिए
सेबी ने स्वसहायता समूह से जुड़ें महिला समूहों को साथ लिया हैं,तथा समाज के
विभिन्न समूहों से जूड़ी महिलाओं के लिए फायनेंसियल लिटरेसी फार होम मेकर्स
के नाम से कार्यक्रम प्रारम्भ किया है। उड़ीसा में मिशन शक्ति के नाम से
महिलाओं को वित्तीय रूप साक्षर करने का कार्यक्रम प्रारंभ किया गया है।
वैश्विक स्तर पर भी वित्तीय साक्षरता के जरिये महिला सशक्तीकरण के
कार्यक्रम चलाए जा रहें है। अमेरिका और कनाडा के साथ साथ केन्या और घाना
जैसे देशों में महिलाओं को पारिवारिक बजट के साथ बचत के तरीकों, बैंकिग
सुविधाओं के उपयोग की जानकारी तथा पेंशन संबंधी योजनाओं से अवगत कराया जाता
हैं। विकसित देशों के साथ घाना जैसे देश ने नेटवर्क आफ यंग वूमेन के नाम
से युवा लड़कियों के बीच वित्तीय साक्षरता के कार्यक्रम चलाए है।
वास्तव में महिलाओं को सशक्त करने के लिए
जरूरी हैं कि उन्हें स्कूल और कालेज स्तर पर वित्तीय साक्षरता के कार्यक्रम
से जोड़ा जाए। ग्रामीण क्षेत्र में महिलाओं के बीच कार्य करने वाले संगठनों
और स्वयं सेवी संगठनों को इस कार्य से जोड़ा जाए। शहरी क्षेत्र में भी
कामकाजी महिलाओं के बीच वित्तीय जागरूकता से जूड़े कार्यक्रमों को अनिवार्य
किया जाए। (हम समवेत)
बेटी नहीं तो बहु कहा से लाओगे ?
यह ब्लॉग सभी
आयु के लोगो के लिए हैं. जो दूसरी शादी के बारे में सोच रहे होंगे की वे
इसे जरुर से जरुर पढ़े. भारत में अब साल दर साल लड़कियों की संख्या कमती
जा रही हैं.इसका कारण भ्रूण हत्या बताया जा रहा हैं. भ्रूण हत्या मतलब
बच्चे के जन्म के पहले हत्या. वह भ्रूण जो अपनी माँ के गर्भ में पलकर नई
दुनिया में आने का इंतज़ार कर रहा होता हैं. उसे हमारे यहाँ के अशिक्षित और
अर्धशिक्षित लोग मार देते हैं. क्या हमारे यहाँ लड़की का जन्म लेना पाप
हैं.? क्या जो काम लड़के किया करते हैं .उसे लड़की नहीं कर सकती हैं? आज
लडकिया हर काम कर रही हैं. वह आज पुरषों को कड़ी टक्कर दे रही हैं. आज
लडकिया हर क्षेत्र में टॉप कर रही हैं. .उनमे लड़कियों ने लडको को पीछे
छोड़ दिया हैं.मानव समाज की रचना तभी संभव हैं ,जब महिला और पुरुष हो
.सिर्फ पुरुषो से ही इस विशव की कल्पना नहीं की जा सकती हैं. और इसे कन्या
भ्रूण हत्या करने वाले भी भली भांति जानते हैं .हमारे धार्मिक ग्रंथो में
महिला को देवी की संज्ञा दी गयी हैं .दरअसल हमारे समाज में पित्रसत्ता रही
हैं जिसमे लडको को ही सारे अधिकार दिए गए हैं. लडकियों के लिए शर्त ही
शर्त हैं. मसलन वह दाह संस्कार स्थल पर नहीं जा सकती हैं ,वह मृत व्यक्ति
को आग नहीं दे सकती हैं .वगैरह -वगैरह.
कन्या भ्रूण हत्या के कारण जनसँख्या असंतुलन की स्थिति पैदा हो गई हैं. नई जनगणना के आंकड़े पर यदि गौर करे तो सबसे ख़राब स्थिति पंजाब ,चड़ीगढ़ (केंद्र-शासित ),राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली ,हरियाणा की हैं .जहा लडकियों की संख्या तेजी से घटती जा रही हैं .जबकि ये सभी राज्य आर्थिक दृष्टि से संपन्न हैं. कुछ समय पहले हरियाणा विधानसभा के चुनाव में युवाओ की टोली ने यह शर्त रखा था की जो दल हमारी शादी करवाएगा उसी को हम वोट देंगे . (समाचार चैनल पर देखा ) .वही केरल एकलौता राज्य हैं जहा लडकियों की संख्या लडको से कही अधिक हैं .लडकियों की घटती संख्या चिंता का विषय बनी हुई हैं. कन्या भ्रूण हत्या करने वाले भी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं की लड़की ही बच्चो को जन्म देती हैं.वह जानबूझकर यह अक्षम्य अपराध करते हैं अगर धर्मो पर नजर डाला जाये तो सिखो में यह स्थिति काफी ख़राब हैं .जबकि सिख समृद्ध होते हैं.
भारत में एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजर -बसर करती हैं. हमारे समाज में दहेज़ दानव प्रथा भी इसके लिए उत्तरदायी हैं .गरीब यह सोचता हैं की अगर लड़की हुई तो उसकी शादी -विवाह में दहेज़ देने पड़ेंगे .यदि लड़का हुआ तो पढ़ -लिखकर अपने और अपने परिवार का नाम रौशन करेगा . वह सोचता हैं की लड़की को तो पढ़ा -लिखाकर पराया घर ही तो भेजना हैं तब हम उसे क्यूँ पढाये . आपने बहुत जगहों पर देखा होगा की माता -पिता लडको को अच्छे विधालयो में पढ़ाते हैं जबकि लड़की को घर का काम-काज सिखाते हैं .यदि पढ़ाते भी हैं तो सामान्य विधालयो में .वे यह नहीं समझ पाते की लडकियों को शिक्षा देने के क्या दूरगामी परिणाम होंगे . वैसे यह कहा जा सकता हैं की महिला ही महिला की दुश्मन होती हैं .महिला की सहमती से ही कन्या भ्रूण हत्या जैसा घृणित अपराध को अंजाम दिया जाता हैं. महिला भी बेटो को ही पसंद करती हैं .बेटियों को नहीं .यहाँ मैं एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की सभी महिलाये ऐसा नहीं करती हैं .कन्या भ्रूण हत्या महिलाये मजबूरी में भी करती हैं क्यूँ की उन्हें अपने ससुराल वालो के द्वारा प्रताड़ित किया जाता हैं .उनपर तरह -तरह के लांछन लगाये जाते हैं .लेकिन भ्रूण को मारने में उनकी मौन सहमती तो रहती ही हैं .
अगर इसी तरह लडकियों की संख्या घटती रही तो गंभीर संकट उत्पन्न हो जायेगा . मानव समाज के अस्तित्व पर ही संकट मंडराने लगेगा . भाइयो की कलाई पर रक्षा कवच कौन बाधेंगा ?बेटो के लिए बहुए कहा से आएगी ?अगली पीढ़ी के लिए माँ का कोख कौन उपलब्ध कराएगा ?यदि अगली पीढ़ी को इस दुनिया में जन्म लेने हैं और उनके जीवन को आगे बढ़ाना हैं तो आज की बेटी को जीने का अधिकार देना होगा और कन्या भ्रूण हत्या को रोकना होगा. मेरे विचार से कन्या भ्रूण हत्या करने वाले राजद्रोही हैं .क्यूँ की वे इस तरह के जघन्य अपराध कर राष्ट्र के विकास को अवरूद्ध कर रहे हैं.डाक्टर को हमारे समाज में भगवन कहा जाता हैं लेकिन वे भी इसमे सहयोगी बन रहे हैं .(सभी डाक्टर नहीं जो यह अपराध करते हैं वे ) सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह हैं की हम शिक्षा के क्षेत्र में नित्य नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं और लडकियों की संख्या और उन्हें सुरक्षा देने में पीछे जा रहे हैं .आप यदि नई जनगणना के रिपोर्ट को देखे तो गावो के तुलना में शहरों में कन्या भ्रूण हत्या की दर अधिक हैं .
सरकार ने इस समस्या को रोकने के लिए भ्रूण का लिंग परीक्षण करना अपराध घोषित किया हैं.प्रसव पूर्व भूर्ण परीक्षण के दुरूपयोग को रोकने के लिए सन 1994 में “प्रसव पूर्व नैदानिक तकनीक नियमन” और दुरूपयोग निवारण अधिनियम 1994 को 1 जनवरी 1996 को लागू किया .इस कानून के अनुसार इस प्रकार का अपराध करने वाले लोगो को 5 वर्ष की सजा और 50 ,000 रूपये की सजा का प्रावधान किया गया हैं .यह राशि आरसीएच -2 कार्यक्रम के अंतर्गत सम्बंधित जिले के मुख्या चिकित्सा एवम स्वास्थ्य अधिकारी के माध्यम से दी जाएगी .भारतीय दंड संहिता की धारा -312 से लेकर 315 तक में भ्रूण हत्या रोकने सम्बन्धी विभिन्न प्रावधान किये गए हैं. धारा 315 शिशु को जीवित पैदा होने से रोकने या जन्म के पश्चात् उसकी हत्या करने के आशय से किये गए गए कार्य के सम्बन्ध में सम्बंधित व्यक्ति को 10 वर्ष तक का कारावास या जुर्माना या दोनों से दण्डित करने का प्रावधान हैं.कन्या भ्रूण हत्या तो मानव के अधिकार कानून का उल्लंघन हैं साथ -साथ संविधान का अपमान भी हैं .ऐसे लोगो लो छोड़ा नहीं जाना चाहिए .
इसे रोकने के लिए महिलाओ को आगे आना होगा और सरकार को कानून को कठोरता के साथ लागू करना होगा. पर्याप्त प्रचार -प्रसार करना होगा .लडकियों की शिक्षा पर व्यापक ध्यान देने होंगे ताकि वे आत्मनिर्भर बन सके और यदि उनके ससुराल वाले कन्या भ्रूण हत्या करने को कहे तो वे उसका विरोध कर सके .अंत में एक लड़की के शिक्षित होने से पूरा समाज शिक्षित होता हैं .
कन्या भ्रूण हत्या के कारण जनसँख्या असंतुलन की स्थिति पैदा हो गई हैं. नई जनगणना के आंकड़े पर यदि गौर करे तो सबसे ख़राब स्थिति पंजाब ,चड़ीगढ़ (केंद्र-शासित ),राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली ,हरियाणा की हैं .जहा लडकियों की संख्या तेजी से घटती जा रही हैं .जबकि ये सभी राज्य आर्थिक दृष्टि से संपन्न हैं. कुछ समय पहले हरियाणा विधानसभा के चुनाव में युवाओ की टोली ने यह शर्त रखा था की जो दल हमारी शादी करवाएगा उसी को हम वोट देंगे . (समाचार चैनल पर देखा ) .वही केरल एकलौता राज्य हैं जहा लडकियों की संख्या लडको से कही अधिक हैं .लडकियों की घटती संख्या चिंता का विषय बनी हुई हैं. कन्या भ्रूण हत्या करने वाले भी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं की लड़की ही बच्चो को जन्म देती हैं.वह जानबूझकर यह अक्षम्य अपराध करते हैं अगर धर्मो पर नजर डाला जाये तो सिखो में यह स्थिति काफी ख़राब हैं .जबकि सिख समृद्ध होते हैं.
भारत में एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजर -बसर करती हैं. हमारे समाज में दहेज़ दानव प्रथा भी इसके लिए उत्तरदायी हैं .गरीब यह सोचता हैं की अगर लड़की हुई तो उसकी शादी -विवाह में दहेज़ देने पड़ेंगे .यदि लड़का हुआ तो पढ़ -लिखकर अपने और अपने परिवार का नाम रौशन करेगा . वह सोचता हैं की लड़की को तो पढ़ा -लिखाकर पराया घर ही तो भेजना हैं तब हम उसे क्यूँ पढाये . आपने बहुत जगहों पर देखा होगा की माता -पिता लडको को अच्छे विधालयो में पढ़ाते हैं जबकि लड़की को घर का काम-काज सिखाते हैं .यदि पढ़ाते भी हैं तो सामान्य विधालयो में .वे यह नहीं समझ पाते की लडकियों को शिक्षा देने के क्या दूरगामी परिणाम होंगे . वैसे यह कहा जा सकता हैं की महिला ही महिला की दुश्मन होती हैं .महिला की सहमती से ही कन्या भ्रूण हत्या जैसा घृणित अपराध को अंजाम दिया जाता हैं. महिला भी बेटो को ही पसंद करती हैं .बेटियों को नहीं .यहाँ मैं एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की सभी महिलाये ऐसा नहीं करती हैं .कन्या भ्रूण हत्या महिलाये मजबूरी में भी करती हैं क्यूँ की उन्हें अपने ससुराल वालो के द्वारा प्रताड़ित किया जाता हैं .उनपर तरह -तरह के लांछन लगाये जाते हैं .लेकिन भ्रूण को मारने में उनकी मौन सहमती तो रहती ही हैं .
अगर इसी तरह लडकियों की संख्या घटती रही तो गंभीर संकट उत्पन्न हो जायेगा . मानव समाज के अस्तित्व पर ही संकट मंडराने लगेगा . भाइयो की कलाई पर रक्षा कवच कौन बाधेंगा ?बेटो के लिए बहुए कहा से आएगी ?अगली पीढ़ी के लिए माँ का कोख कौन उपलब्ध कराएगा ?यदि अगली पीढ़ी को इस दुनिया में जन्म लेने हैं और उनके जीवन को आगे बढ़ाना हैं तो आज की बेटी को जीने का अधिकार देना होगा और कन्या भ्रूण हत्या को रोकना होगा. मेरे विचार से कन्या भ्रूण हत्या करने वाले राजद्रोही हैं .क्यूँ की वे इस तरह के जघन्य अपराध कर राष्ट्र के विकास को अवरूद्ध कर रहे हैं.डाक्टर को हमारे समाज में भगवन कहा जाता हैं लेकिन वे भी इसमे सहयोगी बन रहे हैं .(सभी डाक्टर नहीं जो यह अपराध करते हैं वे ) सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह हैं की हम शिक्षा के क्षेत्र में नित्य नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं और लडकियों की संख्या और उन्हें सुरक्षा देने में पीछे जा रहे हैं .आप यदि नई जनगणना के रिपोर्ट को देखे तो गावो के तुलना में शहरों में कन्या भ्रूण हत्या की दर अधिक हैं .
सरकार ने इस समस्या को रोकने के लिए भ्रूण का लिंग परीक्षण करना अपराध घोषित किया हैं.प्रसव पूर्व भूर्ण परीक्षण के दुरूपयोग को रोकने के लिए सन 1994 में “प्रसव पूर्व नैदानिक तकनीक नियमन” और दुरूपयोग निवारण अधिनियम 1994 को 1 जनवरी 1996 को लागू किया .इस कानून के अनुसार इस प्रकार का अपराध करने वाले लोगो को 5 वर्ष की सजा और 50 ,000 रूपये की सजा का प्रावधान किया गया हैं .यह राशि आरसीएच -2 कार्यक्रम के अंतर्गत सम्बंधित जिले के मुख्या चिकित्सा एवम स्वास्थ्य अधिकारी के माध्यम से दी जाएगी .भारतीय दंड संहिता की धारा -312 से लेकर 315 तक में भ्रूण हत्या रोकने सम्बन्धी विभिन्न प्रावधान किये गए हैं. धारा 315 शिशु को जीवित पैदा होने से रोकने या जन्म के पश्चात् उसकी हत्या करने के आशय से किये गए गए कार्य के सम्बन्ध में सम्बंधित व्यक्ति को 10 वर्ष तक का कारावास या जुर्माना या दोनों से दण्डित करने का प्रावधान हैं.कन्या भ्रूण हत्या तो मानव के अधिकार कानून का उल्लंघन हैं साथ -साथ संविधान का अपमान भी हैं .ऐसे लोगो लो छोड़ा नहीं जाना चाहिए .
इसे रोकने के लिए महिलाओ को आगे आना होगा और सरकार को कानून को कठोरता के साथ लागू करना होगा. पर्याप्त प्रचार -प्रसार करना होगा .लडकियों की शिक्षा पर व्यापक ध्यान देने होंगे ताकि वे आत्मनिर्भर बन सके और यदि उनके ससुराल वाले कन्या भ्रूण हत्या करने को कहे तो वे उसका विरोध कर सके .अंत में एक लड़की के शिक्षित होने से पूरा समाज शिक्षित होता हैं .
महिला सशक्तिकरण का एक सशक्त माध्यम.?
महिलाये भारत की कुल आबादी
का आधा हिस्सा हैं .संभवतः राष्ट्र के विकास के कार्य में महिलाओ की
भूमिका और योगदान को पूरी तरह और सही परिप्रेक्ष्य में रखकर राष्ट्र
निर्माण के कार्य को समझा जा सकता हैं. समूची सभ्यता में व्यापक बदलाव के
एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में महिला सशक्तिकरण आन्दोलन 20 वी शताब्दी के
आखिरी दशक का एक महत्वपूर्ण राजनितिक और सामाजिक विकास कहा जाना चाहिए.
भारत जैसे देश में जहाँ लोकतान्त्रिक तरीके से काम करने की आजादी हैं या
यु कहे की एक सशक्त परम्परा हैं .जनमत जीवंत हैं और आधी आबादी के कल्याण
में रूचि लेने वाला एक बड़ा वर्ग विधमान हैं . महिला सशक्तिकरण की शुरुआत
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 8 मार्च ,1975 को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस
से मानी जाती हैं .फिर महिला सशक्तिकरण की पहल 1985 में महिला
अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन नैरोबी में की गई. भारत सरकार ने समाज में लिंग
आधारित भिन्नताओ को दूर करने के लिए एक महान निति ‘महिला कल्याण नीति’1953
में अपनाई . महिला सशक्तिकरण का राष्ट्रीय उद्देश्य महिलाओ की प्रगति और
उनमे आत्मविश्वास का संचार करना हैं.
महिला आरक्षण का इतिहास
सर्वप्रथम 1926 में विधानसभा में एक महिला का मनोनयन कर सदस्य बनाया गया परन्तु उसे मत देने के अधिकार से वंचित रखा गया. इसके पश्चात् 1937 में महिलाओ के लिए सीट आरक्षित कर दी गई जिसके फलस्वरूप 41 महिला उम्मीदवार चुनाव में उतरी .1938 में श्रीमती आर. बी.सुब्बाराव राज्य परिषद् में चुनी गई उसके बाद 1953 में श्री मति रेणुका राय केंद्रीय व्यवस्थापिका में प्रथम महिला सदस्य के रूप में चुनी गई . आजादी के बाद महिला आरक्षण के माध्यम से महिला सशक्तिकरण की शुरुआत सबसे पहले 1996 में संयुक्त मोर्चे की सरकार के दौरान तब हुआ जब सरकार ने इस आशय का बिल पारित करने के संकेत दिए .यह संकेत इस मुद्दे पर आम विचार -विमर्श के उद्देश्य से दिया गया . लेकिन उस समय से आज तक इस मुद्दे पर आम राय नहीं बन पा रही हैं . इसमे काफी विरोधावाश हैं. इसमे पहला सुझाव यह दिया गया की कानून में संशोधन कर पार्टियों को ही यह काम करने के लिए बाध्य कर दिया जाये की वह ही महिलाओ को 33 % आरक्षण दे . लेकिन इसमे कोई दो राय नहीं पार्टिया प्रत्यक्ष रूप से तो महिला आरक्षण की बात करती हैं मगर उनमे अंतर्विरोध बहुत हैं. यह एक मानी हुई बात हैं की महिला आरक्षण को कुछ देर तक टाला तो जा सकता हैं परन्तु इससे मुह नहीं मोड़ा जा सकता हैं.
संवैधानिक प्रावधान
संविधान का अनुच्छेद 14 से 18 में स्त्री और पुरुष को समानता का अधिकार दिया गया हैं. अनुच्छेद 15 (1 ) तथा 15 ( 2 ) में धर्म ,मूल ,वंश ,जाति,लिंग ,जन्म ,स्थान के आधार पर विभेद अमान्य हैं .इसमें महिला और पुरुष दोनों को सामान रूप से जीविका का निर्वहन हेतु पर्याप्त साधन उपलब्ध करने की चर्चा की गई हैं. लेकिन अनुच्छे 15 (3 ) कहता हैं की स्त्रियों की दयनीय स्थिति ,कुरीतियों के कारण होने वाले उत्पीडन ,बाल विवाह तथा बहु विवाह आदि के कारण शोषण की स्थिति में राज्यों में राज्यों को उनके लिए विशेष प्रबंध तथा विशेषाधिकार दिया जाना चाहिए. स्पष्टतः जहाँ भी आधी आबादी को सामाजिक ,पारिवारिक तथा स्वस्थ सम्बन्धी सुरक्षा के प्रश्न थे संविधान ने उन्हें पुर्णतः सुरक्षित किया हैं. वैसे महिला आरक्षण के मुद्दे पर सर्वसम्मति हो जाने के बावजूद भी के खास स्तर पर विरोध जारी हैं .महिलाओ के लिए आरक्षण की व्यवस्था के साथ पिछड़ी और दलित जातियों के महिलाओ के लिए उपव्यवस्था की जाये या नहीं .भारतीय जनता पार्टी ,कौंग्रेस और विभिन्न वामपंथी पार्टिया महिलाओ के लिए आरक्षण की व्यवस्था में जातीय व्यवस्था बनाने की विरोध में रही हैं परन्तु दलित और पिछड़ी जातीय के आधार पर राजनीति करने वाली पार्टिया यह भाजपा ,.कौंग्रेस पर यह आरोप लगाती हैं कि ये सभी दल एक साजिश के तहत सवर्णों को सत्ता के केंद्र में रखना चाहती हैं.
संसद और विधानसभाओ में महिलाओ को आरक्षण दिया जाने के पक्ष में तर्क
1 .जब संविधान का 73 वा और 74 वा संशोधन कर के महिलाओ को पंचायतो और नगर पालिकाओ में एक तिहाई आरक्षण दे दिया जा चूका हैं तो उसका विस्तार संसद और विधानसभा स्तर पर क्यूँ नहीं हो सकता हैं
2 .प्रतिनिधित्व से लडकियों की समक्ष एक नया रोल मोडल पेश हो सकेगा और इसका सकारात्मक असर महिला सशक्तिकरण के रूप में पड़ेगा.
3 .महिलाओ की आधी आबादी के नाते निति निर्धारण में उनकी समुचित भूमिका अति आवश्यक हैं. ,मतलब महिलाओ के लिए आधी सिट आरक्षित हो.
4 .महिलाओ की संख्या संसद या विधानसभाओ में नगण्य हैं क्यूँ की कोई भी दल महिलाओ को टिकट देना नहीं चाहता हैं.
5 .पुरुष के प्रभाव के चलते राजनितिक दल चुनाव में अधिक महिला उम्मीदवार को खड़ा करना नहीं चाहते हैं .अतः आरक्षण से सभी दलो द्वारा महिला उम्मीदवारों के चुनाव के समर्थन करना सुनिश्चित हो सकेगा. .
6 .महिलाओ को निरक्षरता दर पुरुषो की तुलना में काफी अधिक हैं .अतः संसद और विधानसभाओ में आरक्षण देकर उनकी चेतना का शीघ्र विकास किया जा सकता हैं.
73 वे और 74 वे संविधान संशोधन अधिनियम 1993 में पारित कर सरकार ने पंचायतो में आरक्षण देकर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया हैं. इस आरक्षण के फलस्वरूप पंचायतो और नगत निकायों में भी महिलाये पंचायत प्रमुख और नगर परिषद् अध्यक्षा जैसी महत्वपूर्ण पद पर पहुँच सकी हैं. संविधान के अनुच्छेद 243 (घ ) तथा 243 (न ) द्वारा आरक्षित एवम अनारक्षित वर्ग की महिलाओ हेतु 33 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई हैं. इस व्यवस्था से फलस्वरूप सभी प्रान्तों में ग्रामीण एवम शहरी पंचायत के सभी स्तर पर कई महिलाओ जनप्रतिनिधि के रूप में अपनी सफलता का निर्वाह सफलता पूर्वक कर रही हैं. संपूर्ण निर्वाचित पंचायत सदस्यों में 10 लाख महिलाए हैं जो महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में मिल का पत्थर साबित हो रही हैं. पंचायतो में निर्वाचित महिलाओ की संख्या विश्व में निर्वाचित महिलाओ की संख्या से भी अधिक हैं. बिहार,मध्य -प्रदेश ,हिमाचल प्रदेश सरकार ने महिलाओ को 50 प्रतिशत आरक्षण पंचायतो में दिया हैं. इन राज्यों में महिलाये ने अपने कार्यो के बदौलत नए -नए कीर्तिमान स्थापित किया हैं. बिहार में तो पंचायतो में निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों का संख्या 54 प्रतिशत तक जा पहुंची हैं. पंचायतो में महिलाओ को आरक्षण देने के फलस्वरूप जो महिलाये जनप्रतिनिधि के रूप में चुनकर आये हैं, वे अपने काम को ईमानदारी पूर्वक अंजाम दे रही हैं इससे यह साबित होता हैं, की महिलाये असहाय और निष्क्रिय नहीं हैं.
भारत में पंचायतो में महिलाओ को 33 प्रतिशत से बढाकर 50 प्रतिशत सीट आरक्षित कर दी गई हैं .लेकिन सत्ता का मुख्या केंद्र बिंदु विधानसभा और लोकसभा में महिलाओ के भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए हमारे राष्ट्रीय राजनितिक दल दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं. राज्यसभा से भरी विरोध के बाद पास महिला आरक्षण बिल को अभी लोकसभा और कम से कम 50 फीसदी विधानसभा को पर करना जरुरी हैं. यह काम कब तक होगा कहा नहीं जा सकता हैं. ?भारतीय संसद म महिला जनप्रतिनिधियों का प्रतिशत हमारे पडोसी देश पाकिस्तान ,नेपाल और इराक से भी कम हैं. इन देशो को देखा जाए तो रवांडा में महिलाओ की संख्या “लोअर हॉउस” में 56 .30 प्रतिशत हैं .आजादी के 62 साल बाद भी लोकसभा में महिलाओ की संख्या काफी कम (50 )हैं. ये आंकड़े शर्मनाक हैं. महिला सशक्तिकरण का वास्तविक उपलब्धि यह हैं की वह अपने संपूर्ण नारीत्व पर गर्व करे और अपने अन्दर आत्मविश्वास का संचार करे .उसमे अपनी शर्तों पर जीने का साहस हो . इसमे “महिला आरक्षण बिल” महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता हैं.
लोहिया के शब्दों में “शक्ति मौका आने पर प्रकट होती हैं और प्रकट होते- होते आगे बढाती हैं .शक्ति दबाने पर दबती चली जाती हैं ,की मानो हो ही और कभी नहीं हो रही” .भारतीय समाज में नारी को इतना दबा कर रखा गया कि उसे अपने क्षमताओ व सामर्थ्य पर विश्वास ही नहीं रहा. लोहिया ने महिलाओ कि स्थिति में सुधार एवम पुरुषवादी प्रभुत्व कि समाप्ती हेतु महिलाओ के लिए “विशेष अवसर की सिद्धांत” की मांग की.जिसमे पिछडो ,हरिजनों ,मुस्लिमो को शामिल किया गया था. और उन सबो के लिए साठ फीसदी आरक्षण की मांग की गई थी . यह अत्यंत विषाद एवम दुर्भाग्य का विषय हैं कि यदि सैद्धांतिक स्तर पर आरक्षण अनुचित हैं तो सभी वर्गों के लिए होनी चाहिए .सिर्फ महिलाओ के सन्दर्भ में क्यूँ ? अन्य पिछडो के विकास में आरक्षण जरुरी हैं तो महिलाओ के क्यूँ नहीं .क्या महिलाये वंचित नहीं रही हैं.?सामाजिक न्याय के कथित पक्षधर इस बात का विरोध कर रहे हैं की इसमे “कोटे में कोटे” की पद्धति नहीं अपनी गई हैं. वे महिलाओ को अगड़े -पिछड़े में बाटने की घृणित अपराध व खतरनाक कोशिश कर रहे हैं. ताकि महिला आरक्षण पर आम राय नहीं बन पाए और वह विधेयक लोक सभा और विधानसभा में पास होने का बाट जोहता रहे.ऐसी विषम स्थिति में महिला और पुरुष को मिलकर समता और समृद्धि पर आधारित अभियान चलाना होगा .अन्यथा सशक्तिकरण का सपना बस सपना ही रह जायेगा. इस बात स्वीकार किया जाना चाहिए की कोई भी आरक्षण विभेदकारी होता हैं और इससे समानता के सिद्धांत का उल्लघंन होता हैं. और योग्यता को निम्न प्राथमिकता मिलती हैं. इस प्रकार बहुत से योग्य उम्मीदवारों में हताशा होगी . अतः किसी भी आरक्षण की विधिमान्यता की परखा इस आधार पर की जा सकती हैं की क्या यह किसी तर्कसंगत तथा प्रांसगिक मानदंड पर आधारित हैं.
लेकिन सवाल उठता हैं की क्या आरक्षण देने से आम महिलाओ की जिन्दगी में फर्क आ पायेगा? महिलाओ के लिए राजनितिक पदों पर बैठना और ऐसे पदों का उपयोग आम महिलाओ के कल्याण के लिए करना अलग बात हैं. यह मानना गलत होगा की महिलाओ के संसद में पहुचने मात्र से आम महिलाओ का भला हो जायेगा. क्यूँ की ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जिसमे महिला जनप्रतिनिधि के द्वारा ही कई ऐसे योजनाओ को बंद किया गया जो महिलाओ के कल्याण से सम्बंधित थी. यह कतई नहीं समझा जाना चाहिए की महिलाए संसद में पहुंचकर महिला से सम्बंधित कार्य में रूचि लेंगी.यहाँ यह संभावना बलवती हैं की चुनिन्दा महिलाओ को दिखावटी रूप से संसद में स्थान देकर उन्ही नीतियों का समर्थन के लिए बाध्य किया जायेगा जिसे पुरुष चाहते हैं. वे खुद से निर्णय नहीं ले सकेंगे .महिला आरक्षण के मामले में दलितों के आरक्षण के मॉडल का पालन करना गलत होगा. इस प्रयास से आम दलितों का भला नहीं होगा उलटे दलितों पर अत्याचार होगा ऐसा पहले भी हुआ हैं. दलितों को आरक्षण देने से 120 दलित संसद में पहुचे परन्तु आज भी दलितों की समस्या ज्यो की त्यों बनी हुई हैं. कारण यह हैं की किसी दलित का जनप्रतिनिधि का चुना जाना अलग बात हैं और दलित सशक्तिकरण अलग बात हैं.
निष्कर्ष —— आरक्षण से ज्यादा जरुरी हैं महिला की स्थिति को सशक्त बनाना और उन्हें आर्थिक और सामाजिक रूप से सबल बनाया जाये जिससे उनमे आत्मविशवास आये और वे अपने हक़ की लड़ाई बिना किसी के सहयोग के खुद लड़ सके .महिलाओ की शिक्षा ,सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए . आरक्षण सच्ची लोकतान्त्रिक प्रक्रिया और महिलाओ की भागीदारी का विकल्प नहीं हो सकता हैं ,परन्तु इस दिशा में यह एक सही कदम हैं.
महिला आरक्षण का इतिहास
सर्वप्रथम 1926 में विधानसभा में एक महिला का मनोनयन कर सदस्य बनाया गया परन्तु उसे मत देने के अधिकार से वंचित रखा गया. इसके पश्चात् 1937 में महिलाओ के लिए सीट आरक्षित कर दी गई जिसके फलस्वरूप 41 महिला उम्मीदवार चुनाव में उतरी .1938 में श्रीमती आर. बी.सुब्बाराव राज्य परिषद् में चुनी गई उसके बाद 1953 में श्री मति रेणुका राय केंद्रीय व्यवस्थापिका में प्रथम महिला सदस्य के रूप में चुनी गई . आजादी के बाद महिला आरक्षण के माध्यम से महिला सशक्तिकरण की शुरुआत सबसे पहले 1996 में संयुक्त मोर्चे की सरकार के दौरान तब हुआ जब सरकार ने इस आशय का बिल पारित करने के संकेत दिए .यह संकेत इस मुद्दे पर आम विचार -विमर्श के उद्देश्य से दिया गया . लेकिन उस समय से आज तक इस मुद्दे पर आम राय नहीं बन पा रही हैं . इसमे काफी विरोधावाश हैं. इसमे पहला सुझाव यह दिया गया की कानून में संशोधन कर पार्टियों को ही यह काम करने के लिए बाध्य कर दिया जाये की वह ही महिलाओ को 33 % आरक्षण दे . लेकिन इसमे कोई दो राय नहीं पार्टिया प्रत्यक्ष रूप से तो महिला आरक्षण की बात करती हैं मगर उनमे अंतर्विरोध बहुत हैं. यह एक मानी हुई बात हैं की महिला आरक्षण को कुछ देर तक टाला तो जा सकता हैं परन्तु इससे मुह नहीं मोड़ा जा सकता हैं.
संवैधानिक प्रावधान
संविधान का अनुच्छेद 14 से 18 में स्त्री और पुरुष को समानता का अधिकार दिया गया हैं. अनुच्छेद 15 (1 ) तथा 15 ( 2 ) में धर्म ,मूल ,वंश ,जाति,लिंग ,जन्म ,स्थान के आधार पर विभेद अमान्य हैं .इसमें महिला और पुरुष दोनों को सामान रूप से जीविका का निर्वहन हेतु पर्याप्त साधन उपलब्ध करने की चर्चा की गई हैं. लेकिन अनुच्छे 15 (3 ) कहता हैं की स्त्रियों की दयनीय स्थिति ,कुरीतियों के कारण होने वाले उत्पीडन ,बाल विवाह तथा बहु विवाह आदि के कारण शोषण की स्थिति में राज्यों में राज्यों को उनके लिए विशेष प्रबंध तथा विशेषाधिकार दिया जाना चाहिए. स्पष्टतः जहाँ भी आधी आबादी को सामाजिक ,पारिवारिक तथा स्वस्थ सम्बन्धी सुरक्षा के प्रश्न थे संविधान ने उन्हें पुर्णतः सुरक्षित किया हैं. वैसे महिला आरक्षण के मुद्दे पर सर्वसम्मति हो जाने के बावजूद भी के खास स्तर पर विरोध जारी हैं .महिलाओ के लिए आरक्षण की व्यवस्था के साथ पिछड़ी और दलित जातियों के महिलाओ के लिए उपव्यवस्था की जाये या नहीं .भारतीय जनता पार्टी ,कौंग्रेस और विभिन्न वामपंथी पार्टिया महिलाओ के लिए आरक्षण की व्यवस्था में जातीय व्यवस्था बनाने की विरोध में रही हैं परन्तु दलित और पिछड़ी जातीय के आधार पर राजनीति करने वाली पार्टिया यह भाजपा ,.कौंग्रेस पर यह आरोप लगाती हैं कि ये सभी दल एक साजिश के तहत सवर्णों को सत्ता के केंद्र में रखना चाहती हैं.
संसद और विधानसभाओ में महिलाओ को आरक्षण दिया जाने के पक्ष में तर्क
1 .जब संविधान का 73 वा और 74 वा संशोधन कर के महिलाओ को पंचायतो और नगर पालिकाओ में एक तिहाई आरक्षण दे दिया जा चूका हैं तो उसका विस्तार संसद और विधानसभा स्तर पर क्यूँ नहीं हो सकता हैं
2 .प्रतिनिधित्व से लडकियों की समक्ष एक नया रोल मोडल पेश हो सकेगा और इसका सकारात्मक असर महिला सशक्तिकरण के रूप में पड़ेगा.
3 .महिलाओ की आधी आबादी के नाते निति निर्धारण में उनकी समुचित भूमिका अति आवश्यक हैं. ,मतलब महिलाओ के लिए आधी सिट आरक्षित हो.
4 .महिलाओ की संख्या संसद या विधानसभाओ में नगण्य हैं क्यूँ की कोई भी दल महिलाओ को टिकट देना नहीं चाहता हैं.
5 .पुरुष के प्रभाव के चलते राजनितिक दल चुनाव में अधिक महिला उम्मीदवार को खड़ा करना नहीं चाहते हैं .अतः आरक्षण से सभी दलो द्वारा महिला उम्मीदवारों के चुनाव के समर्थन करना सुनिश्चित हो सकेगा. .
6 .महिलाओ को निरक्षरता दर पुरुषो की तुलना में काफी अधिक हैं .अतः संसद और विधानसभाओ में आरक्षण देकर उनकी चेतना का शीघ्र विकास किया जा सकता हैं.
73 वे और 74 वे संविधान संशोधन अधिनियम 1993 में पारित कर सरकार ने पंचायतो में आरक्षण देकर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया हैं. इस आरक्षण के फलस्वरूप पंचायतो और नगत निकायों में भी महिलाये पंचायत प्रमुख और नगर परिषद् अध्यक्षा जैसी महत्वपूर्ण पद पर पहुँच सकी हैं. संविधान के अनुच्छेद 243 (घ ) तथा 243 (न ) द्वारा आरक्षित एवम अनारक्षित वर्ग की महिलाओ हेतु 33 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई हैं. इस व्यवस्था से फलस्वरूप सभी प्रान्तों में ग्रामीण एवम शहरी पंचायत के सभी स्तर पर कई महिलाओ जनप्रतिनिधि के रूप में अपनी सफलता का निर्वाह सफलता पूर्वक कर रही हैं. संपूर्ण निर्वाचित पंचायत सदस्यों में 10 लाख महिलाए हैं जो महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में मिल का पत्थर साबित हो रही हैं. पंचायतो में निर्वाचित महिलाओ की संख्या विश्व में निर्वाचित महिलाओ की संख्या से भी अधिक हैं. बिहार,मध्य -प्रदेश ,हिमाचल प्रदेश सरकार ने महिलाओ को 50 प्रतिशत आरक्षण पंचायतो में दिया हैं. इन राज्यों में महिलाये ने अपने कार्यो के बदौलत नए -नए कीर्तिमान स्थापित किया हैं. बिहार में तो पंचायतो में निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों का संख्या 54 प्रतिशत तक जा पहुंची हैं. पंचायतो में महिलाओ को आरक्षण देने के फलस्वरूप जो महिलाये जनप्रतिनिधि के रूप में चुनकर आये हैं, वे अपने काम को ईमानदारी पूर्वक अंजाम दे रही हैं इससे यह साबित होता हैं, की महिलाये असहाय और निष्क्रिय नहीं हैं.
भारत में पंचायतो में महिलाओ को 33 प्रतिशत से बढाकर 50 प्रतिशत सीट आरक्षित कर दी गई हैं .लेकिन सत्ता का मुख्या केंद्र बिंदु विधानसभा और लोकसभा में महिलाओ के भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए हमारे राष्ट्रीय राजनितिक दल दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं. राज्यसभा से भरी विरोध के बाद पास महिला आरक्षण बिल को अभी लोकसभा और कम से कम 50 फीसदी विधानसभा को पर करना जरुरी हैं. यह काम कब तक होगा कहा नहीं जा सकता हैं. ?भारतीय संसद म महिला जनप्रतिनिधियों का प्रतिशत हमारे पडोसी देश पाकिस्तान ,नेपाल और इराक से भी कम हैं. इन देशो को देखा जाए तो रवांडा में महिलाओ की संख्या “लोअर हॉउस” में 56 .30 प्रतिशत हैं .आजादी के 62 साल बाद भी लोकसभा में महिलाओ की संख्या काफी कम (50 )हैं. ये आंकड़े शर्मनाक हैं. महिला सशक्तिकरण का वास्तविक उपलब्धि यह हैं की वह अपने संपूर्ण नारीत्व पर गर्व करे और अपने अन्दर आत्मविश्वास का संचार करे .उसमे अपनी शर्तों पर जीने का साहस हो . इसमे “महिला आरक्षण बिल” महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता हैं.
लोहिया के शब्दों में “शक्ति मौका आने पर प्रकट होती हैं और प्रकट होते- होते आगे बढाती हैं .शक्ति दबाने पर दबती चली जाती हैं ,की मानो हो ही और कभी नहीं हो रही” .भारतीय समाज में नारी को इतना दबा कर रखा गया कि उसे अपने क्षमताओ व सामर्थ्य पर विश्वास ही नहीं रहा. लोहिया ने महिलाओ कि स्थिति में सुधार एवम पुरुषवादी प्रभुत्व कि समाप्ती हेतु महिलाओ के लिए “विशेष अवसर की सिद्धांत” की मांग की.जिसमे पिछडो ,हरिजनों ,मुस्लिमो को शामिल किया गया था. और उन सबो के लिए साठ फीसदी आरक्षण की मांग की गई थी . यह अत्यंत विषाद एवम दुर्भाग्य का विषय हैं कि यदि सैद्धांतिक स्तर पर आरक्षण अनुचित हैं तो सभी वर्गों के लिए होनी चाहिए .सिर्फ महिलाओ के सन्दर्भ में क्यूँ ? अन्य पिछडो के विकास में आरक्षण जरुरी हैं तो महिलाओ के क्यूँ नहीं .क्या महिलाये वंचित नहीं रही हैं.?सामाजिक न्याय के कथित पक्षधर इस बात का विरोध कर रहे हैं की इसमे “कोटे में कोटे” की पद्धति नहीं अपनी गई हैं. वे महिलाओ को अगड़े -पिछड़े में बाटने की घृणित अपराध व खतरनाक कोशिश कर रहे हैं. ताकि महिला आरक्षण पर आम राय नहीं बन पाए और वह विधेयक लोक सभा और विधानसभा में पास होने का बाट जोहता रहे.ऐसी विषम स्थिति में महिला और पुरुष को मिलकर समता और समृद्धि पर आधारित अभियान चलाना होगा .अन्यथा सशक्तिकरण का सपना बस सपना ही रह जायेगा. इस बात स्वीकार किया जाना चाहिए की कोई भी आरक्षण विभेदकारी होता हैं और इससे समानता के सिद्धांत का उल्लघंन होता हैं. और योग्यता को निम्न प्राथमिकता मिलती हैं. इस प्रकार बहुत से योग्य उम्मीदवारों में हताशा होगी . अतः किसी भी आरक्षण की विधिमान्यता की परखा इस आधार पर की जा सकती हैं की क्या यह किसी तर्कसंगत तथा प्रांसगिक मानदंड पर आधारित हैं.
लेकिन सवाल उठता हैं की क्या आरक्षण देने से आम महिलाओ की जिन्दगी में फर्क आ पायेगा? महिलाओ के लिए राजनितिक पदों पर बैठना और ऐसे पदों का उपयोग आम महिलाओ के कल्याण के लिए करना अलग बात हैं. यह मानना गलत होगा की महिलाओ के संसद में पहुचने मात्र से आम महिलाओ का भला हो जायेगा. क्यूँ की ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जिसमे महिला जनप्रतिनिधि के द्वारा ही कई ऐसे योजनाओ को बंद किया गया जो महिलाओ के कल्याण से सम्बंधित थी. यह कतई नहीं समझा जाना चाहिए की महिलाए संसद में पहुंचकर महिला से सम्बंधित कार्य में रूचि लेंगी.यहाँ यह संभावना बलवती हैं की चुनिन्दा महिलाओ को दिखावटी रूप से संसद में स्थान देकर उन्ही नीतियों का समर्थन के लिए बाध्य किया जायेगा जिसे पुरुष चाहते हैं. वे खुद से निर्णय नहीं ले सकेंगे .महिला आरक्षण के मामले में दलितों के आरक्षण के मॉडल का पालन करना गलत होगा. इस प्रयास से आम दलितों का भला नहीं होगा उलटे दलितों पर अत्याचार होगा ऐसा पहले भी हुआ हैं. दलितों को आरक्षण देने से 120 दलित संसद में पहुचे परन्तु आज भी दलितों की समस्या ज्यो की त्यों बनी हुई हैं. कारण यह हैं की किसी दलित का जनप्रतिनिधि का चुना जाना अलग बात हैं और दलित सशक्तिकरण अलग बात हैं.
निष्कर्ष —— आरक्षण से ज्यादा जरुरी हैं महिला की स्थिति को सशक्त बनाना और उन्हें आर्थिक और सामाजिक रूप से सबल बनाया जाये जिससे उनमे आत्मविशवास आये और वे अपने हक़ की लड़ाई बिना किसी के सहयोग के खुद लड़ सके .महिलाओ की शिक्षा ,सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए . आरक्षण सच्ची लोकतान्त्रिक प्रक्रिया और महिलाओ की भागीदारी का विकल्प नहीं हो सकता हैं ,परन्तु इस दिशा में यह एक सही कदम हैं.
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