Tuesday, 31 January 2012

दलित नेता और दलित समाज

बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर भारतीय राजनीति के उस शिखर पुरुष का नाम है जिन्हें देश का प्रत्येक वर्ग व समाज आदर, श्रद्घा तथा सम्मान की नजर से देखता है। बावजूद इसके कि वे स्वयं एक दलित परिवार में जन्मे तथा जीवन के अन्तिम समय में बाबासाहब ने अपने लाखों समर्थकों व अनुयाईयों के साथ बौद्घ धर्म स्वीकार कर लिया था। फिर भी उनकी काबिलियत, योग्यता तथा देश व राजनीति के प्रति की गई उनकी कुर्बानियों ने उन्हें उस स्थान तक पहुंचा दिया था कि भारतीय समाज उन्हें किसी वर्ग विशेष का नेतृत्व करने वाले नेता के रूप में सीमित नहीं रख सका।
  अब लगता है समय काफी कुछ बदल चुका है। आज का दलित नेतृत्व बाबासाहब अम्बेडकर से अपनी तुलना तो करना चाहता है परन्तु उन जैसा आदर्श नहीं स्थापित करना चाहता। वर्तमान दलित नेतृत्व, बातें तो दलित समाज के हितों की करता है परन्तु उसका ध्यान अपने, अपने परिवार के व अपने आसपास के लोगों को लाभ पहुंचाने तक ही केंद्रित रहता है। जब तक बाबू जगजीवन राम को उत्तर भारत के दलितों का नेता माना जाता रहा, उस समय तक तो दलित राजनीति में गांधीवाद तथा सादगी के दर्शन हो भी जाया करते थे। परन्तु जब से राम विलास पासवान, कांशीराम व मायावती जैसे आधुनिक सोच रखने वाले नेताओं ने दलित राजनीति को नेतृत्व प्रदान करने का जिम्मा उठाया तब से तो दलित नेतृत्व में, उसके रहन सहन, जीवनशैली, नेतृत्व प्रदान करने की निराली सोच, शानो-शौकत आदि में क्रांतिकारी परिवर्तन देखा जाने लगा। ऐसा नहीं है कि उच्चस्तरीय रहन सहन उनका अधिकार नहीं है या उनकी इस उच्चस्तरीय जीवनशैली से भारतीय समाज के किसी वर्ग को ईर्ष्या है। कहना गलत नहीं होगा कि राजनीति तो राजनेताओं के मनोरंजन एवं भोगविलास का एक उपयुक्त माध्यम मात्र ही बनकर रह गया है। कम ही नेता इस समय देश में ऐसे होंगे जिन्होंने राजनीति में कुछ गंवाया ही होगा, कमाया नहीं। भारत के प्रधानमंत्री पद पर सुशोभित होने वाले लगभग आज तक के सभी नेताओं को इसी श्रेणी में डाला जा सकता है।
  वर्तमान प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह को ही ले लें। देश व दुनिया के उच्चतम पदों पर आसीन रह चुके होने के बावजूद इस व्यक्ति के पास उस दिन भी मात्र मारुति 800 कार ही थी जिस दिन कि उन्हें प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने हेतु बुलाया गया था। भारत के प्रधानमंत्री के पद पर बैठने वाले लोग भी यदि चाहते तो शेर की खाल को अपना आसन या अपने ड्राइंग रूप की शोभा बढाने के साधन के रूप में प्रयोग कर सकते थे। यह भी चाहते तो अपना रहन-सहन व जीवनशैली को राजशाही शैली की भांति शानो-शौकत से परिपूर्ण बना सकते थे। परन्तु इन्होंने ऐसा नहीं किया। इन सभी नेताओं ने सादगीपूर्ण जीवन गुजारकर यह प्रमाणित किया कि वे एक ऐसे बडे राष्ट्र के प्रमुख हैं जहां की अधिकांश आबादी गरीबी रेखा से नीचे बसर करती है।
  परन्तु भारत के दो प्रमुख राज्य उत्तर प्रदेश व बिहार में मायावती तथा राम विलास पासवान जैसे दो ऐसे नेता देखे जा सकते हैं जोकि अपनी राजनीति तो दलितों के नाम पर करते हैं परन्तु दलितों के उत्थान, विकास अथवा उनके रहन-सहन को ऊंचा उठाने से अधिक इनका ध्यान अपने जीवन स्तर को तथा अपने रहन-सहन की शैली को ऊंचा करने में केंद्रित रहता है। कुछ वर्ष पूर्व तक राम विलास पासवान का ड्राइंग रूप अन्य सभी केंद्रीय नेताओं में सबसे आलीशान हुआ करता था। उनके इस शाही वैभव के प्रदर्शन के विषय में जब उनसे पूछ गया तो उन्होंने प्रश्ा* के जवाब में प्रश्ा* ही किया था कि क्या दलित नेता को अपना रहन-सहन ऊंचा रखने का अधिकार नहीं है। यहीं पर बात गांधीजी के विचारों की आती है। वे तीसरे दर्जे के रेल के डिब्बे में यात्रा क्यों करते थे। सिर्फ इसलिए ताकि वे साधारण डिब्बे की यात्रा के द्वारा साधारण भारतीयों के सम्फ में आ सकें तथा उन साधारण रेल यात्रियों के दुःख-सुख को करीब से देख व समझ सकें। किस घटना ने गांधी को अपना शानो-शौकत से भारा जीवन त्यागने तथा तन पर मात्र एक धोती लपेटने हेतु प्रेरित किया था यह भी सभी जानते हैं।
  फिर आखिर वर्तमान शाही दलित नेतृत्व उस समाज को अपने उच्चकोटि के रहन सहन से क्या संदेश देना चाहता है। यदि यह कि दलित समाज इसी शाही ठाठ-बाठ का अनुसरण करे, फिर तो यह बहुत अच्छी सोच है। परन्तु करे तो कैसे करे। यह तो जीवन स्तर के ऊपर उठने से ही सम्भव है। और जब जीवन स्तर सुधारने की बात हो तो समाज का धनवान होना भी जरूरी है। इसके लिए आवश्यकता है ऊंची शिक्षा, स्व रोजगार तथा स्वावलम्बन की। अब प्रश्ा* यह है कि इसके लिए मायावती व राम विलास पासवान जैसे दलित नेताओं ने सम्पूर्ण दलित समाज को स्वावलम्बी बनाने हेतु अब तक किया ही क्या है? क्या बिहार व उत्तर प्रदेश में दलितों पर होने वाले अत्याचारों में कोई कमी आई है? देश में दलितों पर होने वाले हमले, दलित महिलाओं के साथ होने वाली अभद्र घटनाएं, दलितों का शोषण व  उत्पीडन आज भी इस देश की आमतौर पर घटने वाली घटनाएं हैं। वर्तमान दलित नेतृत्व इनको समाप्त करने की दिशा में आखिर क्या कर रहा है?
   आईए हम बताते हैं कि क्या कर रहा है। पूरे दो दशकों तक कांशीराम व मायावती ने दलित समाज को ‘मनुवादियों’ के विरुद्घ जमकर उकसाया। उन्हें अभूतपूर्व तरीके से लामबन्द किया। आज स्थिति यह है कि बहुजन समाज पार्टी भारतीय इतिहास की दलितों के नाम पर गठित होने वाली सबसे बडी व पहली राजनैतिक पार्टी है। इसी फार्मूले के साथ मायावती ने उत्तर प्रदेश में इतनी मजबूती हासिल की कि वे तीन बार प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर अन्य दलों के समर्थन से पहुंची। दलितों को संगठित कर तीन बार गठबंधन सरकार के रूप में सत्ता में आने पर मायावती को यह एहसास हो गया कि दलित समाज, बहुजन समाज पार्टी के झंडे तले कितना ही संगठित क्यों न हो ले परन्तु बहुजन समाज पार्टी को पूर्ण बहुमत में ला पाना अकेले इस समाज के वश की बात नहीं है। बस इसी सोच ने मायावती को मनुवादियों के विरुद्घ जहर उगलने से रोक दिया। बहुजन समाज के बजाए सर्वजन समाज के नारे लगने लगे। मनुवादियों ने भी मायावती को क्षमा करने में ही अपनी भी भलाई समझी। तिलक, तराजू और तलवार जिसका अर्थ ब्राह्मण, वैश्य तथा क्षत्रीय समाज से लिया जाता था तथा अभद्र नारों का प्रयोग कर इन समुदायों को कोसने का अफसोसनाक काम किया जाता था। उसे यू टर्न देते हुए ‘सर्वजन समाज’ की इस मसीहा ने अब नया नारा दिया, ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है।’ मायावती के इस नए नारे की ‘कद्र’ करते हुए या यूं कहें कि मायावती को क्षमा करने में ही अपनी भलाई समझते हुए या फिर सत्ता में भागीदारी की लालसा ने उत्तर पद्रेश के ब्राह्मण समाज को बहुजन समाज पार्टी के साथ जोडकर आखिरकार मायावती को चौथी बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना ही दिया। इस बार मायावती किसी गठबंधन सरकार की नहीं बल्कि बहुजन समाज की पूर्ण बहुमत वाली सरकार की मुख्यमंत्री बनी हैं। क्या यह सही नहीं कि पूर्ण बहुमत में आने की उनकी आकांक्षा ने उन्हें ब्राह्मण समाज के साथ जुडने को मजबूर कर दिया? और यदि ऐसा करना ही था तो देश के दलित समाज के दिलों में ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा राजपूतों के प्रति नफरत पैदा करने वाले नारे लगवाने की उन्होंने जरूरत ही क्यों महसूस की थी।
  मायावती के चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद जहां उन्होंने चार बार प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का एक कीर्तिमान स्थापित किया है, वहीं चमत्कारिक रूप से उन्होंने  15 करोड रुपए के अग्रिम आयकर का भुगतान कर यह भी साबित कर दिया है कि वे उत्तर प्रदेश की सबसे शक्तिशाली नेता मात्र ही नहीं बल्कि वह देश की सबसे धनवान नेत्री भी हैं। मायावती की वार्षिक आया 60 करोड रुपए दर्शाई गई है (कहा से आई )। मायावती को राजनैतिक बिसात बिछाने में जहां महारत हासिल है वहीं धन संग्रह के तरीके भी उनसे बेहतर शायद ही कुछ नेता जानते हों। मैडम ने पहले स्वयं को दलित समाज में दलित नेत्री के रूप में स्थापित किया। अपनी आक्रामक भाषणशैली के द्वारा उनके दिलों में सम्मानजनक स्थान बनाया। और फिर स्वयं को जिंदा देवी के रूप में पूजने का भी आह्वान किया। उन्होंने अपने अनुयाईयों को यह भी कहा कि वे मंदिरों में जाकर पैसे चढाना बंद करें। मैं जिंदा देवी हूं, जो कुछ चढाना है वे मुझपर चढाएं। कभी आपने कल्पना भी की है कि बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर जैसा महान नेता भी इस स्तर की राजनीति या ऐसे आह्वान कर सकता था? बात यहीं तक खत्म हो जाती तो भी गनीमत थी। अब तो खुलेआम मायावती जी अपने जन्मदिन के बहाने भारी धन संग्रह किया करती हैं। सोने-चांदी, हीरे आदि के आभूषण तथा नकदी सब कुछ उनके जन्मदिन पर सौगात के रूप में आती है। धन संग्रह तथा इसके द्वारा अर्जित सम्पत्ति का तो अब मायावती को खौफ भी सताने लगा है। पिछले दिनों दिए गए उन्हीं के बयान से यह पता चलता है कि उन्हें इस बात की शंका है कि आय से अधिक संपत्ति के लंबित पडे एक मामले में उन्हें जेल भी भेजा जा सकता है। गोया दलित नेतृत्व के भोग विलास व ऐशो आराम का पैमाना इतना लबरेज हो चुका है कि वह अब सम्भवतः छलकने ही वाला है। अफसोस कि इस इन्तेहा तक पहुंचने के बाद भी बहन मायावती स्वयं को बाबासाहब अम्बेडकर के समतुल्य कहने से बाज नहीं आतीं।
  उपरोक्त पूरे घटनाक्रम में यदि कोई ठगा हुआ सा नजर आता है तो वह है देश का वही दलित समाज जिसके कंधों पर कदम रखते हुए मायावती ने स्वयं को न सिर्फ चौथी बार उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बडे राज्य के मुख्यमंत्री पद तक पहुंचाने का कीर्तिमान बना दिया बल्कि इसी के माध्यम से वे देश की सबसे बडी आयकर देने वाली नेत्री भी बन बैठीं। अगर सब कुछ ठीक ठाक चलता रहा तो अभी मायावती के मुंह से एक और आवाज निकलने वाली है कि दलित को देश का प्रधानमंत्री बनाओ। और यदि किसी भी दल ने उनके प्रधानमंत्री बनने का किसी भी कारणवश विरोध किया तो उसपर भी ‘मनुवादी’ अथवा दलित विरोधी होने का लेबल लगा दिया जाएगा।
  समय चक्र यूं ही चलता रहेगा। दलित समाज की ही तरह अन्य समाजों में भी बिरादरी, वर्ग, क्षेत्र तथा जाति आदि की राजनीति करने वाले लोग स्वयं तो यूं ही ऐश करते रहेंगे तथा अपने राजनैतिक लाभ के निहितार्थ समाज के निमित्त यह फैसले करते रहेंगे कि कब किसे गाली देनी है तथा कब किसके गले में हाथ डालना है। इसी प्रकार नेताओं का अपना जीवन तो पूरी ऐश व सुरक्षा के साथ गुजरता रहेगा जबकि सम्बद्घ समाज यूं ही टकटकी लगाए यथापूर्व स्थिति इस राजनैतिक तमाशे को केवल देखता ही रह जाएगा। 

Friday, 27 January 2012

हमारी भूलें : जातिगत व धर्मगत भावनाओं में डूबे रहना

पहले आध्यात्मिक विकास के लिए किये जाने वाले प्रयत्नों को ही धर्म के नाम से संबोधित किया जाता था| किन्तु आजकल धर्म शब्द का अभिप्राय बिल्कुल भिन्न हो गया है| धर्म के नाम पर कुछ क्रिया-कलाप होने लगे है| तथा इन्हीं क्रिया कलापों को धर्म कहा जाता है| कौन किस प्रकार से जीवन बिताता है,इसको झगड़े व विवाद का विषय बना लिया गया है| व् इसी विषय पर साधारण झगड़े ही नहीं महायुद्धों तक की रचना हुई है|

वर्ण व जातियां भी किसी प्रकार से धर्म का अंग नहीं है| चार युगों में से सतयुग व कलियुग में वर्ण नहीं होती| कलियुग में वह नष्ट हो जाती है और सतयुग में उसकी आवश्यकता ही नहीं रहती| त्रेता के आरम्भ में जब समाज पत्नोमुखी होने लगा, उसकी रोकथाम के लिए वर्ण व्यवस्था का निर्माण किया जाता है| जो कलियुग के आरम्भ होते होते पूरी तरह से विफल हो,नष्ट हो जाती है| इस प्रकार से चार योगों के कार्यकाल को जोड़ा जाय तो आधे भाग में सतयुग व कलियुग होता है, जिसमे वर्णव्यवस्था का कोई स्थान नहीं होता| फिर भी यदि लोग वर्ण व जाति व्यवस्था को धर्म का आधार बताने की चेष्टा करे तो इसे दुस्साहस ही कहा जायेगा|

आज व्यावसयिक बुद्धि के लोग धर्म व जाति के नाम पर अनेक प्रकार के संगठनों का निर्माण, न केवल सुविधा पूर्वक जीवन बीता रहे है, बल्कि वे समाज के शोषण के हेतु बने हुए है| ऐसे लोग जातिय व धार्मिक कट्टरता फैलाकर समाज को शेष मानवता से अलग-थलग कर देने के लिए दोषी समझे जाने चाहिए|

जातिय व धार्मिक संगठनों कि यदि वास्तव में कोई उपयोगिता है तो वह यही हो सकती है कि अपने पूर्व पुरुषों द्वारा आध्यात्मिक विकास में जो मार्ग खोजे गए थे, उनका अन्वेषण कर, उस पाठ पर चल कर स्वयं का, समाज का व मानवता का कल्याण किया जाए| लेकिन यह करू अत्यंत कठिन है| इसके लिए व्यक्ति को कठोर साधना का आश्रय लेकर अपने तथाकथित भौतिक सुख साधनों का उत्सर्ग करना पड़ता है| इस लिए लोगों ने पूर्वजों के नाम पर,गौरव गाथाओं का बखान कर संगठन बनाने की पद्धति अपना ली है, ताकि समाज व पूर्वजों के नाम पर स्वयं हित का साधन कर सके व लोगों को गुमराह कर, उनके साधनों व शक्तियों का अपने हित में उपयोग कर सकें|

यह निश्चित तथ्य है कि वर्तमान युग में जिस प्रकार से जितने धर्म व जातियां चल रही है उनका अस्तित्व अधिक समय तक चलने वाला नहीं है| अत: जातिय संगठनों को वास्तविकता स्वीकार कर लोगों को स्वयं का विकास करने के लिए परम्परागत आध्यात्मिक प्रणालियों का आश्रय लेने के लिए प्रेरित करना चाहिए| जो धार्मिक व सामाजिक संगठन यह कार्य नहीं कर सकेंगे, वे कालांतर में स्वयं समाज व धर्म का विनाश करने के लिए दोषी ठहराए जायेंगे|

आज से एक हजार वर्ष पूर्व जब मौखिक विज्ञान अपने विकास को द्रुतगति दे रहा था| उस समय अन्धकार में डूबे हुए लोग अपनी यश गाथाएँ सुनने, भोग विलास करने, व धार्मिक मदान्धता में लिप्त हुए अपने आपको अद्भुत प्राणी समझ रहे थे| लेकिन विज्ञान के चमत्कार ने उनकी सारी बुद्धिमानियों को मूर्खता साबित कर दिया| पिछले दो सौ वर्षों में विज्ञान जिस गति से आगे बढ़ा है, उसने समस्त भौतिक मूल्यों को ही बदल दिया है| पालकियों, रथ, हाथी, घोड़ों व चरसों को किसी ने नष्ट नहीं किया, वे बदले हुए काल चक्र के प्रभाव से अपने आप ही समाज द्वारा भुला दिए गए व स्वत: ही नष्ट हो गए|

पिछले आठ सौ वर्षों से आध्यात्मिक जगत में विलक्षण चमत्कार हो रहे है| संसार की सभी कौमों में व संसार के सभी धर्मों में धार्मिक कट्टरता, मदान्धता व धार्मिक पंडावाद के खिलाफ विद्रोह करने वाले श्रेष्ठ पुरुष पैदा हुए है| उनकी आवाज को बुद्धिमान लोगों ने सुना व ह्रदय गम किया है| व समाज को नए रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित किया है| लेकिन धर्म व जातिगत भावनाओं से लोग अंधे हो गए है, उन्हें यह सब कुछ दिखाई नहीं देता है| वे आज भी बैल गाड़ियों से चंद्रलोक तक पहुँचने की कल्पना लेकर समाज को मुर्ख बनाने की चेष्टा कर रहे है|

आगे आने वाले दो सौ वर्ष संसार में आध्यात्मिक विकास के लिए उतने ही मत्वपूर्ण होंगे जितने महत्वपूर्ण पिछले दो सौ वर्ष भौतिक विज्ञान के विकास के लिए रहे है| मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, मठ व चर्चों की दीवारों में जो लोग धर्म को बाँध कर रखना चाहते है उनके हौसलें इस तरह से पस्त होंगे, जिनकी आज लोग कल्पना भी नहीं कर पा रहे है| इन धर्म के नाम पर ठगी के अखाड़ों को किसी को नष्ट करने की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी| समाज द्वारा इन्हें सभी प्रकार से परित्यक्त कर दिया जावेगा| जिस प्रकार रथ,हाथी व घोड़े समाज द्वारा छोड़ दिए गए है|

धर्म व जाती के नाम पर चलने वाले अखाड़ों के भीतर घुसकर यदि हम देखने की चेष्टा करें तो न वहां हमें जीवन दिखाई देगा और न ही सौंदर्य| जीवन से विहीन, विशाल भवनों व किलों की दुर्गति आज हम देख रहे है वही गति इन धर्म के नाम पर चलाये जाने वाले संगठनों की होगी| वे स्वत: ही खंडहर बनकर लोगों के द्वारा छोड़ दिए जायेंगे| जिन लोगों में जीवन जीवन है, उन्हें चाहिए कि सम्यक रूप से स्वयं पर व समाज व सामाजिक संगठनों पर दृष्टि डाले| इन खंडहरों को का जो स्वरूप है, उसे बचाया नहीं जा सकता| इस तथ्य को स्वीकार कर लेने के बाद ही नव निर्माण का सूत्रपात होगा|

नव निर्माण का प्रयोजन केवल एक ही हो सकता है| अपनी परम्परागत साधना व आराधना पद्धतियों कि खोज तथा उनका अनुसरण कर श्रेष्ठ व्यक्तित्व का निर्माण| जो भी व्यक्ति, समाज या धर्म इस कार्य को कर लेगा, वही आने वाले समय में जीवित रहेगा,विकसित रहेगा व संसार पर छा जायेगा| वह समय दूर नहीं है, जब आध्यात्मिक शक्तियों से संपन्न लोग उसी तरह से छा जायेंगे, जिस प्रकार आज भौतिकवादी छाये हुए है|

Tuesday, 24 January 2012

!!---हिंदुत्व और भारतीयता---!!

लगभग तीस भाषाओँ और तीन सौ बोलियों वाले भारतवर्ष के एकता का सूत्र क्या है? क्यों चावल को मुख्य भोजन मानने वाला बंगाल, रोटी खाने वाले पंजाब के साथ वन्दे मातरम गा लेता है. कुछ विरोधाभाषों के बाद भी आखिर तमिल और गुजरती के मध्य एकता के सूत्र क्या हैं? क्यों जब महाराष्ट्र में बिहारियों पर हमला हुआ तो विरोध में मराठी हीं उठ खड़े हुए ? वास्तव में इन तमाम विरोधाभाषों और भिन्नताओं के बीच, भारत के एकता का सूत्र है क्या ? जितना भी सोचिये, जितना भी विचार कर लीजिये, घूम-फिर कर उत्तर यही आएगा कि हिमाचल के पहाड़ों में रहने वालों और केरल के समुद्रतट पर रहने वाले लोगों के मध्य एक हीं सूत्र है जो उन्हें जोड़ता है, वो है हमारा धर्म - हिंदुत्व . यह हिंदुत्व हीं है जो सभी विरोधाभाषों के बीच हमें जोड़ता है और हमें भारतीय बनाता है . अर्थात यह हिंदुत्व हीं है जो भारत की आत्मा है. वास्तव में हिंदुत्व शब्द भारतीयता का पर्यायवाची शब्द है.आज हमारे लिए राष्ट्रवाद की वही परिभाषा है, जो योरोप ने अपने लिए तय किया था. लगभग सभी योरोप देशों में इसाई मत हीं बहुमत में है, फिर भी योरोप एक देश नहीं. इसका कारण भाषाई विभेद हीं हैं. लेकिन भाषा, खानपान अथवा रहनसहन हमारे राष्ट्रवाद के मध्य कभी नहीं आया. हमारी तुलना तुलना किसी अन्य देश अथवा भूभाग से नहीं कि जा सकती है क्योंकि हमारी सोच और संस्कृति आयातित ना हो कर मौलिक है और दो मौलिक विचारधारा में अंतर होना स्वाभाविक हीं है. आश्चर्य से भी अधिक तो यह दुखद बात है कि विश्वगुरु भारतवर्ष को राष्ट्रवाद के मानदंड वहां से लाना पड़ा,जहाँ सभ्यता के जन्म होने से पहले हीं भारतवर्ष के राष्ट्र के रूप में परिणत ही चूका था. वास्तव में राष्ट्र के रूप में हमारी स्थिति अद्वितीय है. हमारे देश में राष्ट्र का आधार हीं धर्म है, धर्म क्या - हिंदुत्व! हिंदुत्व क्या - जीवन के अंतिम लक्ष्य के प्रति एकरूपता. तो फिर यह स्वीकार करने में संकोच कैसा कि हिंदुत्व हीं भारतीयता है.महर्षि अरविंद घोष ने कहा है "जब -जब, जहाँ कहीं भी हिन्दू धर्म का क्षरण हुआ है, अखंड भारतवर्ष सिकुरता गया है". उदहारण के लिए ब्रह्मा देश (मयन्मार) से लेकर उपगणस्थान (अफगानिस्तान) से लेकर आज का पाकिस्तान और बंगलादेश भी है. जो खंडित भारतवर्ष आज बचा है वो भी इसलिए कि इस भूमि पर सनातनधर्मियों की बहुलता है. स्वामी विवेकानंद जी ने भी कहा था "जो हिंदुत्व को छोड़ा तो तुम्हारा अंत निश्चित है".जब कांग्रेस के दुर्नीतियों के फलस्वरूप, 1947 में देश पर विभाजन आया और करोडो हिन्दुओं को तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान(अब बंगलादेश) और पशिमी पाकिस्तान से बलपूर्वक हटाया गया तो, उन्होंने भारतभूमि का रुख किया. आज भी पाकिस्तान अथवा बंगलादेश में हिन्दू पर अत्याचार होता है तो वे भारत का रुख करते हैं. प्रश्न है कि कराची के चावल व्यापारी जो हाल में हीं भारत में, अपना सबकुछ छोड़, शरण लेने आये हैं, वे भारत हीं क्यों आये ? क्यों नहीं इरान अथवा अफगानिस्तान चले गए? आज भी बंगलादेश में त्रस्त हिन्दू भारत का हीं रुख क्यों करते हैं, चीन अथवा मयन्मार का क्यों नहीं? आप सोचेंगे तो जवाब यही आएगा कि भारत में उन्हें हिन्दुओं के लिए एक स्वाभाविक शरण स्थली दिखती है. जब कि सच्चाई तो यह है कि हमारा देश घोषित तौर पर धर्मनिरपेक्ष है.आज जो हमारा खंडित भारत बचा है उसमे भी अलगाववाद की आवाज उठ रही हैं. लेकिन आवाज भी सिर्फ वही उठती है जहाँ हिन्दू अल्पसंख्यक हैं. भले कई बार तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आन्दोलन हुए हों. लेकिन कह्भी भारत को विभाजित करने जैसी भावना नहीं दिखी. भूलवश भी किसी हिन्दू बहुल राज्य के राजनीतिक संगठन ने भारत के अस्तित्व पर सवाल उठाने का साहस नहीं किया. लेकिन हिन्दुओं के अल्प संख्या वाले राज्यों में यह आम बात है.जब वीर सावरकर ने कहा कि धर्मान्तरण हीं राष्ट्रान्तरण है तो उनका कांग्रेस के चमचो ने बड़ा विरोध किया. परन्तु जब हम कश्मीर से उत्तर-पूर्व तक धर्मान्तरण में राष्ट्रान्तरण का बिज देख रहे हैं तो भला इस सत्य को स्वीकार करने से इनकार कैसे करें.इस भारतभूमि में, भारत का होना ना होना, हम हिन्दुओं के अतिरिक्त, किसी के लिए महत्व नहीं रखता. देश के बहुसंख्य मुसलमानों के लिए तो सम्पूर्ण भारतवर्ष को पाकिस्तान बनाना आज भी स्वप्न है. 1947 में विभाजन के पहले, हुआ आखिरी चुनाव पृथक निर्वाचन पद्धति के साथ हुआ था. यानि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में मुसलमानों के लिए सीटें आरक्षित थी, जहाँ उम्मीदवार भी मुसलमान होते थे और मतदाता भी मुसलमान हीं हो सकते थे. कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने सभी मुस्लिम आरक्षित सीटों पर उम्मीदवार दिया था. कांग्रेस ने घोषित किया था कि यदि वे चुनाव जीत गए तो फिर देश नहीं बटेगा. वहीँ मुस्लिम लीग, अपने एक सूत्री मांग - भारत विभाजन के साथ मुकाबले में उतरा था. जो चुनाव परिणाम आये, वे चौकानेवाले थे. कांग्रेस को मुस्लिमों के लिए आरक्षित सीटों पर भरी धक्का लगा था. जो सीटें कांग्रेस ने मुस्लिम कोटे की जीती भी थी, वे पख्तून क्षेत्र में थी (संभव है ऐसा सीमांत गाँधी के उन क्षेत्रों में प्रभाव के कारण हुआ हो). लेकिन उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम, बिहार सहित सम्पूर्ण भारत में मुस्लिम लीग का झंडा फहराया था. अर्थात वर्त्तमान भारत में रह रहे मुस्लिमों और उनके पूर्वजों ने पाकिस्तान को चुना था. मौलाना अबुल कलम आजाद ने भी अपनी पुस्तक में इस पर चर्चा कि है कि विभाजन में जब उत्तर प्रदेश, बंगाल और बिहार को पाकिस्तान में नहीं मिलाया जा सका तो मुसलमान हताश थे. वे आजाद से मिले तो आजाद ने उन्हें भारत में हीं रहने और भारत देश के साथ वफ़ादारी निभाने कि सलाह दी.लेकिन सच्चाई कुछ और हीं है. सुहरावर्दी ने सम्पूर्ण बंगाल को पाकिस्तान बनाना चाहा था. उसने सोनार बांग्ला (स्वर्ण बंगाल) का नारा दिया, लेकिन श्यामा प्रसाद मुख़र्जी के प्रभाव के कारण वह असफल रहा. तब सुहरावर्दी ने मुसलमानों से पश्चिम बंगाल में हीं रह कर ऐसी स्थिति बनाने कि मांग कि जिससे एकदिन सम्पूर्ण बंगाल को भारतवर्ष से अलग किया जा सके. यही कहाँइ असम कि भी है. हम सबको एक बात समझने कि जरूरत है कि वर्तमान भारत के मुसलमानों ने यदि अखंड भारत चाहा होता तो भारत का विभाजन नहीं होता. विभाजन का आधार हीं यही था कि लगभग ९५ प्रतिशत मुसलमानों ने अलग देश चाहा था. आज कि तिथि में यदि आप मुसलमानों की राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता देखना चाहते हैं तो 'वन्दे मातरम' जो कि राष्ट्रगीत है, के प्रति उनकी भावना को देखिये और समझिये.मैं कई बार सोचता हूँ कि भला सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में भारत हीं एक मात्रा ऐसा देश क्यों है, जहाँ आप जितने ऊँचे सुर में चाहें, धर्मनिरपेक्षता का नारा लगा सकते हैं. क्यों हिन्दू यह सवाल नहीं करताकि विभाजन के बाद पकिसन में 11,000 मंदिर तोड़ दिए गए तो हम एक विवादित ढांचा (मस्जिद नहीं) को तोड़कर राष्ट्रपुरुष मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का मंदिर क्यों नहीं बना सकते? क्यों हिन्दू यह सवाल नहीं करता कि 1949 में जब पाकिस्तान में 18 प्रतिशत हिन्दू जनसँख्या थी और बंगलादेश में 35 प्रतिशत तो आज वे सब कहाँ विलुप्त हो गए? पाकिस्तान और बंगलादेश कि बात तो छोडिये, हिन्दू तो अपने हीं देश, कश्मीर में हीं हजारो मंदिरों के तोड़े जाने पर सवाल नहीं करते. वे तो यह भी नहीं पूछते कि जब 1950 में पश्चिम बंगाल में मुसलमान मात्रा 10 प्रतिशत थे तो आज 30 प्रतिशत क्यों और कैसे हो गए और यही हाल बिहार, उत्तर प्रदेश और असम का भी कैसे हो रहा है ? मेरे प्रश्न का उत्तर भी हिंदुत्व में हीं है. हिंदुत्व में स्वयं हीं इतने आलोडन हैं कि इसे कट्टरता कि सीमा में कभी बंधा हीं नहीं गया और ह्रदय के द्वार उदारता के सुगन्धित वायु के लिए खुले रखे गए. वास्तव में हिंदुत्व religion नहीं है, यह धर्म है. religion हिंदी में संप्रदाय के समक्ष ठहरता है, वह धर्म का अंग्रेजी अर्थ कभी नहीं हो सकता. इसी तरह इसाइयत अथवा इस्लाम धर्म नहीं हैं, ये संप्रदाय हैं. सम्प्रदायों में एक विशेष नियम होता है, उनसे अलग जाने कि आज्ञा किसी को नहीं होती. सम्पूर्ण इस्लाम कुछेक सौ पन्नो के कुरान पर आधारित है, जैसे हीं कोई मुसलमान 2000 वर्ष पूर्व अरब देशों के कबीलाई सभ्यता के लिए लिखे गए कुरान से अलग आचरण करता है, उसे इस्लाम से बाहर कर दिया जाता है. कमोबेश यही हालात इसाई धर्म कि भी है. दुसरे, सभी संप्रदाय में अपनी संख्या बढ़ने कि होड़ लगी रहती है. मुसलमान इसके लिए जिहाद करते हैं तो इसाई अपने चर्च और मिशनरियों का सहारा लेते हैं. लेकिन क्या किसी ने कभी सुना है कि धर्मविरुद्ध आचरण के दोषी पाए जाने पर हिन्दू धर्म से किसी का निष्काशन हुआ है? क्या ऐसी कोई पुस्तक हमारे धर्मगुरुओं ने परिभाषित कि है जिसके विचारों को बिना सोचे समझे अमल में लाना हमारे लिए हिन्दू होने कि पहली शर्त हो? अथवा तलवार के शक्ति से अथवा राजाश्रय का सहारा लेकर ऐसे लोगों के धर्मपरिवर्तन कि कोशिश हुई हो जो पहले हिन्दू ना रहे हों ? उत्तर सिर्फ नहीं में हो सकता है. हाँ बौद्ध, सिख अथवा जैन, संप्रदाय के श्रेणी में आता है.अंततः हमें यह स्वीकार करना चाहिए हिंदुत्व और भारतीयता की स्थिति अन्य समकक्षों से अलग है, और दोनों का हीं सम्बन्ध अटूट है. इतना अटूट कि हिंदुत्व और भारतीयता एक दुसरे के पर्याय हैं. अब चुकी हम हिन्दू हैं, अर्थात भारतीय हैं तो हिंदुत्व अर्थात भारतीयता की रक्षा का और अखंड भारत के अखंड स्वप्न को पूर्ण करने का कर्तब्य भी हमारी हीं है.   !वन्दे मातरम! जय श्री राम!

Thursday, 19 January 2012

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर और इस्लाम पर उनके विचार क्या है ?

बाबा साहब  दलित को जितनी दूरी ब्रह्मण वाद से  रखने के पक्ष में थे  उससे कही ज्यादा  दूरी वो  दलित को इस्लाम से रखने के पक्ष में थे,इस्लाम के सम्बन्ध में स्वयं बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर के विचार|
१. हिन्दू काफ़िर सम्मान के योग्य नहीं-''मुसलमानों के लिए हिन्दू काफ़िर हैं, और एक काफ़िर सम्मान के योग्य नहीं है। वह निम्न कुल में जन्मा होता है, और उसकी कोई सामाजिक स्थिति नहीं होती। इसलिए जिस देश में क़ाफिरों का शासनहो, वह मुसलमानों के लिए दार-उल-हर्ब है ऐसी ...सति में यह साबित करने के लिए और... सबूत देने की आवश्यकता नहीं है कि मुसलमान हिन्दू सरकार के शासन को स्वीकार नहीं करेंगे।'' (पृ. ३०४)

२. मुस्लिम भ्रातृभाव केवल मुसलमानों के लिए-''इस्लाम एक बंद निकाय की तरह है, जो मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच जो भेद यह करता है, वह बिल्कुल मूर्त और स्पष्ट है। इस्लाम का भ्रातृभाव मानवता का भ्रातृत्व नहीं है, मुसलमानों का मुसलमानों से ही भ्रातृभाव मानवता का भ्रातृत्व नहीं है, मुसलमानों का मुसलमानों से ही भ्रातृत्व है। यह बंधुत्व है, परन्तु इसका लाभ अपने ही निकाय के लोगों तक सीमित है और जो इस निकाय से बाहर हैं, उनके लिए इसमें सिर्फ घृणा ओर शत्रुता ही है। इस्लाम का दूसरा अवगुण यह है कि यह सामाजिक स्वशासन की एक पद्धति है और स्थानीय स्वशासन से मेल नहीं खाता, क्योंकि मुसलमानों की निष्ठा, जिस देश में वे रहते हैं, उसके प्रति नहीं होती, बल्कि वह उस धार्मिक विश्वास पर निर्भर करती है, जिसका कि वे एक हिस्सा है। एक मुसलमान के लिए इसके विपरीत या उल्टे सोचना अत्यन्त दुष्कर है। जहाँ कहीं इस्लाम का शासन हैं, वहीं उसका अपना विश्वासहै। दूसरे शब्दों में, इस्लाम एक सच्चे मुसलमानों को भारत को अपनी मातृभूमि और हिन्दुओं को अपना निकट सम्बन्धी मानने की इज़ाजत नहीं देता। सम्भवतः यही वजह थी कि मौलाना मुहम्मद अली जैसे एक महान भारतीय, परन्तु सच्चे मुसलमान ने, अपने, शरीर को हिन्दुस्तान की बजाए येरूसलम में दफनाया जाना अधिक पसंद किया।''

३. एक साम्प्रदायिक और राष्ट्रीय मुसलमान में अन्तर देख पाना मुश्किल-''लीग को बनाने वाले साम्प्रदायिक मुसलमानों और राष्ट्रवादी मुसलमानों के अन्तर को समझना कठिन है। यह अत्यन्त संदिग्ध है कि राष्ट्रवादी मुसलमान किसी वास्तविक जातीय भावना, लक्ष्य तथा नीति से कांग्रेस के साथ रहते हैं, जिसके फलस्वरूप वे मुस्लिम लीग् से पृथक पहचाने जाते हैं। यह कहा जाता है कि वास्तव में अधिकांश कांग्रेसजनों की धारण है कि इन दोनों में कोई अन्तर नहीं है, और कांग्रेस के अन्दर राष्ट्रवादी मुसलमानों की स्थिति साम्प्रदायिक मुसलमानों की सेना की एक चौकी की तरह है। यह धारणा असत्य प्रतीत नहीं होती। जब कोई व्यक्ति इस बात को याद करता है कि राष्ट्रवादी मुसलमानों के नेता स्वर्गीय डॉ. अंसारी ने साम्प्रदायिक निर्णय का विरोध करने से इंकार किया था, यद्यपिकांग्रेस और राष्ट्रवादी मुसलमानों द्वारा पारित प्रस्ताव का घोर विरोध होने पर भी मुसलमानों को पृथक निर्वाचन उपलब्ध हुआ।'' (पृ. ४१४-४१५)

४. भारत में इस्लाम के बीज मुस्लिम आक्रांताओं ने बोए-''मुस्लिम आक्रांता निस्संदेह हिन्दुओं के विरुद्ध घृणा के गीत गाते हुए आए थे। परन्तु वे घृणा का वह गीत गाकर और मार्ग में कुछ मंदिरों को आग लगा कर ही वापस नहीं लौटे। ऐसा होता तो यह वरदान माना जाता। वे ऐसे नकारात्मक परिणाम मात्र से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने इस्लाम का पौ���ा लगाते हुए एक सकारात्मक कार्य भी किया। इस पौधे का विकास भी उल्लेखनीय है। यह ग्रीष्म में रोपा गया कोई पौधा नहीं है। यह तो ओक (बांज) वृक्ष की तरह विशाल और सुदृढ़ है। उत्तरी भारत में इसका सर्वाधिक सघन विकास हुआ है। एक के बाद हुए दूसरे हमले ने इसे अन्यत्र कहीं को भी अपेक्षा अपनी 'गाद' से अधिक भरा है और उन्होंने निष्ठावान मालियों के तुल्य इसमें पानी देने का कार्य किया है। उत्तरी भारत में इसका विकास इतना सघन है कि हिन्दू और बौद्ध अवशेष झाड़ियों के समान होकर रह गए हैं; यहाँ तक कि सिखों की कुल्हाड़ी भी इस ओक (बांज) वृक्ष को काट कर नहीं गिरा सकी।'' (पृ. ४९)

 ५. मुसलमानों की राजनीतिक दाँव-पेंच में गुंडागर्दी-''तीसरी बात, मुसलमानों द्वारा राजनीति में अपराधियों के तौर-तरीके अपनाया जाना है। दंगे इस बात के पर्याप्त संकेत हैं कि गुंडागिर्दी उनकी राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है।'' (पृ. २६७)

६. हत्यारे धार्मिक शहीद-''महत्व की बात यह है कि धर्मांध मुसलमानों द्वारा कितने प्रमुख हिन्दुओं की हत्या की गई। मूल प्रश्न है उन लोगों के दृष्टिकोण का, जिन्होंने यह कत्ल किये। जहाँ कानून लागू किया जा सका, वहाँ हत्यारों को कानून के अनुसार सज़ा मिली; तथापि प्रमुख मुसलमानों ने इन अपराधियों की कभी निंदा नहीं की। इसके वपिरीत उन्हें 'गाजी' बताकर उनका स्वागत किया गया और उनके क्षमादान के लिए आन्दोलन शुरू कर दिए गए। इस दृष्टिकोण का एक उदाहरण है लाहौर के बैरिस्टर मि. बरकत अली का, जिसने अब्दुल कयूम की ओर से अपील दायर की। वह तो यहाँ तक कह गया कि कयूम नाथूराम की हत्या का दोषी नहीं है, क्योंकि कुरान के कानून के अनुसार यह न्यायोचित है। मुसलमानों का यह दृष्टिकोण तो समझ में आता है, परन्तु जो बात समझ में नहीं आती, वह है श्री गांधी का दृष्टिकोण।''(पृ. १४७-१४८)

 ७. हिन्दू और मुसलमान दो विभिन्न प्रजातियां-''आध्याम्कि दृष्टि से हिन्दू और मुसलमान केवल ऐसे दो वर्ग या सम्प्रदाय नहीं हैं जैसे प्रोटेस्टेंट्‌स और कैथोलिक या शैव और वैष्णव, बल्कि वे तो दो अलग-अलग प्रजातियां हैं।'' (पृ. १८५)

८. इस्लाम और जातिप्रथा-''जाति प्रथा को लीजिए। इस्लाम भ्रातृ-भाव की बात कहता है। हर व्यक्ति यही अनुमान लगाता है कि इस्लाम दास प्रथा और जाति प्रथा से मुक्त होगा। गुलामी के बारे में तो कहने की आवश्यकता ही नहीं। अब कानून यह समाप्त हो चुकी है। परन्तु जब यह विद्यमान थी, तो ज्यादातर समर्थन इसे इस्लाम और इस्लामी देशों से ही मिलता था। कुरान में पैंगबर ने गुलामों के साथ उचित इस्लाम में ऐसा कुछ भी नहीं है जो इस अभिषाप के उन्मूलन के समर्थन में हो। जैसाकि सर डब्ल्यू. म्यूर ने स्पष्ट कहा है-

''....गुलाम या दासप्रथा समाप्त हो जाने में मुसलमानों का कोई हाथ नहीं है, क्योंकि जब इस प्रथा के बंधन ढीले करने का अवसर था, तब मुसलमानों ने उसको मजबूती से पकड़ लिया..... किसी मुसलमान पर यह दायित्व नहीं है कि वह अपने गुलामों को मुक्त कर दें.....''

''परन्तु गुलामी भले विदा हो गईहो, जाति तो मुसलमानों में क़ायम है। उदाहरण के लिए बंगाल के मुसलमानों की स्थिति को लिया जा सकता है। १९०१ के लिए बंगाल प्रांत के जनगणना अधीक्षक ने बंगाल के मुसलमानों के बारे में यह रोचक तथ्य दर्ज किए हैं :

''मुसलमानों का चार वर्गों- शेख, सैयद, मुग़ल और पठान-में परम्परागत विभाजन इस पांत (बंगाल) में प्रायः लागू नहीं है। मुसलमान दो मुखय सामाजिक विभाग मानते हैं-१. अशरफ अथवा शरु और २. अज़लफ। अशरफ से तात्पर्य है 'कुलीन', और इसमें विदेशियों के वंशज तथा ऊँची जाति के अधर्मांतरित हिन्दू शामिल हैं। शेष अन्य मुसलमान जिनमें व्यावसायिक वर्ग और निचली जातियों के धर्मांतरित शामिल हैं, उन्हें अज़लफ अर्थात्‌ नीचा अथवा निकृष्ट व्यक्ति माना जाता है। उन्हें कमीना अथवा इतर कमीन या रासिल, जो रिजाल का भ्रष्ट रूप है, 'बेकार' कहा जाता है। कुछ स्थानों पर एक तीसरा वर्ग 'अरज़ल' भी है, जिसमें आने वाले व्यक्ति सबसे नीच समझे जाते हैं। उनके साथ कोई भी अन्य मुसलमान मिलेगा-जुलेगा नहीं और न उन्हें मस्जिद और सार्वजनिक कब्रिस्तानों में प्रवेश करने दिया जाता है।

इन वर्गों में भी हिन्दुओं में प्रचलित जैसी सामाजिक वरीयताऔर जातियां हैं।
 १. 'अशरफ' अथवा उच्च वर्ग के मुसलमान (प) सैयद, (पप) शेख, (पपप) पठान, (पअ) मुगल, (अ) मलिक और (अप) मिर्ज़ा।

२. 'अज़लफ' अथवा निम्न वर्ग के मुसलमान

(i) खेती करने वाले शेख और अन्य वे लोग जो मूलतः हिन्दू थे, किन्तु किसी बुद्धिजीवी वर्ग से सम्बन्धित नहीं हैं और जिन्हें अशरफ समुदाय, अर्थात्‌ पिराली और ठकराई आदि में प्रवेश नहीं मिला है।

( ii) दर्जी, जुलाहा, फकीर और रंगरेज।

(iii) बाढ़ी, भटियारा, चिक, चूड़ीहार, दाई, धावा, धुनिया, गड्‌डी, कलाल, कसाई, कुला, कुंजरा, लहेरी, माहीफरोश, मल्लाह, नालिया, निकारी।

(iv) अब्दाल, बाको, बेडिया, भाट, चंबा, डफाली, धोबी, हज्जाम, मुचो, नगारची, नट, पनवाड़िया, मदारिया, तुन्तिया।

 ३. 'अरजल' अथवा निकृष्ट वर्ग
 भानार, हलालखोदर, हिजड़ा, कसंबी, लालबेगी, मोगता, मेहतर।

जनगणना अधीक्षक ने मुस्लिम सामाजिक व्यवस्था के एक और पक्ष का भी उल्लेख किया है। वह है 'पंचायत प्रणाली' का प्रचलन। वह बताते हैं :

''पंचायत का प्राधिकार सामाजिक तथा व्यापार सम्बन्धी मामलों तक व्याप्त है और........अन्य समुदायों के लोगों से विवाह एक ऐसा अपराध है, जिस पर शासी निकायकार्यवाही करता है। परिणामत: ये वर्ग भी हिन्दू जातियों के समान ही प्रायः कठोर संगोती हैं, अंतर-विवाह पर रोक ऊंची जातियों से लेकर नीची जातियों तक लागू है। उदाहरणतः कोई घूमा अपनी ही जाति अर्थात्‌ घूमा में ही विवाह कर सकता है। यदि इस नियम की अवहेलना की जाती है तो ऐसा करने वाले को तत्काल पंचायत के समक्ष पेश किया जाता है। एक जाति का कोई भी व्यक्ति आसानी से किसी दूसरी जाति में प्रवेश नहीं ले पाता और उसे अपनी उसी जाति का नाम कायम रखना पड़ता है, जिसमें उसने जन्म लिया है। यदि वह अपना लेता है, तब भी उसे उसी समुदाय का माना जाता है, जिसमें कि उसने जन्म लिया था..... हजारों जुलाहे कसाई का धंधा अपना चुके हैं, किन्तु वे अब भी जुलाहे ही कहे जाते हैं।''

इसी तरह के तथ्य अन्य भारतीय प्रान्तों के बारे में भी वहाँ की जनगणना रिपोर्टों से वे लोग एकत्रित कर सकते हैं, जो उनका उल्लेख करना चाहते हों। परन्तु बंगाल के तयि ही यह दर्शाने के लिए पर्याप्त हैं कि मुसलमानों में जाति प्राणी ही नहीं, छुआछूत भी प्रचलित है।'' (पृ. २२१-२२३)

९. इस्लामी कानून समाज-सुधार के विरोधी-''मुसलमानों में इन बुराइयों का होना दुखदहैं। किन्तु उससे भी अधिक दुखद तथ्य यह है कि भारत के मुसलमानों में समाज सुधार का ऐसा कोई संगठित आन्दोलन नहीं उभरा जो इन बुराईयों का सफलतापूर्वक उन्मूलन कर सके। हिन्दुओं में भी अनेक सामाजिक बुराईयां हैं। परन्तु सन्तोषजनक बात यह है कि उनमें से अनेक इनकी विद्यमानता के प्रति सजग हैं और उनमें से कुछ उन बुराईयों के उन्मूलन हेतु सक्रिय तौर पर आन्दोलन भी चला रहे हैं। दूसरी ओर, मुसलमान यह महसूस ही नहीं करते कि ये बुराईयां हैं। परिणामतः वे उनके निवारण हेतु सक्रियता भी नहीं दर्शाते। इसके विपरीत, वे अपनी मौजूदा प्रथाओं में किसी भी परिवर्तन का विरोध करते हैं। यह उल्लेखनीय है कि मुसलमानों ने केन्द्रीय असेंबली में १९३० में पेश किए गए बाल विवाह विरोधी विधेयक का भी विरोध किया था, जिसमें लड़की की विवाह-योग्य आयु १४ वर्ष् और लड़के की १८ वर्ष करने का प्रावधान था। मुसलमानों ने इस विधेयक का विरोध इस आधार पर किया कि ऐसा किया जाना मुस्लिम धर्मग्रन्थ द्वारा निर्धारित कानून के विरुद्ध होगा। उन्होंने इस विधेयक का हर चरण पर विरोध ही नहीं किया, बल्कि जब यह कानून बन गया तो उसके खिलाफ सविनय अवज्ञाअभियान भी छेड़ा। सौभाग्य से उक्त अधिनियम के विरुद्ध मुसलमानों द्वारा छोड़ा गया वह अभ्यिान फेल नहीं हो पाया, और उन्हीं दिनों कांग्रेस द्वारा चलाए गए सविनय अवज्ञा आन्दोलन में समा गया। परन्तु उस अभियान से यह तो सिद्ध हो ही जाता है कि मुसलमान समाज सुधार के कितने प्रबल विरोधी हैं।'' (पृ. २२६)
१०. मुस्लिम राजनीतिज्ञों द्वारा धर्मनिरपेक्षता का विरोध-''मुस्लिम राजनीतिज्ञ जीवन के धर्मनिरपेक्ष पहलुओं को अपनी राजनीति का आधार नहीं मानते, क्योंकि उने लिए इसका अर्थ हिन्दुओं के विरुद्ध अपने संघर्ष में अपने समुदाय को कमजोर करना ही है। गरीब मुसलमान धनियों से इंसाु पाने के लिए गरीब हिन्दुओं के साथ नहीं मिलेंगे। मुस्लिम जोतदार जमींदारों के अन्याय को रोकने के लिए अपनी ही श्रेणी के हिन्दुओं के साथ एकजुट नहीं होंगे। पूंजीवाद के खिलाफ श्रमिक के संघर्ष में मुस्लिम श्रमिक हिन्दू श्रमिकों के साथ शामिल नहीं होंगे। क्यों ? उत्तर बड़ा सरल है। गरीब मुसलमान यह सोचता है कि यदि वह धनी के खिलाफ गरीबों के संघर्ष में शामिल होता है तो उसे एक धनी मुसलमान से भी टकराना पड़ेगा। मुस्लिम जोतदार यह महसूस करते हैं कि यदि वे जमींदारों के खिलाफ अभियान में योगदान करते हैं तो उन्हें एक मुस्लिम जमींदार के खिलाफ भी संघर्ष करना पड़ सकता है। मुसलमान मजदूर यह सोचता है कि यदि वह पूंजीपति के खिलाफ श्रमिक के संघर्ष में सहभागी बना तो वह मुस्लिम मिल-मालिक की भावाओं को आघात पहुंचाएगा। वह इस बारे में सजग हैं कि किसी धनी मुस्लिम, मुस्लिम ज़मींदार अथवा मुस्लिम मिल-मालिक को आघात पहुंचाना मुस्लिम समुदाय को हानि पहुंचाना है और ऐसा करने का तात्पर्य हिन्दू समुदाय के विरुद्ध मुसलमानों के संघर्ष को कमजोर करना ही होगा।'' (पृ. २२९-२३०)
११. मुस्लिम कानूनों के अनुसार भरत हिन्दुओं और मुसलमानों की समान मातृभूमि नहीं हो सकती-''मुस्लिम धर्म के सिद्धान्तों के अनुसार, विश्व दो हिस्सो में विभाजित है-दार-उल-इस्लाम तथा दार-उल-हर्ब। मुस्लिम शासित देश दार-उल-इस्लाम हैं। वह देश जिसमें मुसलमान सिर्फ रहते हैं, न कि उस पर शासन करते हैं, दार-उल-हर्ब है। मुस्लिम धार्मिक कानून का ऐसा होने के कारण भारत हिन्दुओं तथा मुसलमानों दोनों की मातृभूमि नहीं हो सकती है। यह मुसलमानों की धरती हो सकती है-किन्तु यह हिन्दुओं और मुसलमानों की धरती, जिसमें दोनोंसमानता से रहें, नहीं हो सकती। फिर, जब इस पर मुसलमानों का शासन होगा तो यह मुसलमानों की धरती हो सकती है। इस समय यह देश गैर-मुस्लिम सत्ता के प्राधिकार के अन्तर्गत हैं, इसलिए मुसलमानों की धरती नहीं हो सकती। यह देश दार-उल-इस्लाम होने की बजाय दार-उल-हर्ब बन जाताप है। हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि यह दृष्टिकोण केवल शास्त्रीय है। यह सिद्धान्त मुसलमानों को प्रभावित करने में बहुत कारगर कारण हो सकता है।'' (पृ. २९६-२९७)

१२. दार-उल-हर्व भारत को दार-उल-इस्लाम बनाने के लिए जिहाद-''यह उल्लेखनीय है कि जो मुसलमान अपने आपको दार-उल-हर्ब में पाते हैं, उनके बचाव के लिए हिजरत ही उपाय नहीं हैं मुस्लिम धार्मिक कानून की दूसरी आज्ञा जिहाद (धर्म युद्ध) है, जिसके तहत हर मुसलमान शासक का यह कर्त्तव्य हो जाता है कि इस्लाम के शासन का तब तक विस्तार करता रहे, जब तक सारी दुनिया मुसलमानों के नियंत्रण में नहीं आ जाती। संसार के दो खेमों में बंटने की वजह से सारे देश या दो दार-उल-इस्लाम (इस्लाम का घर) या दार-उल-हर्ब (युद्ध का घर) की श्रेणी में आते हैं। तकनीकी तौर पर हर मुस्लिम शासक का, जो इसके लिए सक्षम है, कर्त्तव्य है कि वह दार-उल-हब्र कोदार-उल-इस्लाम में बदल दे; और भारत में जिस तरह मुसलमानों के हिज़रत का मार्ग अपनाने के उदाहरण हैं, वहाँ ऐसेस भी उदाहरण हैं कि उन्होंने जिहाद की घोषणा करने में संकोच नहीं किया।''
''तथ्य यह है कि भारत, चाहे एक मात्र मुस्लिम शासन के अधीन न हो, दार-उल-हर्ब है, और इस्लामी सिद्धान्तों के अनुसार मुसलमानों द्वारा जिहाद की घोषणा करना न्यायसंगत है। वे जिहाद की घोषणा ही नहीं कर सकते, बल्कि उसकी सफलता के लिए विदेशी मुस्लिम शक्ति की मदद भी ले सकते हैं, और यदि विदेशी मुस्लिम शक्ति जिहाद की घोषणा करना चाहती है तो उसकी सफलता के लिए सहायता दे सकते हैं।'' (पृ. २९७-२९८)

१३. हिन्दू-मुस्लिम एकता असफल क्यों रही ?-''हिन्दू-मुस्लिम एकता की विफलता का मुखय कारण इस अहसास का न होना है कि हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच जो भिन्नताएं हैं, वे मात्र भिन्नताएं ही नहीं हैं, और उनके बीच मनमुटाव की भावना सिर्फ भौतिक कारणों से ही नहीं हैं इस विभिन्नता का स्रोत ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक दुर्भावना है, और राजनीतिक दुर्भावना तो मात्र प्रतिबिंब है। ये सारी बातें असंतोष का दरिया बना लेती हैं जिसका पोषण उन तमाम बातों से होता है जो बढ़ते-बढ़ते सामान्य धाराओं को आप्लावित करता चला जाता हैं दूसरे स्रोत से पानी की कोई भी धारा, चाहे वह कितनी भी पवित्र क्यों न हो, जब स्वयं उसमें आ मिलती है तो उसका रंग बदलने के बजाय वह स्वयं उस जैसी हो जाती हैं दुर्भावना का यह अवसाद, जो धारा में जमा हो गया हैं, अब बहुत पक्का और गहरा बन गया है। जब तक ये दुर्भावनाएं विद्यमान रहती हैं, तब तक हिन्दू और मुसलमानों के बीच एकता की अपेक्षा करना अस्वाभाविक है।'' (पृ. ३३६)

१४. हिन्दू-मुस्लिम एकता असम्भव कार्य-''हिन्दू-मुस्लिम एकता की निरर्थकता को प्रगट करने के लिए मैं इन शब्दों से और कोई शबदावली नहीं रख सकता। अब तक हिन्दू-मुस्लिम एकता कम-से-कम दिखती तो थी, भले ही वह मृग मरीचिका ही क्यों न हो। आज तो न वह दिखती हे, और न ही मन में है। यहाँ तक कि अब तो गाांी ने भी इसकी आशा छोड़ दी है और शायद अब वह समझने लगे हैं कि यह एक असम्भव कार्य है।'' (पृ. १७८)

१५. साम्प्रदायिक शान्ति के लिए अलपसंखयकों की अदला-बदली ही एक मात्र हल-''यह बात निश्चित है कि साम्प्रदायिक शांति स्थापित करने का टिकाऊ तरीका अल्पसंखयकों की अदला-बदली ही हैं।यदि यही बात है तो फिर वह व्यर्थ होगा कि हिन्दू और मुसलमान संरक्षण के ऐसे उपाय खोजने में लगे रहें जो इतने असुरक्षित पाए गए हैं। यदि यूनान, तुकी और बुल्गारिया जैसे सीमित साधनों वाले छोटे-छोटे देश भी यह काम पूरा कर सके तो यह मानने का कोई कारण नहीं है कि हिन्दुस्तानी ऐसा नहीं कर सकते। फिर यहाँ तो बहुत कम जनता को अदला-बदली करने की आवश्यकता पड़ेगी ओर चूंकि कुछ ही बाधाओं को दूर करना है। इसलिए साम्प्रदायिक शांति स्थापित करने के लिए एक निश्चित उपाय को न अपनाना अत्यन्त उपहासास्पद होगा।'' (पृ. १०१)

१६. विभाजन के बाद भी अल्पसंखयक-बहुसंखयक की समस्या बनी ही रहेगी-''यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए कि पाकिस्तान बनने से हिन्दुस्तान साम्प्रदायिक समस्यासे मुक्त नहीं हो जाएगा। सीमाओं का पुनर्निर्धारण करके पाकिस्तान को तो एक सजातीय देश बनाया जा सकता हे, परन्तु हिन्दुस्तान तो एक मिश्रित देश बना ही रहेगा। मुसलमान समूचे हिन्दुस्तान में छितरे हुए हैं-यद्यपि वे मुखयतः शहरों और कस्बों में केंद्रित हैं। चाहे किसी भी ढंग से सीमांकन की कोशिश की जाए, उसे सजातीय देश नहीं बनायाजा सकता। हिन्दुस्तान को सजातीय देश बनाने काएकमात्र तरीका है, जनसंखया की अदला-बदली की व्यवस्था करना। यह अवश्य विचार कर लेना चाहिए कि जब तक ऐसा नहीं कियाजाएगा, हिन्दुस्तान में बहुसंखयक बनाम अल्पसंखयक की समस्या और हिन्दुस्तान की राजनीति में असंगति पहले की तरह बनी ही रहेगी।'' (पृ. १०३)

All quotations are from pakistan or the parition of india by Dr B.R.Ambedkar, 3rd edition ,1946 BAWS Vol. 8,1990 , govt of maharastra publication; previous name of the book: Thoughts on Pakistan



!!!!इस्लाम हिंदू धर्म की छाया प्रति है क्या ?!!!!

मुसलमान कहते हैं कि कुरान  ईश्वरीय वाणी है तथा यह धर्म अनादि काल से चली आ रही है,परंतु ये बात  आधारहीन तथा तर्कहीन हैं-सबसे पहले तो ये पृथ्वी पर मानव की उत्पत्ति का जो सिद्धान्त देते हैं वो हिंदु धर्म-सिद्धान्त का ही छाया प्रति है| हिन्दू  ग्रंथ के अनुसार ईश्वर ने मनु... तथा सतरूपा को पृथ्वी पर सर्व-प्रथम भेजा था..इसी सिद्धान्त के अनुसार  ये भी कहते हैं कि अल्लाह ने सबसे पहले आदम और हौआ को भेजा.ठीक है...पर आदम शब्द संस्कृत शब्द "आदि" से बना है जिसका अर्थ होता है-सबसे पहले.यनि पृथ्वी पर सर्वप्रथम संस्कृत भाषा अस्तित्व में थी..सब भाषाओं की जननी संस्कृत है ये बात तो कट्टर मुस्लिम भी स्वीकार करते हैं..इस प्रकार आदि धर्म-ग्रंथ संस्कृत में होनी चाहिए अरबी या फारसी में नहीं|


अल्लाह शब्द भी संस्कृत शब्द अल्ला से बना है जिसका अर्थ देवी होता है|
जिस प्रकार हमलोग मंत्रों में "या" शब्द का प्रयोग करते हैं देवियों को पुकारने में जैसे "या देवी सर्वभूतेषु....", "या वीणा वर ...." वैसे ही मुसलमान भी पुकारते हैं "या अल्लाह"..इससे सिद्ध होता है कि ये अल्लाह शब्द भी ज्यों का त्यों वही रह गया बस अर्थ बदल दिया गया|


चूँकि सर्वप्रथम विश्व में सिर्फ संस्कृत ही बोली जाती थी इसलिए धर्म भी एक ही था-वैदिक धर्म.बाद में लोगों ने अपना अलग मत और पंथ बनाना शुरु कर दिया और अपने धर्म(जो वास्तव में सिर्फ मत हैं) को आदि धर्म सिद्ध करने के लिए अपने सिद्धान्त को वैदिक सिद्धान्तों से बिल्कुल भिन्न कर लिया ताकि लोगों को ये शक ना हो कि ये वैदिक धर्म से ही निकला नया धर्म है और लोग वैदिक धर्म के बजाय उस नए धर्म को ही अदि धर्म मान ले..चूँकि मुस्लिम धर्म के प्रवर्त्तक बहुत ज्यादा गम्भीर थे अपने धर्म को फैलाने के लिए और ज्यादा डरे हुए थे इसलिए उसने हरेक सिद्धान्त को ही हिंदु धर्म से अलग कर लिया ताकि सब यही समझें कि मुसलमान धर्म ही आदि धर्म है |


इतने ज्यादा दिनों तक अरबियों का वैदिक संस्कृति के प्रभाव में रहने के कारण लाख कोशिशों के बाद भी वे सारे प्रमाण नहीं मिटा पाए और मिटा भी नही सकते....


भाषा की दृष्टि से तो अनगिणत प्रमाण हैं यह सिद्ध करने के लिए कि अरब इस्लाम से पहले वैदिक संस्कृति के प्रभाव में थे|जैसे कुछ उदाहरण-मक्का-मदीना,मक्का संस्कृत शब्द मखः से बना है जिसका अर्थ अग्नि है तथा मदीना मेदिनी से बना है जिसका अर्थ भूमि है..मक्का मदीना का तात्पर्य यज्य की भूमि है.,ईद संस्कृत शब्द ईड से बना है जिसका अर्थ पूजा होता है.नबी जो नभ से बना है..नभी अर्थात आकाशी व्यक्ति.पैगम्बर "प्र-गत-अम्बर" का अपभ्रंश है जिसका अर्थ है आकाश से चल पड़ा व्यक्ति..




अब शब्दों को छोड़कर इनके कुछ रीति-रिवाजों पर ध्यान देते हैं जो वैदिक संस्कृति के हैं--
ये बकरीद(बकर+ईद) मनाते हैं..बकर को अरबी में गाय कहते हैं यनि बकरीद गाय-पूजा का दिन है.भले ही मुसलमान इर्षा वश  इसे गाय को काटकर और खाकर मनाने लगे..क्यूँ की उन्हें हर चीज वैदिक धर्म से विपरीत दिखानी थी |




जिस तरह हिंदु अपने पितरों को श्रद्धा-पूर्वक उन्हें अन्न-जल चढ़ाते हैं वो परम्परा अब तक मुसलमानों में है जिसे वो ईद-उल-फितर कहते हैं..फितर शब्द पितर से बना है.वैदिक समाज एकादशी को शुभ दिन मानते हैं तथा बहुत से लोग उस दिन उपवास भी रखते हैं,ये प्रथा अब भी है इनलोगों में.ये इस दिन को ग्यारहवीं शरीफ(पवित्र ग्यारहवाँ दिन) कहते हैं,शिव-व्रत जो आगे चलकर शेबे-बरात बन गया,रामध्यान जो रमझान बन गया...इस तरह से अनेक प्रमाण मिल जाएँगे|


काबा भी शिव मंदिर था अभी भी उस मंदिर में सारे हिंदु-रीति रिवाजों का पालन होता है तथा शिवलिंग अभी तक विराजमान है वहाँ..यहाँ आने वाले मुसलमान हिंदु  की तरह सिर के बाल मुंड़वाकर बिना सिलाई किया हुआ एक कपड़ा को शरीर पर लपेट कर काबा के प्रांगण में प्रवेश करते हैं और इसकी सात परिक्रमा करते हैं.यहाँ थोड़ा सा भिन्नता दिखाने के लिए ये लोग वैदिक संस्कृति के विपरीत दिशा में परिक्रमा करते हैं अर्थात हिंदु अगर घड़ी की दिशा में करते हैं तो ये उसके उल्टी दिशा में..पर वैदिक संस्कृति के अनुसार सात ही क्यों.? और ये सब नियम-कानून सिर्फ इसी मस्जिद में क्यों?ना तो सर का मुण्डन करवाना इनके संस्कार में है और ना ही बिना सिलाई के कपड़े पहनना पर ये दोनो नियम हिंदु के अनिवार्य नियम जरुर हैं |


काबा में स्थित काला पत्थर (शिव लिंग का रूप ) जिसे चूमे बिना हज पूरी नहीं  होती|






मुस्लिमो का पवित्र अंक ७८६ भी ॐ से बना है .....कैसे?....यधि कोई संस्कृत जनता हो तो ॐ को पीछे से पढना शुरू


करे  ७८६ बन जायेगा ...और स्पस्ट के लिए चित्र देखें .....



और स्पष्ट देखे और समझे ......की अगर अगर देवनागरी के अंको को उल्टा कर दे तो वो अरबी अंक बन जाते है...




अब देखे अगर ओम को उल्टा कर दे तो वो अल्लाह बन जाता है

Monday, 16 January 2012

सृष्टि का आधार है धर्म

विश्व साहित्य में वैदिक साहित्य का स्थान अद्वितीय है। इसकी वजह यह है कि इसमें वह सब कुछ मिल जाता है, जिसकी आवश्यकता मनुष्य को हर काल में रही है और रहेगी। सबसे अद्भुत बात यह है कि धर्म, संस्कृति और ईश्वर को जिस रूप में यहां मान्यता दी गई है, वैसी मान्यता और कहीं नहीं मिलती है। धर्म की वैसे तो कोई व्याख्या नहीं की जा सकती है, लेकिन यदि इसे एक वाक्य में कहना हो तो कहेंगे-धर्म मनुष्य जीवन को धारण करने और उसे परिष्कृत करने की एक विधि है। और यदि उपनिषद् की भाषा में कहें तो ईश्वरीय यानी प्रकृति के नियमों के अनुसार चलना धर्म है और इसके विपरीत कार्य करना अधर्म है। जिससे जीवन को परिमार्जित किया जा सके और जो जीवन को एक अच्छी कृति का स्वरूप प्रदान करे वह संस्कृति है। इसी तरह ईश्वर वह परम शक्ति है जो हर काल में इस सृष्टि निर्माण का कारण है। मतलब ऐसी शक्ति जो सृष्टि का निर्माण, पालन और विध्वंस करे। ये तीनों एक परम शक्ति हैं। इन तीनों के द्वारा ही मनुष्य सत्यम्, शिवम्और सुंदरम्को प्राप्त कर सकता है। देखा जाय तो तीनों शक्ति कहीं न कहीं एक दूसरे से जुडी होती है। इनका जुडाव जिस रूप में वैदिक साहित्य में प्रतिष्ठित है और विश्व के किसी भी साहित्य में देखने को नहीं मिलता है। धर्म को वैदिक साहित्य में ऋषियों ने जीवन की पूर्ण इकाई माना है। इसमें संस्कृति और ईश्वर दोनों आ जाते हैं। यह इसलिए कि धर्म ही पूर्ण रूप से धारण किया जा सकता है। यजुर्वेद के मुताबिक-सा प्रथमा विश्ववारा।यानी वैदिक संस्कृति ही विश्ववरणीयसंस्कृति है। इसी में संस्कारों को भी समाहित किया गया। सोलह संस्कारों की जैसी व्याख्या भारतीय संस्कृति में है और कहीं भी देखने को नहीं मिलता है। ये सोलह संस्कार जीवन को पूर्ण बनाते हैं। चारों आश्रम और चारों पुरुषार्थ इन संस्कारों का आधार लेकर ही पूरे किए जा सकते हैं। भारतीय विचारकों के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में मनुष्य के जीवन में धर्म ही मुख्य तत्व था। इससे ही सारे सुख प्राप्त किए जाते थे। वर्ण धर्म, राज धर्म, स्त्री धर्म, पुत्र धर्म, आश्रम धर्म और समाज धर्म की भूमिका शुरू से ही महत्वपूर्ण थी और आज भी है। धर्म के बगैर न तो संस्कृति बच सकती है और न ही ईश्वर को ही समझा जा सकता है। धर्म यह बताता है संस्कार के जरिए कैसे ब्रह्मत्वप्राप्त किया जा सकता है। धर्म यह भी बताता है कि अधर्म से कैसे बचा जा सकता है और सत्य-झूठ, न्याय-अन्याय, अहिंसा-हिंसा, प्रेम-घृणा और मानवता-दानवता में क्या अंतर है? विचारकों के अनुसार बिना धर्म के न पुण्य अर्जित किया जा सकता है और न ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। समाज को बेहतर और पूरी धरती को स्वर्ग बनाना है तो धर्म की शरण में जाना ही होगा। जो धर्म की शरण में पहुंच जाता है उसे सुख, आनंद और परमधाम-ये तीनों प्राप्त हो जाते हैं। जो धर्म की शरण में पहुंच जाता है, उसे ईश्वर की अनुकम्पा और जीवन की सार्थकता भी समझ में आ जाती है। इसलिए भगवान वेदव्यासकहते हैं-धर्म ही तप है और धर्म ही ज्ञान है। धर्म ही शक्ति है और धर्म ही भक्ति है। मतलब धर्म के बगैर न तो ईश्वरीय-पथ पर चला जा सकता है और न ही संस्कृति की रक्षा की जा सकती है। इसलिए वेद में धर्म को जीवन-सोपान माना गया है। आज यदि समाज में विकृति आ रही है तो धर्म रूपी यह सोपान टूट रहा है, जिसे बचाने की आवश्यकता है।

Saturday, 14 January 2012

चेतना और मानव धर्म क्या है ?

 ब्रह्मांडीय चेतना प्रत्येक मानव की उद्धारकर्ता है और मानव मस्तिष्क का विकास इसी लौकिक चेतना का ही एक उत्पाद है. ब्रह्मांडीय चेतना के अनुभव की वास्तविक प्रकृति के बारे में तभी जाना जा सकता हैं जब हम एक खुले मस्तिष्क और विनम्रता की भावना के साथ अपनी मानसिक स्थिति का अवलोकन करने का प्रयास करें. प्रत्येक धर्म हमें यही सिखाने का प्रयास करता है.

मेरे विचार और निष्कर्ष अगर सही हैं तो इस समय समाज में स्वंय को समझने से महत्वपूर्ण कोई और विषय नहीं हो सकता जबकि आज का मानव दूसरों को समझने और मारने में ही मगन है. ये कैसी दौड़ है जहाँ जीतने वाला गंतव्य तक अकेला ही पहुंचना चाहता है? मानव मस्तिष्क अभी भी जैविक विकास की स्थिति में है और इस विकास की गति इतनी तेज है कि इसके तूफान ने पूरी सामाजिक और राजनीतिक संरचना को ही तहस-नहस कर दिया है. आज मानव अपने राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिये समाज को विभाजित करता जा रहा है, मुझे तो वह दिन स्मरण करके भय आता है जब समाज में हर व्यक्ति का अपना अलग से धर्म होगा, तब हम जानवरों की तरह अपनी घास खाने में ही व्यस्त रहेंगे और जब ‘शेर’ आयगा तो हम केवल अपनी ही जान बचाने के लिये भागेंगे ना कि एकता के साथ उस का सामना करेंगे.

आज हमें आवश्यकता है अपने-अपने धर्मों को समझते हुए मस्तिष्क के विकास को सकारात्मक पथ पर लाने की, ना कि उस के अधीन हो जाने की. परमात्मा ने मस्तिष्क को जीव-आत्मा के अधीन किया है ना कि जीव-आत्मा को इस स्थूल मस्तिष्क के. दुनिया की स्थिति में निरंतर तनाव और दबाव, एक सामान्य बुद्धि में असंतोष और शांति की कमी, निकट आपदा के कथित पूर्वाभास, औषधियों (ड्रग्स) के व्यापक उपयोग, युवाओं की बगावत, वैवाहिक जीवन की त्रासदियां, राजनीतिक असत्यता और धार्मिक वास्तविकता से दूरी, धर्म से दूर हुए मस्तिष्क के ठोस प्रमाण हैं. मेरे दृष्टिकोण से, धार्मिक अनुभव को हल्के ढंग नहीं लिया जाना चाहिए और धर्म को एक राजनीतिक विषय के रूप में तो कतई भी नहीं लिया जाना चाहिए. धर्म बुद्धि के प्रान्त से परे एक पवित्र विषय है. प्राचीन भारत में सदियों तक विशाल वेदों को स्मृतिबद्ध किया जाता था और मौखिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी प्रेषित किया जाता था जो कि एक विलक्षण उपलब्धि थी क्योंकि वहाँ एक अवचेतन जागरूकता थी और मानव जाति के लिए क्या निहित है, इस का अत्यंत महत्व था.

यह स्पष्ट है कि पृथ्वी का मानसिक वातावरण आज वैसा नहीं है जिस रूप में हजारों वर्ष पहले था. लेकिन हमें पता नहीं है कि इस तेजी से बदलाव के पीछे रहस्यमय प्राकृतिक कारक क्या हैं. समस्त पृथ्वी पर बढ़ती पीढ़ियों व पुरानी पीढ़ियों के बीच का अंतर इतना बड़ा और मुश्किल क्यों हो गया है? ये एक अलग विषय है, परन्तु मैं आप को कम शब्दों में समझाने का प्रयास करता हूँ. आप पृथ्वी के वातावरण के बारे में तो जानते ही होंगे, जिस में हम श्वास लेते हैं, परन्तु क्या आपको ज्ञान है कि पृथ्वी का एक मानसिक वातावरण भी होता है, जोकि उस ब्रह्मांडीय चेतना का ही एक अंग है, जिस में हम सोचते हैं? हमारी पृथ्वी एक लोह-चुंबक है इस बात से तो सब सहमत होंगे, आप कृपया ये भी समझ लें कि पृथ्वी की एक अनन्य-आवृत्ति (unique-frequency) भी है और अगर आवृत्ति है तो उसका एक माप भी होगा, जोकि वर्तमान युग में 7Hz आस-पास है. ये भी वैज्ञानिक सत्य है कि मानव मस्तिष्क की भी आवृत्ति होती है. वर्तमान में बहुत से यन्त्र हैं जो मानव मस्तिष्क की आवृत्ति को पढ़ और अंकित कर सकते हैं. मानव मस्तिष्क मे स्थापित न्यूरॉन एक संवेदक (रिसेप्टर) की तरह कार्य करते हैं जोकि सदैव सन्घटित व विघटित होते रह्ते हैं. जिस प्रकार उपग्रह से प्रेषित आवृत्ति संकेतों को हमारे रेडियो या टेलीविज़न ग्रहण कर सकते हैं ठीक उसी प्रकार मानव मस्तिष्क भी ब्रह्मांडीय आवृत्तियों के प्रति संवेदनशील होता है तथा उन्हें ग्रहण कर सकता है. हमारा मस्तिष्क रेडियो या टेलीविज़न की तुलना में बहुत ही अधिक उन्नत है क्योंकि ये मात्र आवृत्तियों को ग्रहण ही नहीं करता बल्कि स्वयं द्वारा निर्मित आवृत्तियों को ब्रह्मांड में प्रेषित भी करता है. मानव मस्तिष्क भिन्न-भिन्न आवृत्तियों पर कार्य करता है जोकि हमारी भावनात्मक मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है. दैनिक कार्य के समय मस्तिष्क की आवृत्ति 20Hz से 40Hz के बीच होती है और निद्रा के समय 7Hz से 10Hz बीच . मस्तिष्क की आवृत्ति जितनी अधिक होगी हम उतना ही तनाव अनुभव करेंगे और जितनी कम होगी हम उतना ही आनंद व हर्ष अनुभव करेंगे. योग और ध्यान इसी विज्ञान पर आधारित हैं जिस का अनवेषण हमारे पूर्वजों ने हजारों वर्ष पहले ही कर लिया था. योग और ध्यान का मूल सिधान्त मानव मस्तिष्क की आवृत्ति को पृथ्वी की प्राकृतिक आवृत्ति के साथ संयोजित करना ही है. उपरोक्त विषय को अगर आप जान पाए हैं तो आप समझ रहे होंगे कि पृथ्वी का मानसिक वातावरण क्या है. जी हाँ, मेरा आशय पृथ्वी या ब्रह्मांड की उस अनन्य-आवृत्ति से है जिस के कारण ही मानव मस्तिष्क में विचार जन्म लेते हैं और विचार से ही इस स्थूल जगत में आकार जन्म लेते हैं. पृथ्वी पर युगों के बदलने से तात्प्रय पृथ्वी की बदलती हुई आवृत्तियों से है और अगर आवृत्तियां बदलेंगी तो पृथ्वी पर सब कुछ बदलेंगा और् मानव इस का अपवाद नहीं हो सकता.

धर्म का सम्बन्ध मनुष्य के अवचेतन से है और कर्म का सम्बन्ध मनुष्य के चेतन से. हमारा अवचेतन सदैव ब्रह्मांडीय चेतना में आसक्त रहता है तभी तो वह चेतन मस्तिष्क के आदेश के बिना ही हमारे हृदय, श्वास, रक्त परिसंचरण व समस्त अंगों के को संचालन में सदैव कार्यरत रहता है. हमारा चेतन मन एक गणना का उपकरण है और तर्क-वितर्क इसका एक तात्विक गुण है यही गुण साधारण मानव को परम तत्व से परे करता है. विशाल वेदों में ऋषियों ने इसी तत्व से मानव का परिचय करवाया है. मनुष्य का वह वर्ग जिस में मौजूदा धर्मों के संस्थापक, रहस्यवादी, भविष्यद्वक्ता सम्मिलित हैं, ने मानवता के व्यवहार पर सबसे बड़ा प्रभाव डाला है. राजाओं, दार्शनिकों, शासकों, वैज्ञानिकों या विद्वानों, सभी ने संयुक्त रूप से एक द्वितीयक भूमिका निभाई है. प्रगट धार्मिक शिक्षण ने एक आकर्षण का आयोजन किया है और मानव मन में एक पकड़ बनाए रखी है जो कि जीवन के किसी भी अन्य क्षेत्र से अतुल्य है. हजारों सालों से ये पकड़ जारी है, क्यों?  क्या है जो लाखों करोड़ों प्राणियों को अपने धर्म संस्थापकों के शब्दों पर आज के इस तर्कसंगत युग में भी विश्वास है? हालांकि शाब्दिक प्रौद्योगिकी के चमत्कारों की बाढ़ में क्यों आज भी जनता को उनके धर्म के आदर्शों में वैज्ञानिकों और दार्शनिकों के तर्कसंगत प्रतिपादन की तुलना में अधिक विश्वास है? क्यों प्रतिष्ठित वैज्ञानिक भी अपने अंत काल में धर्म की ही शरण में जाते हैं? इस विरोधाभास की व्याख्या क्या है? ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां वह तर्कवादी जो युवा काल् में धर्म के प्रति अविश्वासी रहे, अपने जीवन के अन्त काल में धार्मिक दिशा में बदल गये. यहाँ तक कि भौतिकवादी राजनीतिक विचारधाराएं भी जनता के इन विश्वासों को उखाड़ करने में सक्षम नहीं हुईं. इस का मूल कारण यही है कि मनुष्य का चेतन मन तो उस ब्रह्मांडीय चेतना, जिसे ईश्वर, भगवान व चाहे कुछ भी कहें, को नकार सकता है परन्तु उस का अवचेतन मन इस सत्य को कभी नकार नहीं सकता जैसे नदी का जल कभी नकार नहीं सकता कि वह पृथ्वी पर बहता है परन्तु मूर्ख मछली इसे ना माने, पूर्ण संभव है.

मेरे इस लेख का मुख्य उदेश्य आप को उस ब्रह्मांडीय चेतना से अवगत करवाना है जो प्रत्येक क्षण हमारे चारों ओर प्रवाहित रहती है, जो जीव के माध्यम से हमें परिवर्तनशील रहने के लिए बताती है और सभी धर्म सिर्फ उसी को जानने का भिन्न-भिन्न पथ हैं जो उसी ब्रह्मांडीय चेतना पर समाप्त होते हैं क्योंकि वहाँ से आगे कुछ नहीं सिवाय अन्नत के.

Tuesday, 10 January 2012

भारतीय नारी और स्वामी विवेकानंद

आर्यों और सेमेटिक लोगों के नारी सम्बन्धी आदर्श सदैव से एक दुसरे से विपरीत रहे हैं..सेमेटिक लोग स्त्रियों क़ी उपस्थिति को उपासना विधि में घोर विघ्न स्वरूप मानते हैं.. उनके अनुसार स्त्रियों को किसी प्रकार के धर्म कर्म का अधिकार नही है ,यहाँ तक क़ी आहार के लिये पक्षी मरना भी उनके लिये निषिद्ध है..आर्यों के अनुसार तो सहधर्मिणी के बिना पुरुष कोई धार्मिक कार्य कर ही नही सकता.. 
     ....पाश्च्यात्य नारियों क़ी तुलना में अपने देश क़ी नारियों क़ी अवस्था भिन्न देख कर हम भारत में नारी के प्रति असमानता के उनके आरोंप को स्वीकार न करलें ..विगत कई सदियों से भारत में ऐसी परिस्थितियों का निर्माण होता रहा है,जिससे हम स्त्रियों का विशेष संरक्ष्ण करने को बाध्य हुए हैं....स्त्री जाती के प्रति हीन दृष्टि के मिथ्या आरोंप के प्रकाश में हम अपनी प्रथाओं के यथार्थ स्वरूप को समझ सकेंगे...
.........स्त्रियों के सम्बन्ध में हमारा हस्तक्षेप करने का अधिकार बस उनको शिक्षा देने तक ही सीमित रहना चाहिए..उनमें ऐसी योग्यता ला देनी चाहिए जिससे वे अपनी समस्याओं को स्वयम ही अपने ढंग से सुलझा सकें..अन्य कोई उनके लिये कार्य नही कर सकता,और करने का प्रयत्न भी उचित नही है,क्योंकि हमारी भारतीय स्त्रियाँ समस्याओं को हल करने में संसार के किसी भी भाग क़ी स्त्रियों से पीछे नही हैं...
  ...मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी ,यदि भारतीय स्त्रियों क़ी ऐसी ही प्रगति हो जैसी क़ी इस देश (अमेरिका )में हुई है,परन्तु यह उन्नति तभी अभीष्ट है जब वह उनके पवित्र जीवन और सतीत्व को अक्षुण बनाये रखते हुए हो ...मैं अमेरिकी स्त्रियों के ज्ञान और विद्वता क़ी बड़ी प्रशंसा करता हूँ परन्तु मुझे यह अनुचित लगता है क़ी आप बुराइयों को भलाइयों का रंग दे कर छिपाने का प्रयत्न करें. केवल बौद्धिक विकास से ही मानव का परम कल्याण सिद्ध नही हो सकता..भारत में नीतिमत्ता और आध्यात्मिक उन्नति को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है और हम उनकी प्राप्ति के लिये प्रयास भी करते हैं.. यद्यपि भारतीय स्त्रियाँ उतनी शिक्षा सम्पन्न नहीं हैं फिर भी उनका आचार विचार अधिक पवित्र होता है ...यहाँ के पुरुष स्त्रियों के सम्मुख झुकते हैं ,उन्हें आसन प्रदान करते हैं ,परन्तु एक क्षण केउपरांत वे उनकी चापलूसी करने लगते हैं..वे उनके नख शिख क़ी प्रशंसा करना प्रारम्भ कर देते हैं ..आपको ऐसा करने का क्या अधिकार है ?कोई पुरुष इतनी दूर जाने का साहस कैसे कर सकता है ?और यहाँ क़ी स्त्रियाँ उसको सहन भी कैसे कर लेती हैं ?इस प्रकार के भावों से तो मनुष्य में निम्नतर भावों का उद्रेक होता है ..उससे उच्च आदर्शों क़ी प्राप्ति सम्भव नहीं ..

हमें स्त्री पुरुष में भेद का विचार नही करना चहिये..केवल यही चिन्तन करना चाहिए क़ी हम सभी मानव हैं और परस्पर एक दुसरे के प्रति सद्व्यवहार और सहायता करने के लिये उत्पन्न हुए हैं...हम यहाँ देखते हैं क़ी ज्योंही किसी नवयुवक और नव युवती को अकेले होने का अवसर मिला,त्योंही वह नवयुवक उसके रूप लावण्य क़ी प्रशंसा आरम्भ कर देता है और किसी स्त्री को विधिवत पत्नी के रूप में अंगीकार करने से पूर्व वह दो सौ स्त्रियों से प्रेमाचार कर चुका होता है ...
         जब मै भारत वर्ष में था और इन चीजों को केवल दूर से देखता सुनता था तब मुझे बताया गया क़ी यह केवल मनोविनोद है इसमें कोई दोष नही है, उस समय मैंने इस पर विश्वास कर लिया था..तब से अबतक मुझे बहुत यात्रा करने का अवसर आया है ,और अब मेरा यह दृढ़ विश्वास हो गया है क़ी यह अनुचित और अत्यंत दोषपूर्ण है अंतिम प्रश्न --
आपका अपने देश क़ी स्त्रियों के लिये क्या संदेश है ?

वही जो पुरुषों के लिये है...भारत और भारतीय धर्म के प्रति विश्वास और श्रद्धा रखो ,तेजस्वी बनो ,हृदय में उत्साह भरो...भारत में जन्म लेने के कारण लज्जित न हों ,वरन उसमें गौरव का अनुभव करो ,.स्मरण रखो, यद्यपि हमें दुसरे देशों से कुछ लेना अवश्य है ,पर हमारे पास दुनियां को देने के लिये ,दूसरों क़ी अपेक्षा सहस्त्र गुना अधिक है ....
 प्रस्तुती ---विवेक सुरंगे  
(उत्तिष्ठ जागृत पुस्तक के कुछ अंश  )

दरिद्र ही नारायण है

आज पीड़ा इस बात क़ी है की ईश्वर ने जब सारे मनुष्यों को एक जैसा ही बनाया है तब समाज के नेतृत्व कर्ता, पिछड़े या दरिद्र वर्ग से क्यों नही निकल रहे ?. उस पूरे वर्ग को, भूख, अशिक्षा और समस्त कमजोरियों से मुक्त करा कर विश्व व्यवस्था को सुधारना यही लक्ष्य होना चाहिए सरकार का ..
पर आज हम सभी जानते थे यह कार्य आसान नही है .. अज्ञान से लड़ने और कमजोरियों पर विजय पाने के लिये भी 'मैन पावर ' और साधनों क़ी जरूरत थी.. वेद और उपनिषद उनके लिये शक्ति प्रदाता है .. गीता में वर्णित सांख्ययोग और कर्मयोग को उनके जीवन आचरण में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है.. इसे ही हमें औरों के लिये भी सुझाव देना है .. मान्यता है क़ी हिंदुत्व को धारण किये अपने समाज में, लम्बे समय से सुधार नही किया गया तो अनेक विकृत मान्यताओं और परम्पराओं ने स्थान बना लिया है.. यही हमारी कमजोरी का कारण है..और हम सभी मिलकर इस कमजोरी को दूर करेगे तो आप बताये कौन कौन है मेरे साथ !!