अपना इतिहास जाने बगैर कोइभी इंशान इतिहास नहि बना शकता.. इस लिये भारतीय महिलाओ को अपना सच्चा इतिहास जानना चाहिये और बाद मे आरक्षण विधेयक पर गहन अभ्यास करना चाहिये..
भारत मे करीब 50 % महिलाए है, और उनके लिये आरक्षण सिर्फ 33%..?? क्या इसके पीछे कोइ राजनिती नहि है?? दलितो एवं आदिवासीओ को आरक्षण का कितना लाभ हुआ है?? क्या उनको आरक्षण का पूरा लाभ दिया भी जाता है..?? क्या महिलाओ को ये लोग न्याय देंगे..?? इस युग को हम वैज्ञानिक युग मानते है.. भारतीय महिला अवकाश मे भी सफर कर आई है, आज कंइ भारतीय महिलाए मल्टी नेशनल कंपनी चला रही है, कलेक़्टर है, आइ. पी. एस. है, पायलट है, बंदूक उठा के देश की रक्षा भी करती है.. लेकिन धार्मिक क्षेत्र मे महिलाओ का वर्चस्व कितना है…जब महिला आचार्या बन शकती है तो, शंकराचार्या क्यों नहि बन शकती?? अगर कोइ मंदीर के पुजारी एक दिन के लिये मंदीर मे नहि जा शके तो, क्या उनकी जगह उनकी पत्नी से पुजा करवा शकते है..?? क्यों नहि?? तो फिर ये वैज्ञानिक सदी का क्या मतलब?? आज भी धार्मिक क्षेत्र पर एक ही जाति के लोग और उस मे भी सिर्फ पुरुष का ही एकाधिकार क्यों?? धार्मिक स्थानो पर बिराजमान मंदीर के पुजारी से लेकर शंकराचार्य तक ब्राह्मण के अलावा किसी को भी स्थान नहि… ब्राह्मण महिला को भी नहि… क्यों??
महिलाओ को सिर्फ आरक्षण देने से उनकी समस्या का समाधान नहि होता… मानसिक असमानता से महिलाए कैसे बचेगी?? महिलाओ को अभी भी अपने दुश्मन को पहचान लेना चाहिये.. जब तक आपका नजरिया नहि बदलता, तब तक आप कुछ परिवर्तन नहि ला शकते…. और नजरिया बदलने के लिये मजबुत मनोबल की जरूरत होती है.. जो आज शायद ही किसीके पास होगा… जब तक समाज महिलाओ के प्रति अपनी सोच नहि बदलता, तब तक चाहे कितने भी बिल पास हो जाये, कुछ फर्क नहिं पडता…. आखिरकार महिलाओ को अपनी लडाई खुद ही लडनी होगी…
एक धर्म पुस्तक मे लिखा है की, “ढोल गँवार शुद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी”, महिलाए भी इसे सत्संग मे बहुत ध्यान से सुनती है और ताली बजाती है… कभी कसाइ ने भी पशुओ की रक्षा की है..?? जो ये लोग आरक्षण से महिलाओ का लाभ होने देगे… महिला आरक्षण तो इनके लिये जरिया मात्र है, पाना तो कुछ और चाहते है. आज भी घरेलु हिंसा मे सबसे ज्यादा शिकार महिलाए होती है. आज भी बेटी के जन्म से मां – बाप को उतनी खुशी नहि होती जितनी बेटे के जन्म पर होती है… और खुश हो भी कैसे शकते है… वो जानते है की समाज मे स्त्री का स्थान कहाँ पर है. महिलाए रात तो क्या, दिन मे भी स्वतंत्रतासे घुम-फिर नहि शकती. उसे हर हंमेश समाज और भारतीय संस्कृति के ठेकेदारो का डर रहता है. आज भी कंइ धर्मस्थानो पर महिलाओ को इजाजत नहिं मिलती.. ये सब पाबंदीओ के लिये कौन जिम्मेदार है..?? राम के राज्य में भी सीता जैसी कइ स्त्रीओ को अग्नि परीक्षा के नाम पर जलाया गया था… आज भी ऐसे अपराध होते ही रहते है…लेकिन किसे परवाह है… हमे तो सिर्फ बिल पास करवाना है…
भारत मे करीब 50 % महिलाए है, और उनके लिये आरक्षण सिर्फ 33%..?? क्या इसके पीछे कोइ राजनिती नहि है?? दलितो एवं आदिवासीओ को आरक्षण का कितना लाभ हुआ है?? क्या उनको आरक्षण का पूरा लाभ दिया भी जाता है..?? क्या महिलाओ को ये लोग न्याय देंगे..?? इस युग को हम वैज्ञानिक युग मानते है.. भारतीय महिला अवकाश मे भी सफर कर आई है, आज कंइ भारतीय महिलाए मल्टी नेशनल कंपनी चला रही है, कलेक़्टर है, आइ. पी. एस. है, पायलट है, बंदूक उठा के देश की रक्षा भी करती है.. लेकिन धार्मिक क्षेत्र मे महिलाओ का वर्चस्व कितना है…जब महिला आचार्या बन शकती है तो, शंकराचार्या क्यों नहि बन शकती?? अगर कोइ मंदीर के पुजारी एक दिन के लिये मंदीर मे नहि जा शके तो, क्या उनकी जगह उनकी पत्नी से पुजा करवा शकते है..?? क्यों नहि?? तो फिर ये वैज्ञानिक सदी का क्या मतलब?? आज भी धार्मिक क्षेत्र पर एक ही जाति के लोग और उस मे भी सिर्फ पुरुष का ही एकाधिकार क्यों?? धार्मिक स्थानो पर बिराजमान मंदीर के पुजारी से लेकर शंकराचार्य तक ब्राह्मण के अलावा किसी को भी स्थान नहि… ब्राह्मण महिला को भी नहि… क्यों??
महिलाओ को सिर्फ आरक्षण देने से उनकी समस्या का समाधान नहि होता… मानसिक असमानता से महिलाए कैसे बचेगी?? महिलाओ को अभी भी अपने दुश्मन को पहचान लेना चाहिये.. जब तक आपका नजरिया नहि बदलता, तब तक आप कुछ परिवर्तन नहि ला शकते…. और नजरिया बदलने के लिये मजबुत मनोबल की जरूरत होती है.. जो आज शायद ही किसीके पास होगा… जब तक समाज महिलाओ के प्रति अपनी सोच नहि बदलता, तब तक चाहे कितने भी बिल पास हो जाये, कुछ फर्क नहिं पडता…. आखिरकार महिलाओ को अपनी लडाई खुद ही लडनी होगी…
एक धर्म पुस्तक मे लिखा है की, “ढोल गँवार शुद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी”, महिलाए भी इसे सत्संग मे बहुत ध्यान से सुनती है और ताली बजाती है… कभी कसाइ ने भी पशुओ की रक्षा की है..?? जो ये लोग आरक्षण से महिलाओ का लाभ होने देगे… महिला आरक्षण तो इनके लिये जरिया मात्र है, पाना तो कुछ और चाहते है. आज भी घरेलु हिंसा मे सबसे ज्यादा शिकार महिलाए होती है. आज भी बेटी के जन्म से मां – बाप को उतनी खुशी नहि होती जितनी बेटे के जन्म पर होती है… और खुश हो भी कैसे शकते है… वो जानते है की समाज मे स्त्री का स्थान कहाँ पर है. महिलाए रात तो क्या, दिन मे भी स्वतंत्रतासे घुम-फिर नहि शकती. उसे हर हंमेश समाज और भारतीय संस्कृति के ठेकेदारो का डर रहता है. आज भी कंइ धर्मस्थानो पर महिलाओ को इजाजत नहिं मिलती.. ये सब पाबंदीओ के लिये कौन जिम्मेदार है..?? राम के राज्य में भी सीता जैसी कइ स्त्रीओ को अग्नि परीक्षा के नाम पर जलाया गया था… आज भी ऐसे अपराध होते ही रहते है…लेकिन किसे परवाह है… हमे तो सिर्फ बिल पास करवाना है…
आपकी इस बात से बिल्कुल भी सहमत नही हूँ ।
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