बात चाहे आजादी की जंग लड़ रहे हिंदुस्तान की हो या आजाद भारत की, महिलाओं का योगदान भुलाया नहीं जा सकता। कुछ कर दिखाने का जज्बा उस समय भी उनके मन में था, जब वे घर की चारदीवारी में सजाकर रखे जाने वाले सामान की तरह थीं। तब भी उन्होंने चौखट से बाहर आकर अपनी शक्तिदुनिया को बताई। कोमल मन की दृढ़ता और असीमित क्षमताएं तब खुलकर सामने आईं, जब ये देश ही नहीं, बल्कि विदेश में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा आईं। यकीनन इन चेहरों का रसूख अब नहीं रहा, लेकिन प्रभाव आज भी कायम है।
कोमल मन की नायिका-सरोजिनी नायडू
1947 में देश की पहली महिला राज्यपाल (उप्र) चुनी गईं
कुशल राजनेता और कवि हृदय सरोजिनी का जन्म 1879 में हैदराबाद में हुआ। 1925 में उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। सरोजिनी नायडू की सक्रियता ने महिलाओं के लिए राजनीति में अहम स्थान बना दिया। आजादी के लिए हुए आंदोलन में सक्रिय रहीं सरोजिनी ने दांडी यात्रा में महात्मा गांधी के कदम से कदम मिलाए। गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने धरसाना सत्याग्रह की कमान भी बखूबी संभाली। आजादी के बाद वह देश की पहली महिला राज्यपाल (उत्तर प्रदेश) बनीं। हिंदी के अलावा वे उर्दू, तेलुगू, अंग्रेजी, फारसी और बंगाली भाषाओं की भी अच्छी जानकार थीं।
हौसले के तीखे तेवर- इंदिरा गांधी
1966 में पहली बार भारत की प्रधानमंत्री बनीं
जवाहरलाल नेहरू की पुत्री और देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी किसी परिचय की मोहताज नहीं। अपने तीखे और क्रांतिकारी तेवरों की झलक उन्होंने बचपन में ही वानर सेना का गठन करके दिखा दी थी। जवाहरलाल नेहरू ने ऑटोबायोग्राफी टूवर्डस फ्रीडम में लिखा है कि जब वह जेल में थे, तब ब्रिटिश सरकार ने उन पर कुछ जुर्माना लगा दिया था। उसे वसूलने के लिए पुलिस अचानक उनके घर जा पहुंची और फर्नीचर उठाकर ले जाने लगी। घर के सभी लोग सकते में थे, लेकिन चार साल की इंदिरा से यह सहन नहीं हुआ और वह खुलकर उनका विरोध करने लगी। इंदिरा के इन तेवरों में नेहरू को बेटी का उज्जवल भविष्य दिखाई दिया। पिता के साथ इंदिरा का जुड़ाव शुरू से ज्यादा रहा। वह उनसे लगातार पत्र व्यवहार करतीं और राजनीतिक मुद्दों पर दोनों विचार-विमर्श भी करते। अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि से बिल्कुल अलग दबंग और कुशल राजनेता के रूप में उन्हें जाना जाता था। वह आपातकाल और स्वर्णमंदिर ऑपरेशन जैसे कड़े फैसलों के लिए पहचानी जाती हैं।
विदेश में मिली विजय- विजयलक्ष्मी पंडित
1937 में पहली महिला मंत्री चुनी गईं
जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और सरोजिनी नायडू से प्रेरित थीं। असहयोग आंदोलन में प्रभावी भूमिका निभाने वाली विजयलक्ष्मी आजादी के बाद सोवियत संघ (1947-1949), मैक्सिको (1949-1951), आयरलैंड (1955-1961) और स्पेन (1958-1961) में भारत की राजदूत रहीं। 1953 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्षता करने वाली वह पहली महिला बनीं। 1979 में उन्होंने संरा मानवाधिकार आयोग में भारत का प्रतिनिधित्व किया। भाई की बेटी इंदिरा के साथ उनके संबंधों में ताउम्र तल्खी रही, जो अकसर देखने को मिली।
खुले मन की एक कहानी- पद्मजा नायडू
1986 में पश्चिम बंगाल की पहली महिला राज्यपाल बनीं
सरोजनी नायडू की पुत्री पद्मजा अपनी मां की ही तरह देश के लिए समर्पित थीं। उन्होंने खादी को बढ़ावा देने के साथ विदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल रोकने की दिशा में काफी काम किया। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाली पद्मजा जेल भी गईं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन्हें 1956 में पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया गया। दूसरी बार 1967 में वह बंगाल की राज्यपाल बनीं। बांग्लादेश रिफ्यूजी ऑपरेशन के दौरान वह इंडियन रेडक्रॉस सोसायटी की चेयरमैन थीं। इसके अलावा उन्हांेने भारत सेवक समाज, ऑल इंडिया हैंडीक्राफ्ट बोर्ड और नेहरू मेमोरियल फंड में भी अहम जिम्मेदारियां निभाईं। पद्मजा को नेहरू की करीबी महिला मित्रों में गिना जाता है। नेहरू को उनका सेंस ऑफ ह्यूमर और खुली विचारधारा बहुत पसंद थी। वे पद्मजा के मां सरोजिनी नायडू के प्रति उनका अगाध प्रेम से भी काफी प्रभावित थे। जब भी वह मां के बारे में बात करतीं तो उनकी आंखें भर आतीं। कई मामलों में उन्होंने नेहरू को सलाह भी दी। पद्मजा की एक और खासियत यह थी कि वह जब कभी टूर पर जातीं तो हर रोज बाल जरूर धोतीं।
घर से उठी चिंगारी- सुचेता कृपलानी
1963 में पहली महिला मुख्यमंत्री चुनी गईं
स्वतंत्रता आंदोलनों में सुचेता कृपलानी की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। वह 1946 में संसद की सदस्य चुनी गईं और 1958-60 के मध्य कांग्रेस की जनरल सेकेट्ररी भी रहीं। 1963 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। उन्हें देश की पहली महिला मुख्यमंत्री होने का गौरव प्राप्त है। लंबे समय तक सक्रिय राजनीति में रहने के बाद वह रिटायर हो गईं। वह जितनी अच्छी राजनीतिज्ञ थीं, उतनी ही जिम्मेदार पत्नी भी।
बढ़े मदद के हाथ- मदर टेरेसा
1980 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित
दया की प्रतिमूर्ति और गरीब, बेसहारा लोगों के लिए हमेशा काम करने वाली मदर टेरेसा को 1980 में उनके मानवीय कार्यो के लिए नोबेल पुरस्कार से नवाज़ा गया। अल्बानिया में जन्मी मदर समाज सेवा करना चाहती थीं और उन्होंने भारत को अपनी कर्मस्थली चुना। यहां उन्होंने बरसों तक गरीब और बेसहारों की मदद के लिए हाथ बढ़ाए। मदद के ये हाथ हमेशा मिलते रहें, इसके लिए उन्होंने कोलकाता में मिशनरीज ऑफ चैरिटी संस्था की नींव रखी। यह संस्था एड्स, कुष्ठ रोग और टीबी के मरीजों के अलावा गरीब और बेसहारा लोगों के लिए काम करती है। मरणोपरांत मदर को संत की उपाधि दी गई। उन्हें 1980 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया।
खूबसूरत ताकत- महारानी गायत्री देवी
1960 के दशक में वोग के कवर पेज पर आईं
खूबसूरती का प्रतीक महारानी गायत्री देवी को मशहूर इंटरनेशनल पत्रिका वोग ने 60 के दशक में अपने कवर पेज पर दुनिया की दस सबसे खूबसूरत महिलाओं की श्रेणी में रखा। बचपन की टॉम बॉय गायत्री धीरे-धीरे अपने लुक को लेकर सजग होती गईं। उनके पास ज्वैलरी का खासा कलेक्शन था। वह एमरॉल्ड को कभी भी ग्रीन साड़ी पर नहीं पहनती थीं। इससे उनकी मिक्स एंड मैच का पता चलता है। जयपुर राजघराने की महारानी होने के साथ ही उनका राजनीति में भी खासा दखल रहा।
मुखर कलम की धनी- अमृता प्रीतम
1956 में साहित्य अकादमी अवॉर्ड, ज्ञानपीठ अवॉर्ड जीता
भारत के प्रमुख साहित्यकारों की सूची इनके बिना अधूरी है। मूल रूप से पंजाबी भाषा में लिखने वाली अमृता पहली महिला थीं, जिन्हें 1956 में साहित्य अकादमी अवॉर्ड से नवाजा गया। अमृता को जितना प्यार भारत में मिला, उतना ही सम्मान पाकिस्तान ने दिया। 100 से भी ज्यादा किताबों लिखने वाली अमृता कविता, फिक्शन, बायोग्राफी और पंजाबी लोकगीतों के लिए जानी जाती हैं। छह दशक तक साहित्य को समर्पित अमृता की किताब पर फिल्म भी बनी। जितनी मुखर उनकी कलम थी, उतना ही बोल्ड उनका व्यक्तित्व भी। चित्रकार इमरोज के साथ उनके संबंध हमेशा चर्चा में रहे। 2004 में उन्हें पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया गया।
अद्वितीय कलाकार- गंगूबाई हंगल
2002 में पद्म विभूषण और 1971 में पद्म भूषण से सम्मानित
शास्त्रीय गायन को एक नई पहचान दिलाने में गंगूबाई हंगल का अहम योगदान रहा है। कर्नाटक की इस गायिका को उनकी खनकदार और गहरी आवाज के लिए जाना जाता है। गणेशोत्सव से सुर साधना शुरू करने वाली गंगूबाई ने गायकी की घराना परंपरा को बरकरार रखा। किराना घराना के साथ उन्हांेने सवाई गंधर्व की दीक्षा भी ली। गायन में अभिन्न योगदान के लिए उन्हें कर्नाटक संगीत नृत्य अकादमी और संगीत नाटक अकादमी अवार्ड भी मिला।
उभरी नई तस्वीर- अमृता शेरगिल
1933 में पेरिस के एसोसिएशन ऑफ द ग्रैंड सैलून में प्रदर्शनी
इस खूबसूरत चित्रकार की कूची ने कैनवास पर भारत की एक नई तस्वीर उकेरी है। अपनी पेंटिंग्स के बारे में अमृता का कहना था- मैंने भारत की आत्मा को एक नया रूप दिया है। यह परिवर्तन सिर्फ विषय का नहीं, बल्कि तकनीकी भी है। अमृता का जन्म भले ही हंगरी में हुआ, लेकिन उनकी पेंटिंग्स भारतीय संस्कृति और उसकी आत्मा का बेहतरीन नमूना हैं। इनको धरोहर मानकर दिल्ली की नेशनल गैलेरी मंे सहेजा गया है। अमृता जितनी खूबसूरत थीं, उतना ही उनकी पेंटिंग्स में नफासत थी। उनकी पेंटिंग यंग गल्र्स को पेरिस में एसोसिएशन ऑफ द ग्रैंड सैलून तक पहुंचने का मौका मिला। यहां तक पहुंचने वाली वह पहली एशियाई महिला चित्रकार रहीं। यह गौरव हासिल करने वाली वह सबसे कम उम्र की महिला चित्रकार भी थीं।
सपनों की उड़ाने- कल्पना चावला
1997 में कोलंबिया से अंतरिक्ष में पहली उड़ान
हरियाणा के करनाल में जन्मीं कल्पना ने देश-विदेश ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा है। आसमान में उड़ने की प्रेरणा कल्पना को मशहूर पायलट व इंडस्ट्रियलिस्ट जेआरडी टाटा से मिली। 1995 में नासा एस्ट्रोनट के रूप में कल्पना ने अपनी उड़ान की ओर पहला कदम बढ़ाया। वह अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की पहली महिला थीं। हालांकि दुर्भाग्यवश उनका अंतरिक्ष यान कोलंबिया धरती पर लौटते समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया।
कोमल मन की नायिका-सरोजिनी नायडू
1947 में देश की पहली महिला राज्यपाल (उप्र) चुनी गईं
कुशल राजनेता और कवि हृदय सरोजिनी का जन्म 1879 में हैदराबाद में हुआ। 1925 में उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। सरोजिनी नायडू की सक्रियता ने महिलाओं के लिए राजनीति में अहम स्थान बना दिया। आजादी के लिए हुए आंदोलन में सक्रिय रहीं सरोजिनी ने दांडी यात्रा में महात्मा गांधी के कदम से कदम मिलाए। गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने धरसाना सत्याग्रह की कमान भी बखूबी संभाली। आजादी के बाद वह देश की पहली महिला राज्यपाल (उत्तर प्रदेश) बनीं। हिंदी के अलावा वे उर्दू, तेलुगू, अंग्रेजी, फारसी और बंगाली भाषाओं की भी अच्छी जानकार थीं।
हौसले के तीखे तेवर- इंदिरा गांधी
1966 में पहली बार भारत की प्रधानमंत्री बनीं
जवाहरलाल नेहरू की पुत्री और देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी किसी परिचय की मोहताज नहीं। अपने तीखे और क्रांतिकारी तेवरों की झलक उन्होंने बचपन में ही वानर सेना का गठन करके दिखा दी थी। जवाहरलाल नेहरू ने ऑटोबायोग्राफी टूवर्डस फ्रीडम में लिखा है कि जब वह जेल में थे, तब ब्रिटिश सरकार ने उन पर कुछ जुर्माना लगा दिया था। उसे वसूलने के लिए पुलिस अचानक उनके घर जा पहुंची और फर्नीचर उठाकर ले जाने लगी। घर के सभी लोग सकते में थे, लेकिन चार साल की इंदिरा से यह सहन नहीं हुआ और वह खुलकर उनका विरोध करने लगी। इंदिरा के इन तेवरों में नेहरू को बेटी का उज्जवल भविष्य दिखाई दिया। पिता के साथ इंदिरा का जुड़ाव शुरू से ज्यादा रहा। वह उनसे लगातार पत्र व्यवहार करतीं और राजनीतिक मुद्दों पर दोनों विचार-विमर्श भी करते। अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि से बिल्कुल अलग दबंग और कुशल राजनेता के रूप में उन्हें जाना जाता था। वह आपातकाल और स्वर्णमंदिर ऑपरेशन जैसे कड़े फैसलों के लिए पहचानी जाती हैं।
विदेश में मिली विजय- विजयलक्ष्मी पंडित
1937 में पहली महिला मंत्री चुनी गईं
जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और सरोजिनी नायडू से प्रेरित थीं। असहयोग आंदोलन में प्रभावी भूमिका निभाने वाली विजयलक्ष्मी आजादी के बाद सोवियत संघ (1947-1949), मैक्सिको (1949-1951), आयरलैंड (1955-1961) और स्पेन (1958-1961) में भारत की राजदूत रहीं। 1953 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्षता करने वाली वह पहली महिला बनीं। 1979 में उन्होंने संरा मानवाधिकार आयोग में भारत का प्रतिनिधित्व किया। भाई की बेटी इंदिरा के साथ उनके संबंधों में ताउम्र तल्खी रही, जो अकसर देखने को मिली।
खुले मन की एक कहानी- पद्मजा नायडू
1986 में पश्चिम बंगाल की पहली महिला राज्यपाल बनीं
सरोजनी नायडू की पुत्री पद्मजा अपनी मां की ही तरह देश के लिए समर्पित थीं। उन्होंने खादी को बढ़ावा देने के साथ विदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल रोकने की दिशा में काफी काम किया। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाली पद्मजा जेल भी गईं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन्हें 1956 में पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया गया। दूसरी बार 1967 में वह बंगाल की राज्यपाल बनीं। बांग्लादेश रिफ्यूजी ऑपरेशन के दौरान वह इंडियन रेडक्रॉस सोसायटी की चेयरमैन थीं। इसके अलावा उन्हांेने भारत सेवक समाज, ऑल इंडिया हैंडीक्राफ्ट बोर्ड और नेहरू मेमोरियल फंड में भी अहम जिम्मेदारियां निभाईं। पद्मजा को नेहरू की करीबी महिला मित्रों में गिना जाता है। नेहरू को उनका सेंस ऑफ ह्यूमर और खुली विचारधारा बहुत पसंद थी। वे पद्मजा के मां सरोजिनी नायडू के प्रति उनका अगाध प्रेम से भी काफी प्रभावित थे। जब भी वह मां के बारे में बात करतीं तो उनकी आंखें भर आतीं। कई मामलों में उन्होंने नेहरू को सलाह भी दी। पद्मजा की एक और खासियत यह थी कि वह जब कभी टूर पर जातीं तो हर रोज बाल जरूर धोतीं।
घर से उठी चिंगारी- सुचेता कृपलानी
1963 में पहली महिला मुख्यमंत्री चुनी गईं
स्वतंत्रता आंदोलनों में सुचेता कृपलानी की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। वह 1946 में संसद की सदस्य चुनी गईं और 1958-60 के मध्य कांग्रेस की जनरल सेकेट्ररी भी रहीं। 1963 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। उन्हें देश की पहली महिला मुख्यमंत्री होने का गौरव प्राप्त है। लंबे समय तक सक्रिय राजनीति में रहने के बाद वह रिटायर हो गईं। वह जितनी अच्छी राजनीतिज्ञ थीं, उतनी ही जिम्मेदार पत्नी भी।
बढ़े मदद के हाथ- मदर टेरेसा
1980 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित
दया की प्रतिमूर्ति और गरीब, बेसहारा लोगों के लिए हमेशा काम करने वाली मदर टेरेसा को 1980 में उनके मानवीय कार्यो के लिए नोबेल पुरस्कार से नवाज़ा गया। अल्बानिया में जन्मी मदर समाज सेवा करना चाहती थीं और उन्होंने भारत को अपनी कर्मस्थली चुना। यहां उन्होंने बरसों तक गरीब और बेसहारों की मदद के लिए हाथ बढ़ाए। मदद के ये हाथ हमेशा मिलते रहें, इसके लिए उन्होंने कोलकाता में मिशनरीज ऑफ चैरिटी संस्था की नींव रखी। यह संस्था एड्स, कुष्ठ रोग और टीबी के मरीजों के अलावा गरीब और बेसहारा लोगों के लिए काम करती है। मरणोपरांत मदर को संत की उपाधि दी गई। उन्हें 1980 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया।
खूबसूरत ताकत- महारानी गायत्री देवी
1960 के दशक में वोग के कवर पेज पर आईं
खूबसूरती का प्रतीक महारानी गायत्री देवी को मशहूर इंटरनेशनल पत्रिका वोग ने 60 के दशक में अपने कवर पेज पर दुनिया की दस सबसे खूबसूरत महिलाओं की श्रेणी में रखा। बचपन की टॉम बॉय गायत्री धीरे-धीरे अपने लुक को लेकर सजग होती गईं। उनके पास ज्वैलरी का खासा कलेक्शन था। वह एमरॉल्ड को कभी भी ग्रीन साड़ी पर नहीं पहनती थीं। इससे उनकी मिक्स एंड मैच का पता चलता है। जयपुर राजघराने की महारानी होने के साथ ही उनका राजनीति में भी खासा दखल रहा।
मुखर कलम की धनी- अमृता प्रीतम
1956 में साहित्य अकादमी अवॉर्ड, ज्ञानपीठ अवॉर्ड जीता
भारत के प्रमुख साहित्यकारों की सूची इनके बिना अधूरी है। मूल रूप से पंजाबी भाषा में लिखने वाली अमृता पहली महिला थीं, जिन्हें 1956 में साहित्य अकादमी अवॉर्ड से नवाजा गया। अमृता को जितना प्यार भारत में मिला, उतना ही सम्मान पाकिस्तान ने दिया। 100 से भी ज्यादा किताबों लिखने वाली अमृता कविता, फिक्शन, बायोग्राफी और पंजाबी लोकगीतों के लिए जानी जाती हैं। छह दशक तक साहित्य को समर्पित अमृता की किताब पर फिल्म भी बनी। जितनी मुखर उनकी कलम थी, उतना ही बोल्ड उनका व्यक्तित्व भी। चित्रकार इमरोज के साथ उनके संबंध हमेशा चर्चा में रहे। 2004 में उन्हें पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया गया।
अद्वितीय कलाकार- गंगूबाई हंगल
2002 में पद्म विभूषण और 1971 में पद्म भूषण से सम्मानित
शास्त्रीय गायन को एक नई पहचान दिलाने में गंगूबाई हंगल का अहम योगदान रहा है। कर्नाटक की इस गायिका को उनकी खनकदार और गहरी आवाज के लिए जाना जाता है। गणेशोत्सव से सुर साधना शुरू करने वाली गंगूबाई ने गायकी की घराना परंपरा को बरकरार रखा। किराना घराना के साथ उन्हांेने सवाई गंधर्व की दीक्षा भी ली। गायन में अभिन्न योगदान के लिए उन्हें कर्नाटक संगीत नृत्य अकादमी और संगीत नाटक अकादमी अवार्ड भी मिला।
उभरी नई तस्वीर- अमृता शेरगिल
1933 में पेरिस के एसोसिएशन ऑफ द ग्रैंड सैलून में प्रदर्शनी
इस खूबसूरत चित्रकार की कूची ने कैनवास पर भारत की एक नई तस्वीर उकेरी है। अपनी पेंटिंग्स के बारे में अमृता का कहना था- मैंने भारत की आत्मा को एक नया रूप दिया है। यह परिवर्तन सिर्फ विषय का नहीं, बल्कि तकनीकी भी है। अमृता का जन्म भले ही हंगरी में हुआ, लेकिन उनकी पेंटिंग्स भारतीय संस्कृति और उसकी आत्मा का बेहतरीन नमूना हैं। इनको धरोहर मानकर दिल्ली की नेशनल गैलेरी मंे सहेजा गया है। अमृता जितनी खूबसूरत थीं, उतना ही उनकी पेंटिंग्स में नफासत थी। उनकी पेंटिंग यंग गल्र्स को पेरिस में एसोसिएशन ऑफ द ग्रैंड सैलून तक पहुंचने का मौका मिला। यहां तक पहुंचने वाली वह पहली एशियाई महिला चित्रकार रहीं। यह गौरव हासिल करने वाली वह सबसे कम उम्र की महिला चित्रकार भी थीं।
सपनों की उड़ाने- कल्पना चावला
1997 में कोलंबिया से अंतरिक्ष में पहली उड़ान
हरियाणा के करनाल में जन्मीं कल्पना ने देश-विदेश ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा है। आसमान में उड़ने की प्रेरणा कल्पना को मशहूर पायलट व इंडस्ट्रियलिस्ट जेआरडी टाटा से मिली। 1995 में नासा एस्ट्रोनट के रूप में कल्पना ने अपनी उड़ान की ओर पहला कदम बढ़ाया। वह अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की पहली महिला थीं। हालांकि दुर्भाग्यवश उनका अंतरिक्ष यान कोलंबिया धरती पर लौटते समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया।
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