Tuesday, 6 December 2011

इस्लाम में महिलाओं की स्थित !!

इस्लाम मेँ विचार की कोई स्वतंत्रता नहीँ होती है । कुरान , हदीस , हिदाया और सीरत -अन -नबी - से प्राप्त निर्देशोँ , विचारोँ और भावनाओँ से बाहर निकलकर विचार व्यक्त करना मुसलमानोँ के लिए वर्जित है । यही कारण है कि दुनिया के सभी मुस्लिम देश कट्टरता के साथ अपने मजहबी निर्देशोँ से बँधे होते हैँ और स्वतंत्र , आधुनिक , विकसित , तर्क संगत , न्यायप्रिय और नैतिक आदर्शोँ के साथ नहीँ चल पाते हैँ । महिलाओँ के अधिकारोँ को मध्ययुगीन , बुर्कोँ मेँ कैद कर मानवीय अधिकारोँ का घोर उलंघन करते हैँ । चार चार शादियोँ की छूट , मनमाना तलाक का अधिकार और जेहाद द्वारा प्राप्त गैर मुसलमानोँ की औरतोँ को रखैल रखना और उनसे बलात्कार करना उनके मजहब द्वारा स्वीकृत विधान है । वे विश्वास करते हैँ कि ये सब अल्लाह के हुक्म के अनुसार हैँ । अपनी मजहबी परम्पराओँ के कारण कोई मुस्लिम देश प्रजातंत्र को नहीँ अपना पाता है और नागरिक अधिकार...ोँ से अपनी जनता को वंचित रखने का प्रयास करता है । जेहाद को सर्वोच्च या प्रथम मजहबी फर्ज जानता है , जिसमेँ गैर मुसलमानोँ की हत्या करना , उनका धन लूटना , उनकी औरतोँ और बच्चोँ को गुलाम बनाना , औरतोँ से बलात्कार करना , उनकोँ बीवियाँ या रखैल बनाना आदि पवित्र कर्म माना जाता है । दुनियाँ के दुसरे सभी समाजोँ मेँ इन कर्मोँ को शैतानियत और नीच कर्म समझा जाता है । अन्याय , अनैतिकता , आतँक और अत्याचार के इन दुष्कर्मोँ का कोई मुसलमान विरोध नहीँ कर सकता है । सारी दुनिया के मुसलमानोँ ने गैर मुसलमानोँ के साथ यही किया है । दारूल इस्लाम बनाना उनका मजहबी कर्तव्य है । उसके लिए धोखाधडी , चोरी , बेईमानी , तस्करी , झूठ , फरेब सब कुछ नैतिक है । ऐसा नहीँ है कि इन दुष्कर्मोँ को मुसलमान बुरा कर्म नहीँ समझते हैँ । वे अपने समाज के अंदर इसे वैसा ही समझते है । लेकिन अपने समाज के बाहर अर्थात् गैर मुसलमानोँ के साथ उनके ये व्यवहार पवित्र कर्म बन जाते हैँ । क्योँकि उनके मजहब के निर्देश के अनुसार जेहाद उनका सर्वोच्च कर्तव्य है । जेहाद का अर्थ है लडाई । उनके पैगम्बर के अनुसार लडाई का अर्थ है धोखाबाजी । धोखाबाजी किसके साथ ? काफिरोँ के साथ ; जिन्हेँ कुरान का अल्लाह मुसलमानोँ का खुला दुश्मन घोषित करता है । अभी मुसलमान दुनिया को दारूल इस्लाम बनाने के काम मेँ जुटे हैँ । यदि मानवता के दुर्भाग्य से यह संभव हो गया तो अविचार , आतँक और धर्मान्धता की परम्परा उनके विभिन्न फिर्कोँ मेँ ही ऐसा विध्वँश पैदा करेगी कि मानवता का ही अन्त हो जाएगा । जो संस्कृति तर्क , न्याय और नैतिकता की जगह बल , विध्वँश और उत्पीडन से पैदा होती है वह अन्ततः अपना शत्रु आप ही होती है । उसे संस्कृति नहीँ , विकृति समझना चाहिए ।

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