| चिरकाल से नारी को अबला का दर्जा दिया गया है। सभ्य समाज में उसे हमेशा से दबाकर रखने की कोशिश की गई। प्रत्यक्ष नहीं तो परोक्ष रूप में उसे दोयम स्थान पर ही पहचान दी गई....उसे समाज में बोलने का हक नहीं था ...। हमेशा उसे दबा दिया जाता रहा है ...समय बदला ..दौर बदला....नारी की दशा भी बदलती गई आज नारी .. समाज के हर क्षेत्र में कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं और नये उदाहरण प्रतिदिन पेश कर रही है।अंतरिक्ष तक की सैर कर आई नारी अभी बलशाली होने की दौड़ में शामिल है। सपने रूमानी हैं और इरादे फौलादी .।रू़ढ़िवादी ..सामाजिक तानेबाने के मकड़जाल को काट बाहर आने की कोशिश में लगी नारी आज हर क्षेत्र में आगे निकलने की होड़ में लगी है . फुल पावर से लैस वामा नौकरी ,कारोबार,घर परिवार,समाज ,सरकार देश में आगे बढ़कर भूमिका निभा रही है ..आज भविष्य की दिशा तय कर मंजिल पर पहुंचने का नारा बुलंद कर रही ये महिलायें आने वाली अपनी पीढ़ी के लिये एक आईडल आइकान बन चुकी हैं ।.श्रीमती इंदिरा गांधी,इंद्रा नूई, चंदा कोचर,कल्पना चावला, निरूपमा राव,सुनीता नारायण, विनिता बाली ,इंदु लिब्राहन ,किरण बेदी,जयश्री व्यास ,फराहखान जैसे हजारों नाम ऐसे हैं जो आने वाली पीढ़ी को उनके इरादों ...उनके सपनों को सच्चा करने की प्रेरणा देते रहेंगे ...आज कहते हैं वो अपनी भाग्यविधाता है ..अनहोनी को होनी में टालने का हिम्मत रखती हैं ...देश में इस समय आबादी का 48 प्रतिशत हिस्सा महिलाओं का है ..उनके विचार ,कार्यशैली ,मूल्यपद्धति परिवार, समाज और देश को एक नईं बुलंदियों तक ले जाने में सक्षम हैं...हर जगह इनका रण बिगुल बज रहा है.... पर मेरा मानना है कि वामा की भागमभाग और रफ्तार पकड़ती दौड़ में कहीं कोई कन्फ्यूजन या पाश्चात्य फ्यूज़न का असर तो नहीं ...। आज शहर और गांव के नारी जगत में जमीन आसमान का फर्क देखने को मिलता है।क्या पाश्चात्य तौर तरीकों को अपना कर ही तो कहीं आज की नारी अपने आप को स्वतंत्र और सक्षम तो नहीं मान रही है। तकनीकि और शिक्षा ने बदलाव का रास्ता खोल दिया है।अभिभावकों की भी सोच में बदलाव आया है,परिवार और समाज भी उनके साथ खड़े नज़र आने लगे हैं। लेकिन सिर्फ भौतिक स्वरूप को तब्दील कर वो अपने दामन से अबला शब्द तो नहीं मिटा रही है। पश्चिम का अनुकरण करने में ही तो कहीं वो दिशाहीन होती जा रही है। कहीं वो इस तरह बेकार में परेशान तो नहीं है, अपने आप को समाज में साबित करने के लिये और पुरूष के बराबर रेस लगाने के चक्कर में ...। ऐसे में जरुरत है सजग हो जाने की और सामयिक विशलेषण की। मैं कहता हूं कि उसे इस देश की सभ्यता और संस्कृति से ही सबक लेना चाहिए। भारत की नारी शुरू से ही सर्व शक्तिशाली रही है ,प्राचीन काल से ही उसे शक्ति के रूप में पूजा जाता रहा है ,भगवान राम ने भी लंका पर धावा बोलने के पहले मां दुर्गा की पूजा की थी । कहते है एक बार युद्ध में सारे देवतागण महिषासुर से हारने लगे राज पाट जाने लगा तो देवता भागकर भगवान के पास पहुंचे । भगवान ने सारे देवाताओं की सारी शक्तियां एक जगह इक्कठा कर नारी शक्ति के रुप में दुर्गा को उत्पन्न किया। अनेक सिर, अनेक हाथ ..हर में अस्त्र शस्त्र...सिंह पर सवार साहस शौर्य की प्रतीक उस नारी स्वरूप मां दुर्गा ने देवताओं(पुरूष) को महिषासुर से मुक्ति दिलाई और महिषासुर मर्दनी कहलाईं...।पर आज क्या नारी अपनी इस ताकत को समझ और संगठित कर पाई...पहचान पाई है अपनी उन शक्तियों को जो असुरों का दमन कर सकती हैं .. वो खुद समाज में जाति लिंग के आधार पर भेदभाव में जुटी हुई है ।इज्जत के हक के लिये तरसती नारी को पहचानने की जरूरत है अपनी उस शक्ति को। उसे हटाना होगा मुखौटा रबर स्टैंप का ...बदलनी होगी इच्छा शक्ति...हटानी होगी दबने की मानसिकता...तभी वो उभर कर सामने आ पायेगी ।नारी को मां त्याग की मूर्ति,और ना जाने क्या पदवी देकर बोझ के तले दबाने की कोशिश लगातार जारी हैं ...खोखले दर्जों से दबी नारी अपनी तथाकथित जिम्मेदारियों को निभाती रही ...शायद ये पुरुष प्रधान समाज की सोच या षडयंत्र है या, समाज का ढ़कोसला...सदियों से महिलायें बचपन से झूठे आडम्बरो के बीच पिसते हुये इसे अपनी नियति मान चुकी हैं ..।बदलते दौर में उसने कोशिश की है ....पर फिर भी वो नितांत अकेली है ..जहां वो अपने को खोज रही है .....कुछ अपवादों को छोड़ दें तो देखें आज भी नारी वहीं है .. मेरा सपना एक ऐसे समाज का है जहां स्त्री को अपने हक के बारे में सोचने की और अपने फैसले लेने की स्वतंत्रता हो। .य़े सही है कि आज़ादी के बाद इंदिरा गांधी, सरोजिनी नायडू,लक्ष्मी सहगल, सोनिया गांधी ,प्रतिभादेवी सिंह पाटिल, किरण बेदी,वसुंधरा राजे,ममता बनर्जी,उमा भारती,जयललिता, माया वती,राबड़ी देवी,देविकारानी से अरूणा ईरानी, रेखा,मधुबाला से मल्लिका शेरावत ,सैलिना जेटली,पीटी उषा,सानिया मिर्जा,एकता कपूर,सुष्मिता सेन, जैसी शख्सियतों के रूप में नारी के बदलते रूपों की झलक देखी...पर ये दौड़...इनके फौलादी इरादों को नहीं डगमायेगी ये तो इनका आने वाला कल ही बतला सकता है ....... |
बात चाहे आजादी की जंग लड़ रहे हिंदुस्तान की हो या आजाद भारत की, महिलाओं का योगदान भुलाया नहीं जा सकता। कुछ कर दिखाने का जज्बा उस समय भी उनके मन में था, जब वे घर की चारदीवारी में सजाकर रखे जाने वाले सामान की तरह थीं। तब भी उन्होंने चौखट से बाहर आकर अपनी शक्तिदुनिया को बताई। कोमल मन की दृढ़ता और असीमित क्षमताएं तब खुलकर सामने आईं, जब ये देश ही नहीं, बल्कि विदेश में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा आईं। यकीनन इन चेहरों का रसूख अब नहीं रहा, लेकिन प्रभाव आज भी कायम है।
Saturday, 10 December 2011
नारी क्या अबला है ?
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नारी क्या अबला है
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Rewa, Madhya Pradesh, India
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